बिहार चुनाव में मीडिया और पत्रकारों का सारा फोकस उन राजनीतिक नेताओं और उम्मीदवारों पर मुख्य रूप से केंद्रित था, जो टीआरपी बढ़ाने, लाइक, फालोइंग और सब्सक्रिप्शन बढ़ाने में मदद कर सकते हैं या उन नेताओं और उम्मीदवारों पर फोकस था, जिनके प्रति उस मीडिया हाउस या पत्रकार की प्रतिबद्धता थी या लाभ-हानि जुड़ा हुआ था।जिस जनता और उसके मुद्दों-सरकारों के लिए सामने लाने के लिए मीडिया और पत्रकारिता की जरूरत है या उसका जन्म हुआ था। वह आम जनता और उसके बुनियादी मुद्दे एवं सरोकार मीडिया के फोकस से आमतौर पर बाहर थे। यह उस बिहार में हो रहा था, जहां बहुसंख्य आबादी गरीबी, कंगाली, बेरोजगारी, पलायन, अशिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में जी रही है।
बिहार यात्रा और मीडिया कवरेज देखकर साफ लगा कि कि 1990-1991 में भारत में शुरू हुए नव उदारवादी दौर में भारत की बहुसंख्यक मेहनतकश गरीब आबादी सिर्फ उच्च मध्यवर्ग और मध्यवर्ग की नजरों से ही ओझल नहीं हो गई है, बल्कि मीडिया, पत्रकारिता और पत्रकारों की नजरों से भी ओझल हो गई है। जिस मीडिया और पत्रकारों की नजरों से बहुसंख्यक मेहनतकश गरीब आबादी ओझल हुई है, उस मीडिया में सिर्फ गोदी मीडिया या कार्पोरेट-ब्राह्मणवादी गठजोड़ वाली मीडिया ही शामिल नहीं बल्कि तथाकथित सोशल मीडिया (यूट्यूब) या वैकल्पिक मीडिया भी शामिल है। अपवाद हर समय और हर जगह होता है, उसकी बात मैं नहीं कर रहा हूं।
सिद्धार्थ रामू
बिहार चुनाव के दौरान 10 दिनों की बिहार यात्रा और मीडिया कवरेज देखकर साफ लगा कि कि 1990-1991 में भारत में शुरू हुए नव उदारवादी दौर में भारत की बहुसंख्यक मेहनतकश गरीब आबादी सिर्फ उच्च मध्यवर्ग और मध्यवर्ग की नजरों से ही ओझल नहीं हो गई है, बल्कि मीडिया, पत्रकारिता और पत्रकारों की नजरों से भी ओझल हो गई है। जिस मीडिया और पत्रकारों की नजरों से बहुसंख्यक मेहनतकश गरीब आबादी ओझल हुई है, उस मीडिया में सिर्फ गोदी मीडिया या कार्पोरेट-ब्राह्मणवादी गठजोड़ वाली मीडिया ही शामिल नहीं बल्कि तथाकथित सोशल मीडिया (यूट्यूब) या वैकल्पिक मीडिया भी शामिल है। अपवाद हर समय और हर जगह होता है, उसकी बात मैं नहीं कर रहा हूं।
बिहार चुनावों में मीडिया और पत्रकारों का सारा फोकस उन राजनीतिक नेताओं और उम्मीदवारों पर मुख्य रूप से केंद्रित था, जो टीआरपी बढ़ाने, लाइक, फालोइंग और सब्सक्रिप्शन बढ़ाने में मदद कर सकते हैं या उन नेताओं और उम्मीदवारों पर फोकस था, जिनके प्रति उस मीडिया हाउस या पत्रकार की प्रतिबद्धता थी या लाभ-हानि जुड़ा हुआ था।
जिस जनता और उसके मुद्दों-सरकारों के लिए सामने लाने के लिए मीडिया और पत्रकारिता की जरूरत है या उसका जन्म हुआ था। वह आम जनता और उसके बुनियादी मुद्दे एवं सरोकार मीडिया के फोकस से आमतौर पर बाहर थे। यह उस बिहार में हो रहा था, जहां बहुसंख्य आबादी गरीबी, कंगाली, बेरोजगारी, पलायन, अशिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में जी रही है।
बिहार में मीडिया के बड़े हिस्से की भूमिका को देखकर लगा कि मीडिया और पत्रकारों का बड़ा हिस्सा इस या उस पार्टी के प्रति प्रतिबद्धता दिखाते हुए उनको जिताने या हराने के लिए काम में लगा हुआ दिखा। जैसे वह मीडिया या पत्रकार न हों, बल्कि इस या उस पार्टी या नेता के चुनावी प्रचार के मशीनरी हों। एनडीए समर्थक के तौर उनका काम मोदी-अमित शाह और नीतीश कुमार, चिराग पासवान, जीतनराम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा आदि के पार्टियों के गठजोड़ (एनडीए) को जिताने में मदद करना है और इसके लिए ही वे बिहार आए हैं।
दूसरी तरफ ऐसे मीडिया या पत्रकार भी खूब दिखे, जिन्हें देखकर लगा कि वे इंडिया गठबंधन को जिताने के लिए बिहार आए हुए हैं। उनका काम तेजस्वी, राहुल गांधी, मुकेश सहनी आदि की छवि चमकाना है, उन्हें जिताने में मदद करना है। तय है कि एनडीए गठबंधन के समर्थक कार्पोरेट के नियंत्रण में मुख्य धारा की बहुलांश मीडिया है, तो उनका जोर ज्यादा दिखा। उनके पास पैसा भी बहुत ज्यादा है और भविष्य में वे लाभ पहुंचाने की स्थिति में भी ज्यादा हैं, तो एनडीए को चुनाव जिताने के काम में लगी मीडिया और पत्रकार बहुत ज्यादा थे। पर मीडिया, यूट्यूबरों और पत्रकारों का एक बड़ा हिस्सा भी सारा जोर किसी न किसी तरह इंडिया गठबंधन को जिताने के काम में ही लगा हुआ दिखा, पत्रकारिता की आड़ में।
एक उदाहरण माफिया अनंत सिंह (मोकामा) का लेते हैं। सिर्फ गोदी मीडिया नहीं, बल्कि बड़े-बड़े वैकल्पिक मीडिया के यूट्यूबर-पत्रकारों ने भी एड़ी-चोटी जोर लगाया कि वे अनंत सिंह का साक्षात्कार ले लें। कुछ ने कहा कि हमने कड़े सवाल उनसे किए। कुछ ने कहा कि उनकी हिम्मत नहीं हुई कि वे हमें साक्षात्कार दें। इस पूरी प्रक्रिया में केंद्र में अनंत सिंह ही थे। आखिर अनंत सिंह की चापलूसी या कड़े सवाल पूछने वालों ने उन्हें ही साक्षात्कार के लिए विशेष तौर क्यों चुना?
इसकी पहली वजह तो यह लगती है कि अनंत सिंह का नाम आते ही, उस मीडिया और पत्रकार की रीच तेजी से बहुत अधिक बढ़ सकती है। कोई गुमनाम, लेकिन ईमानदार, जनता के प्रति प्रतिबद्ध और बहुत कम खर्चे करके चुनाव लड़ने वाला देश के स्तर पर बहुत कम लोकप्रिय और नहीं के बराबर लोकप्रिय उम्मीदवार तो वह रीच या TRP नहीं दे सकता, जो रीच या TRP अनंत सिंह दे सकते हैं। अनंत सिंह से कड़े सवाल पूछने वाले पत्रकार हों या उनकी चापलूसी करने वाले दोनों ने अंतिम परिमाण के तौर पर लाभ तो अनंत सिंह को ही पहुंचाया। एक माफिया कुछ दिनों के ही भीतर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय चेहरा बन गया। आज की चुनावी राजनीति में ऐसा चेहरा बन जाना बहुत लाभ का सौदा है, भविष्य उज्जवल होता है।
अब जरा प्रशांत किशोर के मीडिया कवरेज को देखते हैं। बिहार या बिहार की राजनीति में दखल देने वाले किसी भी बड़े से बड़े नेता की तुलना में कम से कम सौ गुना अधिक साक्षात्कार प्रशांत किशोर का हुआ होगा। यह कहा जा सकता है कि ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि वह बिहार की राजनीति में नए खिलाड़ी थे और नए एजेंडों के साथ आए थे। क्या बात सिर्फ इतनी थी?
मुझे लगा कि बात सिर्फ इतनी नहीं थी। प्रशांत किशोर बहुत पहले से मीडिया के बहुत दुलारे चेहरे हैं, क्योंकि उनका साक्षात्कार TRP बढ़ाने और लाइक, सब्सक्राइबर और फालोअवर बढ़ाने में तेजी से मदद करने वाला था। राष्ट्रव्यापी स्तर पर उनकी पसंद और नापसंद दोनों स्तरों पर फैन फालोइंग रही है। मीडिया और पत्रकारों ने इसका अपने मीडिया संस्थान और अपने लिए खूब इस्तेमाल किया। जनता और जनता के मुद्दों को सामने लाने के लिए इतने बड़े पैमाने पर उनके साक्षात्कार हुए यह सहज स्वीकार नहीं हो पाता। हां जब उनके साक्षात्कारों की बाढ़ आ गई और उनका ग्राफ गिरने लगा तो मीडिया और पत्रकारों ने किनारे लगाना शुरू कर दिया। फिर फोकस में अनंत सिंह आ गए।
जमीनी अनुभवों ने यह बताया कि चाहे गोदी मीडिया हो या वैकल्पिक मीडिया दोनों बिहार की जनता के उन हिस्सों के बीच जाने, उनकी जिंदगी की हकीकत और उनके मुद्दे सामने लाने के लिए नहीं के बराबर कोशिश की, जो चेहरे न तो TRP दे सकते हैं, न ही सब्सक्राइबर, न ज्यादा लाइक और फालोइंग।
एक उदाहरण मुसहर और डोम बस्तियों की दी जा सकती है, हालांकि बिहार की बहुसंख्य आबादी का थोड़े मात्रात्मक अंतरों और रूपों के साथ यही हाल है। बिहार में मुसहरों और डोम लोगों की क्या स्थिति है, यह आप बिहार के जाति आधारित सर्वे ( जाति जनगणना-2022-23) से देख सकते हैं और जमीन पर जाकर भी देख सकते हैं। सर्वे और जमीनी हकीकत एक सी है। हां जमीन पर जाने पर सर्वे के अमूर्त आंकड़े आपको मूर्त चेहरों के रूप में साक्षात सामने दिखाई देंगे।
कुछ एक अपवादों को छोड़ दिया जाए तो शहरों, विशिष्ट और चर्चित नेताओं को छोड़कर मीडिया और पत्रकारों के बड़े हिस्से ने इनके बीच जाने की कोई जरूरत नहीं महसूस की, क्योंकि उनकी जिंदगी बदसूरत तस्वीर उनके किस काम की। वैसे भी खूबसूरती कारोबार के वर्तमान दौर में जिंदगी की इन बदसूरत तस्वीरों का कोई मोल नहीं है। ऐसे लोग फिल्मों-साहित्य से पहले ही गायब हो चुके हैं। अब मीडिया से भी गायब हो रहे हैं। इनके गायब होने के कुछ अन्य कारण भी दिखे-
पहली बात यह कि मुसहरों और डोम लोगों के बीच कोई बड़ा बिहार व्यापी और एक हद तक देशव्यापी मध्यवर्ग या निम्न मध्यवर्ग पैदा नहीं हुआ है, जो मीडिया के प्रोडक्ट का खरीददार है, चाहे दर्शक के रूप में, चाहे सब्सक्राइबर के रूप में या लाइक-फालोइंग करने वाले के रूप में। तो इनकी जिंदगी की तस्वीरों को किसे बेचा जाएगा।
दूसरी बात यह है कि इनकी जिंदगी या इनके जैसे बिहार के बहुसंख्य लोगों की बदसूरत जिंदगी की तस्वीरें सभी पार्टियों, नेताओं और उम्मीदवारों के चेहरे को बेनकाब कर सकती हैं, जो बिहार की इस बहुसंख्यक आबादी के नाम पर राजनीति कर रहे हैं, विधायक-मंत्री बन रहे हैं। एक ही कार्यकाल में करोड़पति बन जा रहे हैं। बड़े-बड़े महल खड़ा कर ले रहे हैं और बिहार की बहुसंख्य आबादी वहीं की वहीं खड़ी है। हताश, निराश, नाउम्मीद और पलायन और अपमानजनक जिंदगी जीने को विवश।
इंडिया गठबंधन को जिताने के काम में लगे पत्रकार, यूट्यूबर और मीडिया के लोग यह तर्क दे सकते हैं कि जो सत्ता में है, उसे हराना चाहिए। पहली बात तो यह कि एक पत्रकार के तौर पर किसी को हराना और जितना पत्रकारिता कर रहे किसी व्यक्ति का काम नहीं है। हां वह वोटर के रूप में जिसे जिताना चाहता है, उसे वोट दे सकता है, जिसे हराना चाहता है, उसके खिलाफ वोट कर सकता है। दूसरा तर्क यह दिया जा सकता है कि फासीवाद और तानाशाही के दौर में जब लोकतंत्र और संविधान खतरे में पड़ गया हो तो पत्रकार का भी कर्तव्य बन जाता है कि वह ऐसी शक्तियों को हराने के लिए दूसरी उन राजनीतिक शक्तियों को मदद करे, जो फासीवादी या तानाशाही वाली शक्ति को हरा सके।
इस तर्क में दम है, लेकिन एक पत्रकार लोकतंत्र को बचाने, संविधान को बचाने और नागरिक अधिकारों को बचाने का काम ज्यादा अच्छे तरीके से जनता के मुद्दों और सरोकारों को सामने लाकर ही कर सकता है। यदि वह सोचता है कि पत्रकारिता कोई भूमिका सीधे नहीं निभा सकती है, तो उसके सामने एक्टिविस्ट बनने और चुनावी राजनीति में इस राजनीतिक दल या गठबंधन के पक्ष में काम करने के लिए पूरा अवसर है।
मुझे लगता है कि एक पत्रकार के रूप में एक पत्रकार का मुख्य कर्तव्य बहुसंख्यक शोषित-उत्पीड़ित जनता के मुद्दों और सरोकारों को सामने लाना ही है। इस काम को ठीक से करके ही वह अपनी भूमिका कारगर तरीके से निभा सकता है। व्यक्ति के तौर पर नागरिक के रूप में इस या उस पार्टी के साथ खड़ा होना उसकी आजादी है, लेकिन पत्रकार के रूप में वह किसी पार्टी का प्रचारक नहीं है।
(सिद्धार्थ रामू लेखक और पत्रकार हैं। यह लेख उन्होंने बिहार के चुनावी दौरे से लौटने के बाद लिखा है।)

