~ पुष्पा गुप्ता
कहने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ‘नॉन पोलिटिक आर्गेनाइजेशन‘ है, किंतु उसके सारे क्रिया-कलाप सत्ता की राजनीतिक हितों को साध रहे हैं, यह भी कड़वा सच है। देश के अधिकांश गवर्नर, विभिन्न संस्थानों में की-पोस्ट पर बैठे लोगों की पृष्टभूमि को खंगालें, उनके नागपुर कनेक्शन को कोई नकार नहीं सकता।
मोहन भागवत कई बार पीएम मोदी से बड़ी चुनावी मशीन नज़र आते हैं। सरसंघचालक का इस समय पूर्वोत्तर में होना साफ दर्शाता है कि वो संकट मोचक के रूप अवतरित हैं।
महीनों बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत तीन दिवसीय यात्रा पर पूर्वोत्तर पधारे हैं। गुवाहाटी के बरास्ते वो मिज़ोरम की राजधानी आइजोल पहुंचे हैं, 1 अगस्त को वापसी में मोहन भागवत असम के होजाई में संघ शिक्षा वर्ग द्वितीय के प्रशिक्षण शिविर में जाएंगे।
12 जुलाई से 1 अगस्त तक आहूत इस शिविर में संघ प्रमुख का आना क्या पहले से तय था? इसका स्पष्ट उत्तर नहीं मिल रहा है, लेकिन आइजोल से 400 किलोमीटर दूर इंफाल, संघ प्रमुख का नहीं जाना निकट भविष्य में कई प्रश्नों को भी आमंत्रित करेगा।
संघ प्रमुख मोहन भागवत 21 जनवरी 2022 को आखिरी बार जब इंफाल चार दिन के लिए आये, हाराओरू स्थित राजर्षि भाग्यचंद्र स्कील डेवलपमेंट सेंटर के युवाओं से मिले थे। उनका स्वागत यूथ मार्डन क्लब के कार्यकर्ताओं ने भी किया था।
मोहन भागवत ने उन दिनों नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 126 जन्म जयंती समारोह में भाग लिया था। ऐसा लगता है 13 से 15 जुलाई को ऊटी में अखिल भारतीय प्रांत प्रचारकों की बैठक में यह फैसला लिया गया कि संघ प्रमुख मणिपुर जाएं, और डैमेज कंट्रोल करें।
कोयम्बतूर के निकट ऊटी में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय “प्रांत प्रचारक बैठक” में संघ की शाखाओं को उनके सामाजिक दायित्वों के अनुरूप और अधिक सक्रिय करने की चर्चा यों तो हर वर्ष होती रहती है, मगर इस बार की बैठक में मणिपुर का मुद्दा छाया रहा। बैठक में उपस्थित प्रांत प्रचारकों में से कुछ ने माना कि वहां मणिपुर की वर्तमान स्थिति पर बार-बार चिंता व्यक्त की जा रही थी।
यह जानकारी दी गई कि मणिपुर में संघ के स्वयंसेवक समाज के प्रबुद्ध लोगों के साथ मिलकर शांति तथा परस्पर विश्वास का वातावरण बनाने तथा पीड़ित बंधुओं की आवश्यक सहायता करने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं।
तमिलनाडु में नीलगिरी की पहाड़ियों पर अवस्थित ऊटी की बैठक में संघ के स्वयंसेवकों द्वारा मणिपुर के पीड़ित लोगों के लिए चल रहे सहायता कार्यों को और अधिक व्यापक करने पर विचार हुआ। दक्षिण की घरती से ही पूर्वोत्तर में रह रहे समाज के सभी वर्गों से अनुरोध किया गया कि परस्पर सौहार्द्र एवं शांति स्थापित करने के प्रयासों को गति दें।
मणिपुर में स्थायी शांति एवं पुनर्वास के लिए सरकार से हरसंभव कार्रवाई करने का आवाहन भी किया गया। ऊटी की बैठक के बाद मोहन भागवत यदि पूर्वोत्तर जाना तय करते हैं, तो मानकर चलिये कि मणिपुर इस समय न सिर्फ़ केंद्र सरकार के लिए, बल्कि संघ के लिए भी सिरदर्द का विषय बन चुका है।
असम के होजाई कैंप के बारे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जानकारी दी कि प्रशिक्षण शिविर में असम क्षेत्र से 151, उत्तर असम प्रांत से 95, दक्षिण असम प्रांत से 12, अरुणाचल प्रांत से 4, त्रिपुरा प्रांत से 44 और मणिपुर प्रांत से 6 स्वयंसेवक भाग ले रहे हैं। इस प्रशिक्षण शिविर में मणिपुर जैसी परिस्थितियों से निपटने को लेकर भी कुछ ख़ास जानकारियां साझा की गईं।
क्या मोहन भागवत का पूर्वोत्तर जाना इसलिए भी बना है कि ताकि प्रतिपक्ष के सांसद मणिपुर जाकर डबल इंजन सरकार के विरूद्ध माहौल बना सकने में कामयाब न हों? या फिर अगल-बगल के मुख्यमंत्रियों ने जिस तरह एन बीरेन सिंह के विरूद्ध जो बयान दिया है, उनकी क्लास भी मोहन भागवत लें? सरसंघचालक मोहन भागवत की यह यात्रा कई मायनों में महत्वपूर्ण है।
पूर्वोत्तर की 25 लोकसभा सीटें किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी के लिए मायने रखती है। संघ प्रमुख की चिंता 2024 चुनाव भी है। मणिपुर में चल रहे माहौल से बाकी़ के सात राज्य अछूते नहीं रह पायेंगे।
पूर्वोत्तर में सबसे अधिक असम मंे 14 लोकसभा सीटें हैं। इसके प्रकारांतर अरूणाचल में दो, मणिपुर में 2, मेघालय में दो, त्रिपुरा में भी दो सीटों के अलावा सिक्किम, नगालैंड और मिज़ोरम में एक-एक सीटें हैं। पूर्वोत्तर के ये राज्य नागरिकता संशोधन क़ानून तो झेल चुके, लेकिन केंद्र सरकार के लिए उससे भी कठिन मार्ग सभी पंथ के लोगों के लिए जीने से लेकर मरने तक के लिए बनने वाला समान नागरिक संहिता कई सवालों का इंतज़ार कर रहा है।
पूर्वोत्तर के आठ राज्यों 220 से अधिक जातीय समूह दीखते हैं। इन्हें मानसिक रूप से समान नागरिक संहिता के लिए तैयार करवाना भी संघ के अनुषंगी संगठनों के लिए बड़ी चुनौती होगी। इसमें कोई शक़ नहीं कि बीजेपी के लिए असम की 14 लोकसभा सीटें सबसे अधिक अहमियत रखती है, लेकिन जिन राज्यों में दो या एक सीटें हैं, उन्हें भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने हाथ से निकलने क्यों दे?
संघ के मानचित्र पर असम यदि तीन हिस्सों में बांटा गया है, तो कार्यकर्ताओं को रणनीति पर खरा उतारना भी सरसंघचालक मोहन भागवत की ज़िम्मेदारी है। कार्यकर्ताओं के कमिटमेंट की बात करें तो ताज़ा उदाहरण डॉ. सुनील मोहंती हैं, जो जेएनयू से पढ़े हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफसरी छोड़कर संघ का दामन थाम लिया, और पूर्वोत्तर में प्रचारक बन गये।
डॉ. सुनील मोहंती इस समय अरूणाचल प्रदेश के प्रांत प्रचारक हैं। वो दिसंबर 2016 के दिनों को याद करते बताते हैं कि जब संघ प्रमुख अरूणाचल आये थे, उन्हें सुनने के वास्ते 10 हज़ार से अधिक युवाओं की भीड़ देखकर हम सब हैरान हुए थे।
16 सितम्बर 2016 को पेमा खांडू 43 सत्तापक्ष विधायकों के साथ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस छोड़कर पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल में शामिल हो गये और भारतीय जनता पार्टी के साथ सरकार बनाई। बाहर से तो यही लग रहा था कि बीजेपी का कोर ग्रुप, अमित शाह ‘राजनीतिक घोड़ों‘ की ख़रीदारी कर रहे थे। दरअसल, इन सबके पीछे संघ की रणनीति काम कर रही थी। जो लोग संघ की आतंरिक संरचना को जानते हैं, वो पद्नाभ आचार्य से अवश्य सुपरिचित होंगे।
इस समय उनकी उम्र 91 साल है, जिन्होंने नगालैंड के गर्वनर की ज़िम्मेदारी भी संभाली थी। उन्हीं पद्नाभ आचार्य ने पूर्वोत्तर में संघ की जड़ें मज़बूत करने के वास्ते ‘भारत मेरा घर‘ कार्यक्रम 1960 में आरंभ कराया था।
पूर्वोत्तर की ज़मीन पर राष्ट्रवाद की बुआई में तेज़ी 1990 से आई थी, जिसे न तो (सिक्किम और त्रिपुरा को छोड़कर), छह सूबों में बैठे कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री सूंघ सके, और न ही उनका केंद्रीय आलाकमान समझ पाया। संघ ने ईसाई मिशनरियों, कांग्रेस शासित राज्यों व त्रिपुरा के कम्युनिस्ट शासन को काउंटर करने के लिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का सहारा लिया।
विभिन्न राज्यों के महापुरूषों को मान्यता देने से लेकर, उनकी बहुसांस्कृतिक धरोहरों को स्वीकार करने में संघ के लोग आगे रहे। बीफ-पोर्क जैसा आहार पूर्वोत्तर में कभी इश्यू बना ही नहीं।
आप पूर्वोतर में संघ की शाखाओं में जाने वाले कार्यकर्ताओं की फूड हैबिट पर सर्वेक्षण करा लीजिए, अधिकांश बीफ-पोर्क के भक्षक मिलेंगे। पूरे पूर्वोत्तर में संभवतः एक भी मॉब लींचिंग का केस गौरक्षा के नाम पर नहीं मिलेगा। ईसाई मिशनरियों तक को बात जबतक समझ में आती, देर हो चुकी थी। यूरोपीय संसद में मणिपुर के विरूद्ध जो ग़ुस्सा दिखा, दरअसल पूर्वोत्तर में ईसाईयत की पराजय भी एक वजह रही है, जिसे यूरोपीय संघ के सांसद खुलकर स्वीकार करने से परहेज़ करते रहे। जो पैसे पूर्वोत्तर के चर्च के लिए आ रहे थे, उनपर अपरोक्ष पाबंदी भी एक बड़ी वजह रही है।
अरूणाचल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत प्रचारक प्रोफेसर मोहंती बताते हैं कि हमने पश्चिमी अरूणाचल की सांस्कृतिक विरासत डोनी पोलो तक को स्वीकार किया। उनपर हिंदू संस्कृति थोपने की चेष्टा नहीं की। आप ईटानगर एयरपोर्ट का नाम देख लीजिए, ‘डोनी पोलो एयरपोर्ट‘। डोनी का अर्थ ‘सूर्य‘ और पोलो का मतलब, ‘चंद्रमा‘। चर्च संचालित अंग्रेज़ी स्कूलों को काउंटर करने के वास्ते संघ ने खोला विद्या भारती इंगलिश मीडियम स्कूल। फीस उनके मुक़ाबले नाममात्र को।
संघ से जुडा़ ‘सेवा भारती‘ मैथ व साइंस विषयों के लिए फ्री कोचिंग की व्यवस्था किये हुए है। हर साल सात से 800 छात्रों को सिविल सेवाओं की तैयारी के लिए मुफ्त की कोचिंग।
संघ ने चर्च की उन रणनीतियों पर निरंतर निगरानी की, जिनके ज़रिये पूर्वोत्तर की जनजातियों को उनसे जोड़ा। 2011 में जनसांख्यिकी आकड़ों में असम में 34 प्रतिशत मुस्लिम आबादी, नगालैंड (87.93 प्रतिशत), मिजोरम (87.16 प्रतिशत), मेघालय (74.59 प्रतिशत), मणिपुर (41.29 प्रतिशत) और अरुणाचल प्रदेश (30.26 प्रतिशत) में ईसाई आबादी दीखती रही। आप अगली जनगणना का इंतज़ार कीजिए। पूर्वोत्तर की सूरत बदली नज़र आयेगी।
मणिपुर का ही उदाहरण लेते हैं। 2011 की जनगणना को आधार मानकर मणिपुर को ‘ईसाई बहुल प्रांत‘ घोषित कर दिया गया था, लेकिन विगत दस वर्षों में जनसांख्यिकी बदलाव के परिणामस्वरूप अब वह हिंदू बहुल आबादी से पीछे चलने लगा है। ‘इंडिया सेंस डॉट नेट‘ की रिपोर्ट को मानें तो मणिपुर में हिंदू आबादी 41.39 प्रतिशत है, और ईसाइयों की जनसंख्या घटकर 41.29 पर आ चुकी है।
लगभग ऐसे ही परिणाम संभवतः कुछ वर्षों में बाक़ी राज्यों में दिखें, तो आश्चर्य मत कीजिएगा।
असम जिस तरह से पूर्वोत्तर में ईसाईयत और इस्लाम के लिए इंट्री प्वाइंट रहा है, आरएसएस की कहानी भी लगभग वैसी ही रही है। 77 साल पहले 27 अक्टूबर 1946 को संघ के प्रचारक दादाराव परमार्थ, वसंतराव ओक और कृष्णा परांजपे गुवाहाटी आये। कुछ दिन इस इलाक़े में संपर्क विकसित करने के बाद, गुवाहाटी के साथ-साथ शिलांग और डिबू्रगढ़ में शाखा लगाना आरंभ किया। संघ को सबसे अधिक मज़बूत ज़मीन त्रिपुरा में दिखी, जहां 83 फीसद हिंदू आबादी थी।
1952 में ‘उदबस्तु सहायता समिति‘ के ज़रिये संघ ने अपने विचारों का बीजारोपण प्रारंभ किया। फिर 1956 से त्रिपुरा में शाखा लगना शुरू हुआ।
संघ के पुराने लोग 75 साल पहले के उस दौर को याद करते हैं, जब असम के नागांव जिले के राधिका मोहन गोस्वामी ने वाराणसी में ‘डॉक्टरजी‘ के नाम से मशहूर केशव बलिराम हेडगेवार से मुलाकात की और संगठन के लिए काम करने में रुचि दिखाई। हेडगेवार ने 1925 में नागपुर में आरएसएस की स्थापना की थी। उस बैठक के बाद, असम के अन्य स्थानीय लोग जैसे केशव देव बावरी, गिरीश कलिता, शंकरलाल तिवारी और प्रफुल्ल बोरा आरएसएस से जुड़ गए।

