डॉ. प्रिया
_दु:ख का आप क्या अर्थ लगाते हैं? आप किसी बालक को देखते हैं जिसका शरीर स्वस्थ है, प्यारा सा चेहरा है, उसकी आँखों में चमक और बुद्धिमत्ता है और चेहरे पर खिली-खिली मुस्कान है।_
जब वह बड़ा हो जाता है तब उसे तथाकथित शिक्षा की मशीनरी में से गुज़रना होता है। उसे समाज के एक खास ढर्रे का अनुयायी बना दिया जाता। और इस प्रकार उसके जीवन का वह उल्लास, उसके जीवन की प्रफुल्लता का सहज स्फुरण छिन्न-भिन्न कर दिया जाता है।
ऐसा होते देखना दुखद होता है, है कि नहीं? जिसे हम प्रेम करते हैं ऐसे व्यक्ति का खो जाना दुखद होता है।
यह जानकर दुख होता है कि जीवन की तमाम चुनौतियों का जवाब हमने बड़े तुच्छ और आधे-अधूरे ढंग से दिया है। और, क्या जीवन की इस विशाल नदी पर बना दिये गये बांध की छोटी सी तलैया में प्रेम का दम तोड़ देना दुखद नहीं है?
उपलब्धियों के पीछे आपका दौड़ना और केवल खिन्नता हाथ लगना भी तो दुखद है। इस बात की वास्तविकता का बोध होना दुखद है कि यह मन कितना क्षुद्र है-किसी और का नहीं बल्कि स्वयं अपना मन।
भले ही यह कितना भी ज्ञान एकत्रित कर ले, कितना ही चतुर, धूर्त या विद्वान बन जाये, यह मन रहता तब भी छिछला और खोखला ही है, और इस तथ्य का बोध भी दुख और उदासी का एहसास पैदा करता है।
हम जानते हैं कि इन तरह-तरह के दुखों का अस्तित्व है। भले ही हम इनमें से होकर सचमुच न गुज़रे हों परंतु यदि हम सजग रूप से देखें और जीवन के प्रति सचेत रहें तो हम साफ देख पाते हैं कि इनका अस्तित्व बना ही रहता है, परंतु फिर भी हम दुख क ही नहीं तर हम लोग इन दुखों से पलायन ही करना चाहते हैं।
इसे देखना तक नहीं चाहते। हम यह पूछते होता क्या है। हम तो बस उससे दूर-दूर रहने की जुगत मे लगे रहते हैं.

