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इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की नई गाइडलाइन के मायने

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डॉ. अंशुमान कुमार

आईसीएमआर यानी इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने नई गाइडलाइंस जारी कर डॉक्टरों को सलाह दी है कि साधारण बुखार, खांसी में ऐंटीबायॉटिक दवाएं ना प्रिस्क्राइब करें। इन गाइडलाइंस को एएमआर गाइडलाइंस कहते हैं। यह फोर्थ ईयर के एमबीबीएस छात्रों को फार्माकोलॉजी के चैप्टर में पढ़ा दी जाती है। फिर से यह गाइडलाइन क्यों बनाई क्यों गई? पहले बनी गाइडलाइन का कितना पालन हो रहा है, इन पर विचार करने की जरूरत है।

समस्या की जड़

भारत में ऐंटीबायॉटिक्स के साथ अगर समस्या समस्या आई है तो उसकी जड़ यहां है-

धरती पर बहुत कम ही देश ऐसे हैं, जहां इस तरह से बिना किसी पॉलिसी के ऐंटीबायॉटिक इस्तेमाल की जाती है। मगर आईसीएमआर ने गाइडलाइन निकाली है ऑर्गनाइज्ड सेक्टर के लिए, जिसके डॉक्टर आमतौर पर ऐसा नहीं करते हैं।

दिशा तो दें पहले

इसी गाइडलाइन में है कि कम्यूनिटी एक्वायर्ड निमोनिया के लिए 5 दिन और अस्पताल से हुए निमोनिया के इंफेक्शन के लिए 8 दिन की ऐंटीबायॉटिक दें। कम्युनिटी एक्वायर्ड निमोनिया, मतलब ऐसे बैक्टीरिया जिनको ऐंटीबायॉटिक का एक्स्पोजर कम मिला हो। हॉस्पिटल एक्वायर्ड निमोनिया मतलब अस्पताल में रहते हुए निमोनिया हुआ, खूब एक्सपोजर मिला। ऐसे में ऐंटीबायॉटिक लंबे समय तक, मतलब 8-10 दिन तक दी जाती है। यह बिलकुल ठीक है। लेकिन गाइडलाइन में कहा गया कि कल्चर करें, प्रोकैल्सीटोनिन क्यू टेस्ट देखें और एक्स-रे करें। अब एक्स-रे तो हर जगह है। लेकिन गवर्नमेंट ऑफ इंडिया, मिनिस्ट्री ऑफ हेल्थ, आइसीएमआर देखे कि क्या कल्चर या प्रोकैल्सीटोनिन टेस्ट भारत में हर जगह होता है? निमोनिया का हम कल्चर टेस्ट भेजें कि कौन सी ऐंटीबायॉटिक देनी है, तो क्या हिंदुस्तान के किसी गांव में कल्चर टेस्ट हो जाएगा? कहने का मतलब है गाइडलाइन जब बनाते हैं, दिशा-निर्देश देते हैं तो दिशा भी दें और निर्देश भी दें। दिशा आपके पास है नहीं, निर्देश आप दे रहे हैं तो ये फेल हो जाएगा।

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