शशिकांत गुप्ते
राधेश्यामजी,अपनी घनिष्ठ मित्र सीतारामजी को दान का महत्व समझा रहे थे।
दान का शाब्दिक अर्थ है – ‘देने की क्रिया’। सभी धर्मों में सुपात्र को दान देना परम् कर्तव्य माना गया है। हिन्दू धर्म में दान की बहुत महिमा बतायी गयी है। आधुनिक सन्दर्भों में दान का अर्थ किसी जरूरतमन्द को सहायता के रूप में कुछ देना है।
सीतारामजी व्यंग्यकार हैं,सीतारामजी ने अपनी व्यंग्य की शैली में पूछा,कौन जरूरतमंद है यह कैसे जानेंगे? आम तौर पर बहुत से लोग भिखारियों को जो भीख देतें हैं,उसे भी दान ही समझतें हैं। भिखारियों को जरूरतमंद समझना मतलब उन्हें निठल्ले बने रहने के लिए प्रोत्साहित (Encourage) करना होता है। यह तो नासमझी है।
राधेश्यामजी ने कहा क्षमा करना मै भावावेश में आपसे दान जैसे धार्मिक कर्म पर चर्चा करने लग गया।
सीतारामजी ने कहा राधेश्यामजी यही भावावेश आपको सत्य स्वीकारने नहीं देता है। दान के सम्बंध में व्यवहारिक तौर यह कहा गया है। व्यक्ति को अपनी आय को ध्यान में रखकर, स्वयं की सभी अनिवार्य आवश्यकताएं संतोषजनक रूप से पूर्ण होने पर जो Surplus मतलब जो आधिक्य या अतिरिक्त बचें उसमें से कुछ दान किया जाना चाहिए।
राधेश्यामजी पुनः सीतारामजी से
क्षमा याचना की।
सीतारामजी ने राधेश्यामजी से कहा यह बार बार क्षमा की याचना करना लाचारी का द्योतक है।
इनदिनों वैचारिक बहस समाप्त सी हो गई है। बहस को छोड़ो दुर्भाग्य से समाज संवादहीन हो गया है।
सीतारामजी ने राधेश्यामजी कहा दान के विषय में विस्तार से समझना जरूरी है। यह कहतें हुए सीतारामजी पूर्णरूप से अपनी व्यंग्यकार की मानसिकता में आ गए।
अपना देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। अपने देश में चुनाव होतें है। चुनाव में योग्य प्रतिनिधि चुनने के लिए देश के मतदाताओं द्वारा मतदान किया जाता है।
मत का दान भी एक महत्वपूर्ण दान ही है।
मतदान के महत्व को समझों, प्रायः मतदान भावावेश में ही किया जाता है। अपने देश का मतदान महत्वपूर्ण इसलिए है कि, अपने देश का मतदान चमत्कृत करने वाला मतदान होता है।
देश के मतदाताओं को दानवीर होने का पदक देना चाहिए।
राधेश्यामजी कौतूहलवश पूछा दानवीरता पदक क्यों?
सीतारामजी ने कहा देश के मतदाता सन 2014 के पूर्व उन लोगों को अपने मत का दान करतें रहें हैं, जिन्होंने लगभग सत्तर वर्षो तक देश में कुछ किया ही नहीं?
सन 2014 के बाद मतदाताओं को दान देने का सिलसिला बदस्तूर चल रहा है। सन 2014 के बाद मतदाता उन लोगों को अपने मत का दान कर रहें हैं जो अपने वादों को विज्ञापनों में ही पूर्ण करने का दावा करतें हैं?
यथार्थ में तो रामभरोसे भारत है?
एक अच्छा परिवर्तन हो रहा है।
सभी सियासी दल धार्मिकता की धुरी पर घूमने लगें हैं।
कोई रामजी को लाने में समर्थ है तो कोई रामलला की जन्म भूमि के मुफ्त दर्शन करवा कर लोगों को पुण्य कमाने में सहयोगी सिद्ध हो रहा है।
मुफ्त का लुफ्त उठाने वाले कितने भाग्यवान है, उनके द्वारा किए गए मतदान का फल उन्हें फोकट में तीर्थस्थान के दर्शन करने से ही मिल रहा है।
इसे कहतें हैं तुरत दान महापुण्य।
यही तो दान का चमत्कार।
यह इतना बड़ा चमत्कार है कि,इस मतदान के चमत्कार के आगे आमजन की मूलभूत सभी समस्याएं गौण हो जाती है। इससे बड़ी आश्चर्यजनक बात और क्या हो सकती है।
सभी देशवासियों में आस्था जागृत होने से देशवासियों में सहिष्णुता आ गई है। सहिष्णुता के कारण बेतहाशा महंगाई सहन करने की क्षमता असीम हो गई है।
इसे ही कहतें है, चमत्कारिक मतदान?
चमत्कार को ही नमस्कार किया जाता है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

