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*सावन की गीली निशा का दर्प*

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         ~ सुधा सिंह 

सावन हमारा प्रिय मौसम होता है , फागुन से भी ज्यादा। सावन चौगिर्दा घेरता है , कोमल पर मज़बूत बाहुपाश में बाँधता है। खुले , कारे , घनेरे बादरों की लटें सुरमई चंदोवा में बिठा देती हैं , सियाह रात का सौन्दर्य आलस और कसक में डुबाता , दबाता रहता है।
सियाह सौंदर्य का खिंचाव अनाड़ी ही जानता है , अभागा बुद्धिविलासी तो सौंदर्य का छिद्रानुवेषण करने बैठ जाता है , अपनी दबी हुई आकांक्षा को शब्दाडंबर में तिरोहित कर देता है।

गाँव में सावन झूम कर आता है , यह कंक्रीट के जांगल को नहीं झकझोरता , चू चुके आमों की फुनगी को अपनी मुट्ठी में लेकर दूर बँसवारी तक ले जाता है , तीव्र गति से , महुआ हँसता है , हारिल के जोड़े को पत्तों के नीचे रात गुज़ारने की सहूलियत देता है। गन्धराज की मादक महक पच्छू टोला के मुसहरों की मड़ही में घुस जाती है। सावन की रात महकती है , कलकत्ता कमा के मुलुक लौटा बुधिराम बेसुध नही सो पाता , अलसायी बाँह उसकी छाती टटोलती है , खटिया की कुआदत को मेहनाज़ पुर वाली गोलकी फुसफुसा कर गरियाती है :
“बेवज़है चरमराती है निगोड़ी , न रुख़ देखे न ताव देखे , होत सबेर नाटे लोहार से येकर चूर ठोंकाउब।”

दूर से पंडित भीम सेन जोशी का अलाप उठता है :
“सुन पावे मोर सास ननदिया , दूजे जागे और जेठनिया. “
-छि !
-क्या हुआ ?
-मोस्ट इराटिक सांग!

ख़ुद से टूटकर अलग होना विधि विधान को चुनौती देना होता है। वियोग में संयोग की इच्छा और तीब्र होती है , उसे मार सकते नहीं , उसे जी कर विरक्त तक जा सकते हो। सावन शिव कल्प है। योग और भोग का सबसे बड़ा चरित्र। सावन में इसकी प्यास बढ़ती है। काम से विरक्त होने का मंत्र और भेद कोई देता है तो वह शिव है।
शिव सावन में भीगता है। कलाओं का संरक्षक है , शिव का संगीत का नाद को प्रवाहित कर अविरल धार बनाता है। संगीत श्रीष्टि की जननी है। जिसे तुम अंग्रेज़ी का इराटिक यानी कामुक अभिव्यक्ति बोल रहे हो यह भिन्न भिन्न संस्कृतियों की समझ है।

सावन पृथ्वी को गीला करता है। श्रृष्टि के बीज अंकुरित होते हैं :
– रात बीत रही है!
– रात के साथ सब बीत रहे हैं
– केवाड ओठंगा दो
– क्यों सब तो सियाह है!
– दुष्ट ! नशेड़ी !! बिजली का चमकना नहीं देख
पा रहे हो?
– सावन की गीली निशा.

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