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देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त भी आंदोलनजीवियों ने ही करवाया था प्रधानमंत्री जी….

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क्‍या महात्‍मा गांधी, लाल बहादुर शास्‍त्री, जयप्रकाश, अटल बिहारी बाजपेयी भी परजीवी थे?

प्रधानमंत्री जी… किसानों को अंग्रेजों के अत्याचार से बचाने के लिए गांधीजी ने भी भरी थी चंपारण आंदोलन की हुंकार

आंदोलनों के अस्तित्व पर सवाल नहीं उठाना चाहिए*

विजया पाठक,

एडिटर, जगत विजन 

          देश में किसान आंदोलन का मसला शांत भी नहीं हुआ था कि अब देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान के बाद एक नई बहस शुरू हो गई है। प्रधानमंत्री के बयान के बाद न सिर्फ कांग्रेस शासित राज्य बल्कि भाजपा शासित वो राज्य जो कहीं न कहीं किसान आंदोलन के पक्षकारी थे वो भी सख्ते में आ गए है। दरअसल दो दिन पहले राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिए गए अपने भाषण में किसान आंदोलन को सहयोग करने वाले लोगों को परजीवी की उपाधि दे दी है। उन्होंने कहा था- ‘हम लोग कुछ शब्दों से काफी परिचित हैं, जैसे श्रमजीवी, बुद्धिजीवी लेकिन पिछले कुछ समय से मैं देख रहा हूं कि देश में एक नई जमात पैदा हो गई है, एक नई बिरादरी पैदा हुई है और ये आंदोलनजीवी है। वे परजीवी हैं। हम बता दें कि परजीवी का मतलब होता है दूसरे जीवों पर आश्रित जीव। इस जमात को आप देखेंगे तो वह वकीलों के आंदोलन में भी नजर आएंगे, स्‍टूडेंट के आंदोलन में भी दिखेंगे, मजदूरों के आंदोलन में भी दिखाई देंगे। प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी यही तक नहीं रूके उन्‍होंने आगे कहा कि‍ आंदोलनजीवी लोग खुद आंदोलन नहीं चला सकते हैं, लेकिन किसी का आंदोलन चल रहा हो तो वहां पहुंच जाते हैं। ये आंदोलनजीवी ही परजीवी हैं, जो हर जगह मिलते हैं। यानि आंदोलन को सपोर्ट करने वाले लोगों को प्रधानमंत्री ने दूसरे लोगों पर आश्रित जीव की संज्ञा दी है। प्रधानमंत्री के इस वाक्य के बाद आंदोलन का समर्थन करने वाले लोगों की भूमिका संदेह के घेरे में आ गई है और किसान नेताओं सहित राजनीतिक पार्टी से जुड़े हुए लोगों में खासी नाराजगी है। तो क्या किसान अपने हक के लिए आवाज भी नहीं उठा सकते? हम सब जानते हैं कि गांधीजी ने लगभग 100 वर्ष पहले किसानों को अंग्रेजों के अत्याचार से बचाने के लिए चंपारण आंदोलन की हुंकार भरी थी। इतना ही नहीं अंग्रेजों द्वारा नमक पर लगाए गए कर के विरोध में नमक सत्याग्रह भी किया था। जिसमें लाखों करोड़ों लोगों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। इतना ही नहीं 1974 में जय प्रकाश नारायण ने भी छात्रों के हक में जेपी आंदोलन की हुंकार भर उन्हें उनका हक दिलवाया था। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेई जी की पूरी राजनीति आंदोलनों पर टिकी हुई थी और वह जीवन भर जन कल्याण के हित में सरकारों के खिलाफ आंदोलन करते रहे। इसका मतलब यह तो नहीं कि वो सभी लोग परजीवी हैं। इस तरह के बयान देकर वह हमारे महापुरूषों के आदर्शों को, उनके आंदोलनों के सवाल खड़े कर रहे हैं। अपने हक के लिए तो आवाज उठाना और आंदोलन लोकतंत्र के मूल अधिकारों में शामिल है।            प्रधानमंत्री को एक बात समझना चाहिए थी कि विश्व के इतने बड़े लोकतंत्र के मुखिया को इस तरह की हल्की बात करना उचित नहीं लगता। जबकि प्रधानमंत्री किसी एक पार्टी या दल के नहीं होते, बल्कि वो जनता के और जनता के द्वारा चुने गए व्यक्ति होते हैं, जिसे जनता ने वोट देकर चुना है। ऐसे में जनता के विरुद्ध जाकर इस तरह का बयान देना कहीं न कहीं लोकतंत्र को अपमानित करने जैसा है। यह देश का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है। आंदोलन का सपोर्ट करने वाले लोगों को प्रधानमंत्री जी ने परजीवी की उपाधि दे दी और विपक्ष के नेता सिर्फ मूकदर्शक बने सुनते रह गए। देश का किसान आज भी कृषि कानून को के विरोध में दिल्ली की सड़कों पर डेरा डाले बैठा हुआ है और किसी को उनकी परवाह नहीं। ऐसे में अब यदि भाजपा हो या फिर देश में भाजपा शासित राज्य के लोग आंदोलन का समर्थन करें भी तो कैसे। लेकिन मौजूदा प्रधानमंत्री आंदोलन करने वालों को आंदोलनजीवी बताकर उनका भी अपमान कर दिया है। प्रधानमंत्री जी को एक बात समझना चाहिए कि देश को अंग्रेज़ों से स्वतंत्रता भी एक आंदोलन से ही मिली थी और हमें गर्व होना चाहिए उन सभी आंदोलनजीवी स्वतंत्रता सेनानियों पर जिन्होंने अपनी जान न्यौछावर कर देश को आजाद करवाया।            इ‍ति‍हास गवाह है कि देश में जब-जब बड़े आंदोलन हुए हैं। समान विचारधारा वाले संगठन या व्‍यक्ति उन आंदोलनों में शामिल हो जाते हैं। मौजूदा किसान आंदोलन में भी यही हो रहा है। शायद नरेन्‍द्र मोदी को यही बात चुभ रही है कि इस आंदोलन को इतना समर्थन क्‍यों मिल रहा है। लेकिन मोदी जी को इस तरह से आंदोलनों के अस्तित्‍व पर सवाल नहीं उठाना चाहिए। हम जानते हैं कि‍ हमारा देश तो आंदोलनों की बुनियाद पर जीवित हुआ है।

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