*(केंद्र सरकार की नई महत्वाकांक्षी योजना ‘प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना’ के तहत 100 आकांक्षी कृषि जिलों को विकसित करने का वादा किया गया है, लेकिन स्मार्ट सिटी मिशन की अधूरी कहानी जनता के मन में सवाल खड़े कर रही है। क्या यह योजना किसानों के लिए क्रांति लाएगी या सिर्फ चुनावी जुमला साबित होगी? 24,000 करोड़ रुपये के वार्षिक बजट के साथ यह योजना 1.7 करोड़ किसानों को लाभ देने का दावा करती है, मगर बढ़ता विदेशी कर्ज और स्मार्ट सिटी की नाकामी इसे शक के घेरे में ला रही है। विपक्ष इसे ‘गुमराह करने की नई चाल’ बता रहा है, जबकि जनता जवाब मांग रही है—विकास कब होगा? हरिशंकर पाराशर की यह विशेष रिपोर्ट सरकारी आंकड़ों और विशेषज्ञ विश्लेषण के आधार पर सच्चाई को सामने लाती है।)*

नई दिल्ली,: केंद्र सरकार ने स्मार्ट सिटी मिशन की तर्ज पर एक और महत्वाकांक्षी कदम उठाते हुए 100 आकांक्षी कृषि जिलों को विकसित करने की घोषणा की है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के तहत शुरू होने वाली ‘प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना’ (पीएमडीडीकेवाई) का लक्ष्य कम उत्पादकता वाले 100 जिलों में कृषि क्रांति लाना है। इसके लिए फसल विविधीकरण, आधुनिक सिंचाई, पंचायत-स्तरीय भंडारण और किसानों की ऋण पहुंच बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा। योजना का वार्षिक बजट 24,000 करोड़ रुपये रखा गया है, जिससे 1.7 करोड़ किसानों को लाभ मिलने की उम्मीद है। लेकिन स्मार्ट सिटी मिशन की लचर प्रगति और बढ़ते विदेशी कर्ज के बोझ ने जनता के मन में सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या यह नया वादा भी अधर में लटक जाएगा? विपक्ष और विशेषज्ञ इसे ‘चुनावी जुमला’ करार दे रहे हैं, जबकि जनता पूछ रही है: आखिर सरकार चाहती क्या है—विकास या सिर्फ वोट?
यह खबर वास्तविक घटनाओं पर आधारित प्रतीत होती है, लेकिन कुछ आंकड़ों में मामूली भिन्नताएं हैं। स्मार्ट सिटी मिशन के मामले में, सरकारी आंकड़े 93% परियोजनाओं के पूर्ण होने की पुष्टि करते हैं, लेकिन केवल 18 शहरों में पूर्ण सफलता मिली है। पीएम धन-धान्य योजना की घोषणा फरवरी 2025 के बजट में हुई थी, और यह नीति आयोग के आकांक्षी जिलों कार्यक्रम से प्रेरित है। विदेशी कर्ज के आंकड़े भी काफी हद तक सटीक हैं, हालांकि आरबीआई के अनुसार मार्च 2025 तक यह 736.3 अरब डॉलर था। सोशल मीडिया पर #SmartCityFail जैसे हैशटैग वाकई ट्रेंड कर रहे हैं, खासकर बरसात में जलभराव की शिकायतों के साथ। क्या यह योजना स्मार्ट सिटी की तरह अधर में लटकेगी, या वाकई किसानों का भला करेगी? आइए, तथ्यों से समझें।
*स्मार्ट सिटी: दस साल बाद भी सपना अधूरा*
2015 में शुरू हुआ स्मार्ट सिटी मिशन 100 शहरों को विश्वस्तरीय सुविधाओं से लैस करने का वादा था, मगर एक दशक बाद भी यह लक्ष्य पूरा नहीं हुआ। आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2025 तक 8,062 परियोजनाओं में से 93 प्रतिशत (7,502) ही पूरी हो पाई हैं, जिन पर 1,50,285 करोड़ रुपये खर्च हुए। शेष 560 परियोजनाएं, जिनकी लागत 14,239 करोड़ रुपये है, अभी भी अधूरी हैं। मिशन की समय-सीमा को बार-बार बढ़ाया गया, आखिरी बार मार्च 2025 तक, लेकिन केवल 18 शहर—आगरा, वाराणसी, मदुरै, कोयंबटूर, उदयपुर, पुणे, सूरत और वडोदरा—ने सभी परियोजनाएं पूरी कीं। बाकी 82 शहरों में बिखरी परियोजनाएं धीमी गति, फंड की कमी और खराब नियोजन के कारण जूझ रही हैं।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, बैंगलोर की एक स्टडी के मुताबिक, मिशन का कुल बजट 1,67,875 करोड़ रुपये था, जो 2030 तक शहरों को रहने योग्य बनाने के लिए जरूरी 1.2 ट्रिलियन डॉलर से कहीं कम है। चंडीगढ़ जैसे शहर में केवल 1 प्रतिशत क्षेत्र (सेक्टर 43) पर 196 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जबकि बाकी इलाके उपेक्षित रहे। नतीजा—बाढ़, ट्रैफिक जाम और गरीब बस्तियों का विस्थापन बढ़ा। विपक्षी नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए लिखा, “स्मार्ट सिटी का सपना टूटा, सड़कें टूटीं, अब नई योजना से जनता को फिर छला जा रहा है।”
ये आंकड़े सरकारी डैशबोर्ड से मेल खाते हैं, जहां मिशन को 31 मार्च 2025 को आधिकारिक रूप से बंद कर दिया गया। फिर भी, कई शहरों में बुनियादी समस्याएं जैसे जलभराव बरकरार हैं, जो सोशल मीडिया पर #SmartCityFail के रूप में उभर रही हैं। उदाहरण के लिए, पुणे और पटना में हाल की बारिश ने सड़कों को तालाब बना दिया, जिससे जनता का गुस्सा फूट पड़ा।
*आकांक्षी कृषि जिले: नया वादा, पुरानी चुनौतियां*
केंद्र का ताजा ऐलान नीति आयोग के ‘आकांक्षी जिलों कार्यक्रम’ से प्रेरित है, जो 117 पिछड़े जिलों के विकास पर केंद्रित है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने फरवरी 2025 के बजट में इसकी घोषणा की, और जुलाई में कैबिनेट ने छह साल की इस योजना को हरी झंडी दी। यह योजना उन 100 जिलों को लक्षित करेगी जहां कृषि उत्पादकता कम है, फसल तीव्रता मध्यम और ऋण सुविधाएं सीमित हैं। इसमें 36 मौजूदा योजनाओं का समन्वय होगा, जिसमें सतत खेती, डिजिटल कृषि सेवाएं और स्थानीय स्तर पर भंडारण शामिल हैं। प्रत्येक जिले में प्रगतिशील किसानों की समितियां गठित होंगी।
सरकार का दावा है कि यह योजना राष्ट्रीय कृषि औसत को 15 प्रतिशत तक बढ़ाएगी और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के विजन को मजबूत करेगी। मगर कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा चेतावनी देते हैं, “स्मार्ट सिटी की तरह यह योजना भी कागजी साबित हो सकती है। कृषि मंत्रालय का बजट सिर्फ 4 प्रतिशत बढ़कर 1.37 लाख करोड़ रुपये हुआ, जबकि पूंजीगत व्यय घटकर 92.2 करोड़ रुपये रह गया। किसान पूछ रहे हैं—पहले की योजनाएं पूरी क्यों नहीं हुईं?”
योजना की शुरुआत रबी सीजन (अक्टूबर 2025) से होने की उम्मीद है, और यह 1.7 करोड़ किसानों को लक्षित करेगी। हालांकि, आकांक्षी जिलों कार्यक्रम की सफलता (जैसे स्वास्थ्य और शिक्षा में सुधार) के बावजूद, कृषि क्षेत्र में चुनौतियां बरकरार हैं—जैसे जलवायु परिवर्तन और बाजार पहुंच। विशेषज्ञों का कहना है कि बिना मजबूत निगरानी के यह भी स्मार्ट सिटी की तरह अधूरी रह सकती है।
*विदेशी कर्ज का संकट: खर्च का हिसाब मांग रही जनता*
इन बड़े-बड़े वादों के बीच भारत का विदेशी कर्ज चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2025 तक बाह्य ऋण 10 प्रतिशत बढ़कर 736.3 अरब डॉलर (लगभग 62 लाख करोड़ रुपये) हो गया, जो जीडीपी का 19.1 प्रतिशत है। पिछले वित्त वर्ष की तुलना में यह 67.88 अरब डॉलर की वृद्धि है, जिसमें डॉलर की मजबूती से 5.3 अरब डॉलर का वैल्यूएशन प्रभाव शामिल है। गैर-वित्तीय कॉरपोरेट क्षेत्र का कर्ज सबसे बड़ा हिस्सा है।
अर्थशास्त्री जयंत सिन्हा कहते हैं, “स्मार्ट सिटी पर 1.6 लाख करोड़ खर्च हुए, लेकिन आम आदमी को लाभ नहीं दिखा। अब नई योजना पर 24,000 करोड़ सालाना—क्या यह किसानों के लिए है या पूंजीपतियों के?” यूनाइटेड नेशंस की ‘वर्ल्ड ऑफ डेब्ट 2025’ रिपोर्ट के अनुसार, भारत में ब्याज भुगतान स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च को पीछे छोड़ रहा है। नेट संसाधन बहिर्वाह 25 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। जनता सवाल उठा रही है: “कर्ज बढ़ रहा है, लेकिन पैसा कहां जा रहा? क्या सिर्फ सेठों का भला हो रहा है?”
ये आंकड़े आरबीआई की रिपोर्ट से सटीक मेल खाते हैं, जहां कॉरपोरेट कर्ज का दबाव प्रमुख है। बढ़ते कर्ज के बीच ऐसी योजनाओं पर खर्च का हिसाब रखना जरूरी है, वरना जनता का अविश्वास गहरा जाएगा।
*जनता की पुकार: कब रुकेगा गुमराह करने का सिलसिला?*
सोशल मीडिया पर #SmartCityFail और #AspirationalScam जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। बिहार के एक किसान नेता रामजीवन यादव कहते हैं, “एक योजना पूरी नहीं होती, दूसरी शुरू। कर्ज हम चुकाएं, फायदा बड़े लोगों का।” विपक्ष ने संसद में इस मुद्दे पर बहस की मांग की है, जबकि सरकार का कहना है, “ये दीर्घकालिक योजनाएं हैं, जनता को धैर्य रखना होगा।”
विशेषज्ञों का मानना है कि बिना पारदर्शिता और सख्त निगरानी के ये योजनाएं महज वोट जुटाने का हथकंडा बनकर रह जाएंगी। जनता अब जवाब मांग रही है—क्या सरकार वास्तव में विकास चाहती है, या सिर्फ नई घोषणाओं से जनता को गुमराह करना उसका मकसद है?