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*मोक्ष में अवरोध कर्मफल जनित पुनर्जन्म है* 

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            डॉ. विकास मानव 

    जीवन अनंत रहस्यों से भरा-पूरा है, लेकिन मृत्यु उससे भी बड़ी पहेली है। मृत्यु को लेकर विज्ञान और दर्शन में अनेक प्रश्न हैं- क्या मृत्यु के बाद मनुष्य का अस्तित्व समाप्त हो जाता है या मृत्यु केवल शरीर पर ही घटित होती है ? और प्राण या आत्मतत्त्व मृत्यु के साथ ही क्या मुक्त हो जाता है? प्रश्न है कि यह आत्मतत्त्व कहाँ चला जाता है ? अगर कहीं जाता है तो कहीं से आता भी होगा ? इससे दूसरा और मौलिक प्रश्न उठता है कि क्या आत्मा सदा से है या आत्मा का भी जन्म होता है? यदि आत्मा का जन्म होता है तो इसका भी अवसान होता है क्या? क्या मनुष्य की आत्मा या प्राण बार-बार जन्म लेते हैं? पुनर्जन्म क्या है ?

    ऐसे अनेक प्रश्न जिज्ञासु चित्त को मथते हैं। विज्ञान के पास इन प्रश्नों के उत्तर नहीं हैं। दुनिया के तमाम देशों में मृत्यु के बाद के जीवन पर सोच-विचार हुआ था, लेकिन विज्ञान के पास इन प्रश्नों के उत्तर नहीं थे। भारतीय ऋषियों ने प्रकृति के रहस्यों के साथ ही मनुष्य के अंतर्जगत पर भी शोधकार्य किए थे। अतः भारत की संस्कृति ने आत्मा को अमर माना और शरीर को नाशवान।

    यह बहस पुरानी है। विश्व स्तर पर इसका विज्ञानसम्मत निर्णायक समाधान होना शेष है, लेकिन भारत में वैदिककाल से ही आत्मा का अमरत्व और देहांतरण – तर्क और अनुभूति का विषय रहे हैं। कठोपनिषद् प्राचीन उपनिषद् है। यहाँ यम और नचिकेता का प्रश्नोत्तर है। नचिकेता ने अग्नि रहस्य पूछा और यम का उत्तर मिला। वह संतुष्ट हुआ। अंतिम प्रश्न चुनौतीपूर्ण था- मृत मनुष्यों के बारे में संशय है अर्थात कुछ लोग कहते हैं कि मृत्यु के बाद यह आत्मा शेष रहती है और कुछ लोग कहते हैं कि नहीं रहती। आप सही बात का उपदेश दें।

    भारत का उत्तर वैदिककाल रोमांचकारी है। तब नचिकेता जैसे बालक भी मृत्यु संबंधी रहस्यों के प्रति जिज्ञासु हुआ करते थे। यम ने कहा कि प्राचीनकाल से ही इस विषय पर संदेह रहा है। यह विषय अति सूक्ष्म है- हि एषः धर्म अणुः । तुम कोई दूसरा वर माँगो। उपनिषद् के रचनाकाल के पहले से ही यह विषय भारतीयों की जिज्ञासा का विषय था। यम के उत्तर में आत्मा की अमरता का उल्लेख है कि यह आत्मा न जन्मती है, न मरती है। यह किसी का कारण नहीं है और न किसी का कार्य है। क्योंकि यह शाश्वत है व अजन्मा है।

    अथर्ववेद में इस अजन्मा आत्मा को अग्नि और ज्योति प्रकाश बताया गया है- अजो अग्निरजमु ज्योतिः। कहते हैं-हे अज । आप अजन्मा और स्वर्गरूप हैं- अजो ३स्यज स्वर्गोऽसि। पुनर्जन्म का भारतीय विचार इस संदर्भ में एक महत्त्वपूर्ण चिंतन कहा जा सकता है। पुनर्जन्म से जुड़ी तमाम घटनाएँ विश्व स्तर पर प्रायः घटित होती रहती हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा कि योग का यह ज्ञान मैंने विवस्वान को बताया था। 

     उन्होंने मनु को और मनु ने इक्ष्वाकु को बताया था। अर्जुन ने प्रतिप्रश्न किया आपका जन्म बाद का है और विवस्वान का बहुत प्राचीन है। श्रीकृष्ण ने कहा- “अर्जुन ! मेरे-तेरे बहुत जन्म हो चुके हैं। मैं उन्हें जानता हूँ, परंतु तू नहीं जानता है।”

    पुनर्जन्म भारतीय अनुभूति है, लेकिन ईसा ने भी श्रीकृष्ण की ही तर्ज पर कहा था- “जब अब्राहम हुआ था मैं उसके भी पहले था।” जैसे कृष्ण ने स्वयं को पूर्व हुए लोगों के भी पहले विद्यमान बताया, वैसे ही ईसा ने स्वयं को पूर्व हुए अब्राहम के भी पहले विद्यमान बताया।

      श्रीकृष्ण ने ज्ञान-संन्यास का मर्म समझाते हुए अध्याय पाँच में कहा, अपनी संपूर्ण चेतना को परम सत्ता की ओर लगाने वाले वहाँ पहुँचते हैं; जहाँ से यहाँ लौटना नहीं होता। ऋग्वेद में ऐसे लोक का वर्णन मिलता है- यत्र कामा निकामाश्च यत्र ब्रध्नस्य विष्टपम्। जहाँ सारी कामनाएँ पूरी हो जाती हैं, आप हमें वहाँ अमरत्व दें। फिर वहाँ की विशेषता का वर्णन और भी रोमांचक है-यत्रानन्दाश्च मोदाश्च, मुदः प्रमुद आसते। जहाँ आनंद है, मोद है, प्रमोद है, आमोद है, वहाँ आप मुझे अमरत्व दें।

    वैदिक साहित्य पुनर्जन्म की मान्यता से समृद्ध है। ऋग्वेद के ऋषि वामदेव कहते हैं कि-अहं मनुरभवं सूर्यश्चाऽहं, कक्षीवाँ। मैं मनु हुआ, मैं सूर्य हुआ, मैं ही कुक्षीवान ऋषि हूँ, मैं ही कुत्स हूँ और मैं ही उशना कवि हूँ। मुझे ठीक से देखो- पश्यता मा। ऋग्वेद में स्वतंत्र विवेक और गहन अनुभूति है। वामदेव कहते हैं- “मैंने गर्भ (ज्ञान गर्भ) में रहकर इंद्रादि सभी देवताओं के जन्म का रहस्य जाना है। जन्म-प्रक्रिया रहस्यपूर्ण है।” ऋग्वेद में कहते हैं कि मरणशील शरीरों के साथ जुड़ा जीव अविनाशी है।

    वैदिक चिंतन के अनुसार मृत्यु के बाद यह जीव अपनी धारणा शक्ति से संपन्न रहता है और निर्बाध विचरण करता है। यहाँ मृत्यु के बाद भी निर्बाध विचरण की स्थापना ध्यान देने योग्य है। ऋग्वेद में कहते हैं कि अमर्त्य जीव मरणधर्मा शरीर से मिलते हुए विभिन्न योनियों में जाता है। अधिकांश लोग शरीर को ही जानते हैं, पर दूसरे (जीव) को नहीं जानते।

    ऋग्वेद के एक देवता सर्वव्यापी अदिति हैं, वे अंतरिक्ष हैं, आकाश हैं, पृथ्वी हैं, भूत हैं, भविष्य हैं। अदिति ही मृत माता-पिता के दर्शन कराने में सक्षम हैं। ऋषि कहते हैं हम किस देव का स्मरण करें, जो हमें अदिति से मिलवाए, जिससे हम अपने मृत माता-पिता को देख सकें।

    उत्तर है कि हम अग्नि का स्मरण करें। वे हमें अदिति से मिलवाएँगे, अदिति के माध्यम से हम माता-पिता को देख सकेंगे। मृत माता-पिता से मिलवाने की अनुभूति ध्यान देने योग्य है; क्योंकि जीवन, मृत्यु के बाद भी प्रवाहमान रहता है।

    ऋग्वेद में वर्णित देवताओं में एक देवता यम हैं, जो कि पुण्यवानों को सुखद धाम ले जाते हैं। कहते हैं कि जिस मार्ग से पूर्वज गए हैं; उसी मार्ग से सभी मनुष्य स्वकर्मानुसार जाएँगे। कहते हैं कि हे पिता! पुण्यकर्मों के कारण पितरों के साथ उच्चलोक में रहें। पापकर्मों के क्षीण हो जाने के बाद पुनः शरीर धारण करें- स्व गच्छस्व तन्वा सुवर्चा ।

    उक्त वैदिक ऋचा में मृत पिता के पुनर्जन्म की कामना है। अथर्ववेद के ऋषि कहते हैं- वह पहले था, वही गर्भ में आता है; वही पिता, वही माता, वही पुत्र होता है। वह नए जन्म लेता है। अथर्ववेद भी ऐसी व्याख्याओं से परिपूर्ण है।

    पुनर्जन्म का विचार मिस्र में भी था। अलेक्जेन्ड्यिा के यहूदियों में भी था। कार्क हेकेल कहते हैं कि मुझे निश्चय हो चुका कि जितनी अधिक गंभीरता से हम मिस्री धर्म का अध्ययन करते हैं, उतना ही अधिक स्पष्ट हमें यह दिखता है कि लोकप्रचलित मिस्री धर्म के लिए आत्मा की देहांतर प्राप्ति का सिद्धांत बिलकुल अज्ञात था और जिस किसी गुह्य समाज में वह मिलता है, वह ओसाइरिस उपदेशों में अंतर्निहित न होकर हिंदू उद्गम से प्राप्त हुआ है।

    इजराईल के यहूदी लोगों में भी ऐसा ही विचार है। यहूदियों को यह विचार मिस्र से मिला और मिस्रियों को भारत से। यूनानी चिंतन की शुरुआत (थेल्स ई० पूर्व 600) में पुनर्जन्म जैसा विचार नहीं था। प्रथम यूनानी पाइथागोरस यूनान देशवासियों को पुनर्जन्म का सिद्धांत सिखाया। अपूलियस के अनुसार पाइथागोरस भारत आए थे।

    बुद्ध दर्शन में भी पुनर्जन्म की मान्यता है। कहते हैं कि भिक्षुओं को चार सत्यों का बोध न होने से ही मेरा, तुम्हारा संसार में बार-बार जन्म ग्रहण करना हुआ है। वे चार बातें हैं- आर्य शील, आर्य समाधि, आर्य प्रज्ञा और आर्य विमुक्ति। बुद्ध के चार सत्य आर्य सत्य हैं। बुद्धदर्शन में पुनर्जन्म का कारण अज्ञान है, उपनिषद् दर्शन में अविद्या है। पुनर्जन्म दोनों में है। अविद्या और विद्या का मूलस्रोत उपनिषद् हैं। बुद्ध को इसकी अनुभूति है।

    उन्होंने शिष्य आनंद को बताया- आनंद! क्या जरा और मृत्यु सकारण हैं? कहना चाहिए-हाँ हैं। किस कारण से हैं? कहना चाहिए-‘ भव’ (आवागमन) के कारण; तब भव किस कारण है ? कहना चाहिए- उपादान (आसक्ति) के कारण। तो उपादान क्यों है? उत्तर है कि तृष्णा के कारण। यहाँ मुख्य बात तृष्णा है। तृष्णा-शून्यता ही निर्वाण है। बौद्ध प्रचारकों का कार्यक्षेत्र एलेक्जेन्ड्रिया व एशिया माइनर रहा है। पुनर्जन्म का भारतीय विचार विभिन्न स्रोतों से विश्वव्यापी हुआ।

    भारतीय संस्कृति में पुनर्जन्म कर्मफल सिद्धांत का परिणाम है। कर्मानुसार जीव विभिन्न योनियों को प्राप्त करता है। श्रेष्ठ कर्म करके जीव मनुष्य, देवता, ऋषि आदि बनता है और निकृष्ट कर्म के द्वारा वह मानवेतर योनि को प्राप्त करता है। इसलिए सदा सत्कर्म करके जीवन को उत्कृष्ट बनाना चाहिए, ताकि हमारे सभी जन्म शुभ परिणाम वाले हों।

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