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कथनी करनी में भिन्नता ही है पाखंड

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शशिकांत गुप्ते

धर्म की आड़ में जो भी हो रहा है वह चिंतनीय है। आश्चर्यजनक बात तो यह है, धर्म की आड़ में शर्मनाक हरकत करने वाले स्वयम्भू साधु हैं।
वास्तव में साधु कैसा होना चाहिए। यह बात कबीरसाहब के दोहे से ज्ञात होती है।
साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।

संत कबीरसाहब ने साधु को परिभाषित करते हुए उक्त दोहा कहा है।
इसीतरह सभी आध्यात्मिक संतो ने साधु को परिभाषित करते हुए कहा है कि, जो व्यक्ति काम,क्रोध,लोभ,मोह,मद और मत्सर इस छः दुर्गुणों को त्याग देता है,वह साधु होता है।
वर्तमान में उपर्युक्त छः दुर्गुणों में लिप्त होकर कुछ लोग सिर्फ वेशभूषा और परिधान धारण कर मतलब मेकअप कर साधु बन जातें हैं।
इनदिनों ऐसे ही कुछ छद्म साधु बाकायदा धर्म की दुहाई देते हुए कायदे कानून को ताक रखकर हिंसक भाषा का प्रयोग खुले आम कर रहें हैं।
इस विषय पर मै विचार कर ही रहा था,उसी समय मेरे मित्र व्यंग्यकार सीतारामकी का आगमन हुआ।
जैसे ही मैने उक्त विषय पर उनके विचार जानने चाहे,वे अपनी व्यंग्यकारवाली मानसिकता में आगए।
कहने लगे इस विषय को लेकर आप क्यों व्यथित होतें हो।
इस विषय पर स्वयं भगवान रामचन्द्रजी व्यथित हैं।
सम्भवतः रामचन्द्रजी की भावनाओं को गीतकार राजेंद्र कृष्ण जी ने भाप लिया और सन 1970 में प्रदर्शित फ़िल्म गोपी में गीत भी लिख दिया।
गीतकार ने अपने गीत में लिखा है, रामचन्द्रजी अपनी अर्धांगिनी सीताजी से अपनी व्यथा किस तरह कह रहे हैं।
हे रामचन्द्र कह गए सिया से
ऐसा कलजुग आएगा
हंस चुगेगा दाना दुनका
कौआ मोती खायेगा
धर्म भी होगा कर्म भी होगा
लेकिन शरम नही होगी
जिसके हाथ में होगी लाठी
भैस वही
ले जायेगा
सुनो सिया कलजुग में कालाधन
और काले मन होंगे काले मन होंगे
चोर उच्चके नगर सेठ
और प्रभु भक्त निर्धन होंगे
हे जो होगा लोभी और भोगी
ओ जोगी कहलायेगा

सीतारामजी,गीत की कुछ पंक्तियों के माध्यम से अपनी व्यंग्यविधा को प्रस्तुत करते हुए गम्भीत बात कहने लगे।
लोकतंत्र में आमजन को वाणी की स्वतंत्रता संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। जो सत्य बोलतें हैं, अपनी वाणी के माध्यम से व्यवस्था के दोष स्पष्ट रूप से प्रकट करतें हैं, उनपर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अंकुश लगया जाता है। उन्हें देश विरोधी माना जाता है।
जो खुले आम कानून का उल्लंघन करतें वे इस बात से आश्वश्त होतें हैं,कि, जब संया भए कोतवाल तो डर काहे का
सीतारामजी ने अपनी बात जारी रखते हुए एक महत्वपूर्ण बात कही।
देश की स्वतंत्रता के लिए जिन लोगों का कोई योगदान नहीं है।वे लोग ही स्वतंत्रता का बेजा फायदा उठा रहें हैं।
जो भी हो रहा है।यह सब स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों का अपमान है।
जो भी लोग निर्भीक होकर देश में हिंसक वातावरण पैदा करना चाहते हैं।इन लोगों की ऐसी हरकतों के कारण आम जीवन प्रभावित होता है। ऐसे स्थिति में जिम्मेदारी किसकी है?
सीतारामजी ने संत तुलसीबाबा रचित इस चौपाई को उधृत करते हुए की अपनी बात समाप्त की।

जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी,
सो नृप अवसि नरक अधिकारी

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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