अग्नि आलोक

कलम शर्मिंदा हैं….!

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क़लम शर्मिंदा हैं……!
लिखने में तारीफे ज़ालिम की…!
ज़ुल्म की दस्ताने लिखने में
क़लम शर्मिंदा हैं……!


रहज़न को रहबर लिखने में…!
कल लूटी थी अस्मत जिसने….?
उसे सरदार (लीडर ) लिखें…?
चोरों की अजमत के किस्से….
अखबार लिखें..?
देश की लूट को…..?
बड़ा कारोबार लिखें…?
क़लम शर्मिंदा हैं….!
चोरों को व्यापारी लिखने में….?
हर पल हर दिन बहसों में…!
झूठ का बोलबाला है…!
सच दुबका है शर्म से…!
सच्चों की ज़ुबानों पर….!
ताला लगा है…!
ऐसे में बदकीरदारों का…?
क़लम शर्मिंदा हैं…..!
किरदार लिखने में….?
संत बनें है ठग…?
पीर लुटेरे …?
दरवेशों की चौखट पर….!
मुजाबिर …?
लूट रहें हैं दुखियों को बहुतेरे…!
खूब फला बढ़ा है इस दौर में…!
क़लम शर्मिंदा हैं….!
मज़हब का व्यापार लिखने में…?
सफेद पोशाकों में रहने वाले…?
रात अंधेरे काला मुंह करते हैं…!
बदनाम होती है मजबूरी….?
सौदा सारा यह करते हैं….!
क़लम शर्मिंदा हैं….!
तवायफ को बदकिरदार…!
लिखने में….?
जुमलों की खुराक भूखों के लिए…!
नोटों की बरसात धन्ना सेठों के लिए…!
हाकिम की हिमायत ज़ालिम के वास्ते…?
खामोश जुबान ज़ुल्म के खिलाफ…!
क़लम शर्मिंदा हैं…!
साहिल अपनी सरकार लिखने में….?

        लेखक श्री युसुफ मोहानी, संपर्क - 93058 29207 

         संकलन और संपादन -निर्मल कुमार शर्मा गाजियाबाद उप्र संपर्क - 9910629632
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