मुनेश त्यागी
आज हमारे देश में “इंडिया गठबंधन” को लेकर चर्चा जोरों पर है। भारत के अधिकांश मीडिया चैनलों और अखबारों में इंडिया गठबंधन की चर्चा छाई हुई है। विपक्षी पार्टियों के इंडिया गठबंधन को लेकर एनडीए के तमाम लोग, समर्थक और नेता एकदम बदहवास हैं और वे बौखला गए हैं। यहां पर सवाल उठता है की आखिर एनडीए के लोग और नेता इंडिया गठबंधन के मजबूत होने से इतने परेशान क्यों है?
एनडीए के नेताओं और लोगों की परेशानी समझ में आती है क्योंकि एनडीए और मोदी सरकार ने पिछले नौ साल से ज्यादा के समय में भारत के अधिकांश लोगों के लिए कुछ भी नहीं किया है। किसानों, मजदूरों, छात्रों, नौजवानों, महिलाओं, वादकारियों, बेरोजगार लोगों और बच्चों के लिए उनका कोई रिपोर्ट कार्ड और उपलब्धि नहीं है, क्योंकि एनडीए और मोदी सरकार ने उनके लिए कुछ किया ही नहीं है।
इन अधिकांश लोगों के प्रति सरकार की लापरवाही और निष्क्रियता के कारण भारत की जनता का बहुत बड़ा हिस्सा परेशान है। अधिकांश विपक्षी पार्टियां सरकार की एक तरफा और तानाशाहीपूर्ण और मनमानी और एकतरफा कार्यवाहियों से नाराज हैं। जो कोई भी विपक्षी दल, सरकार की नीतियों की आलोचना करता है तो उसके बोलने वालों के पीछे ईडी, सीबीआई, इनकम टैक्स जैसी केंद्रीय संस्थाएं लगा दी जाती हैं, उनका जैसे जीना ही मुहाल कर दिया गया है और जैसे उनकी जवान पर ताला लगा दिया गया है।
सरकार की पूंजीपति समर्थक और सांप्रदायिक गतिविधियों ने भारत के संविधान को गंभीर खतरा पैदा कर दिया है। उसने भारत के जनतंत्र, गणतंत्र, कानून के शासन, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के सिद्धांतों को लगभग धराशाई कर दिया है। सरकार की कार्यवाहियां देखकर लगता है कि जैसे उसका भारत के संविधान में, उसके आदर्शों में, उसके सिद्धांतों में कोई विश्वास नहीं है। सरकार की नीतियों के कारण हमारे देश में अमीरी और गरीबी की खाई में बहुत बड़ा अंतर पैदा हो गया है। आज भारत के 1% लोगों के पास देश की संपत्ति में 53% हिस्सा है, 9% लोगों के पास 23 परसेंट, 20 परसेंट लोगों के पास 18% और 70% लोगों के पास केवल और केवल 6% देश की संपत्ति में भागीदारी है। एकदम भंयकर किस्म की और परेशान करने वाली आर्थिक असमानता।
सरकार की इन एकतरफा और तानाशाही पूर्ण कार्यवाहियों और रवैये ने, जनता और विपक्षी दलों को एकजुट होने और उसके खिलाफ आवाज उठाने को मजबूर कर दिया गया है। सरकार की इन जन विरोधी नीतियों के कारण इंडिया गठबंधन का जन्म हुआ, जिसमें अब मुंबई में 28 पार्टियों के 63 नेता भाग ले रहे हैं। इंडिया गठबंधन की इस बढ़ती सक्रियता और मजबूती से एनडीए गठबंधन की नींद हराम हो गई है।
अब एनडीए गठबंधन के लोग तरह-तरह के अजीब सवाल उठा रहे हैं, जैसे इंडिया गठबंधन का कार्यक्रम क्या होगा? इनका प्रधानमंत्री कौन होगा? इनका सीट एडजेस्टमेंट कैसे होगा? उनकी नीतियां क्या होगी? एनडीए नेताओं के ये सवाल सुनकर एक अचम्भा सा होता है कि आखिर इन लोगों को इंडिया गठबंधन से क्या परेशानी है? उसकी क्या नीतियां होगी, उसका प्रधानमंत्री का नेता कौन होगा, ये सब तो इंडिया गठबंधन के लोगों की परेशानियां हैं। इसमें एनडीए के नेताओं को परेशान होने की क्या जरूरत है? और सरकार बनाने का मौका आने पर इस समस्या को आसानी से हल कर लिया जाएगा, जैसे 2004 और 2009 में भी इसे बड़ी आसानी से हल कर लिया गया था।
यहां पर एनडीए के लोगों की परेशानियों का कारण पूरे देश की जनता के सामने है। क्योंकि उन्होंने किसानों की फसलों का वाजिब दाम नहीं दिया है, उन्होंने मजदूरों को आधुनिक गुलाम बना दिया है, उनकी नीतियों के कारण हमारे देश में गरीबी बढ़ी है, भ्रष्टाचार बढ़ा है, बेरोजगारी बढ़ी है, महंगाई आसमान छू रही है, शिक्षा को 80 करोड़ गरीब जनता की पहुंच से बाहर कर दिया गया है और सरकार की स्वास्थ्य की निजीकरण की मुहिम ने स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण करके, वहां मुनाफाखोरी बढ़ाकर, अधिकांश जनता को स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित कर दिया है।
महंगाई रोकने का कोई रोड मैप सरकार के पास नहीं है। जैसे हमारे देश में महंगाई बढ़ाने की होड़ मची हुई है। इस महंगाई को रोकने के लिए सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया है। जैसे सरकार ने जनता को, व्यापारियों के हाथों, लुटने के लिए छोड़ दिया है और वह पूरी तरह से मंहगाई बढ़ाने वालों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खडी हो गई है, जैसे सरकार ने महंगाई बढ़ने वालों के खिलाफ कोई कार्यवाही न करने की कसम खाली है। इसी कारण भारत की अधिकांश जनता के बड़े हिस्से का जीना दूभर हो गया है।
सरकार की इन जनविरोधी नीतियों के खिलाफ इंडिया गठबंधन एक राष्ट्रीय एजेंडे पर कम कर रहा है। वह राजनीतिक परिवर्तन की लड़ाई लड़ने की बात कर रहा है। वह राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर जनकल्याण का “साझा कार्यक्रम” बनाकर, जनता के बीच जाने की बात कर रहा है और उसने खुलेआम तय किया है कि उनका जनकल्याणकारी “संयुक्त एजेंडा” होगा, जिसमें संविधान बचाओ, जनतंत्र बचाओ, गणतंत्र बचाओ, धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत बचाओ शामिल हैं।
इस संयुक्त साझा कार्यक्रम में सबको रोटी दो, सबको कपड़ा दो, सबको मकान दो, सबको शिक्षा दो, सबको स्वास्थ्य दो, सबको रोजगार दो, कमरतोड़ महंगाई पर लगाम लगाओ, किसानों की फसलों का वाजिब दाम दो, हर एक हाथ को काम दो, मजदूरों को न्यूनतम वेतन दो, जनता की कमरतोड़ मंहगाई पर कारगर रोक लगाओ, जनता को सस्ता और सुलभ न्याय उपलब्ध कराओ, देश के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग जनता के विकास के लिए करो, भारत के सारे बुजुर्गों को₹15000 महीना पेंशन दो, बिजली दरों को कम करो, पब्लिक सेक्टर की सम्पत्तियों को चंद पूंजीपतियों को बेचना बंद करो, जनता का धन जनता के कल्याण के लिए इस्तेमाल करो पूंजीपतियों को दिए गए लोन वापस लो, जैसी मांगों को शामिल करने की बात हो रही है। इस साझा कल्याण के कार्यक्रम को लेकर, एनडीए के नेताओं और समर्थकों में भारी बेचैनी पैदा हो रही है।
यह बात भी नोट करने की है की 2019 के लोकसभा चुनावों में एनडीए को 22.9 करोड़ वोट मिले थे तो और विपक्षी दलों को 23.4 करोड़ वोट मिले थे। अब यदि इंडिया गठबंधन, बीजेपी को चुनौती देने के लिए लोकसभा चुनाव में वन टू वन कैंडिडेट खड़ा करेगा तो यह यकीनन तौर पर कहा जा सकता है कि इससे एनडीए गठबंधन को भारी क्षति होने जा रही है, जिसके चलते वह कभी भी सत्ता में नहीं लौट पाएगा। इसको लेकर भी एनडीए उसके लोग और उसके तमाम समर्थक बेहद परेशान हो रहे हैं।
उपरोक्त समस्त तथ्यों की रोशनी में यह पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि यदि इंडिया गठबंधन एकजुट होकर एनडीए गठबंधन के खिलाफ मैदान में उतरता है और एक साझा कार्यक्रम बनाकर जनता के बीच जाता है तो इससे एनडीए गठबंधन को पूरी परेशानी होने जा रही है। एनडीए गठबंधन की सरकार के पिछले नौ साल ने यह सिद्ध कर दिया है की उसके पास चंद पूंजीपति मित्रों की धन संपत्तियां बढ़ाने के अलावा, हमारे देश की अधिकांश जनता को देने के लिए कोई कार्यक्रम नहीं है और यह बात जनता जान चुकी है और अब वह उनके छलावे में, उनके झूठ में और छल कपट में, आने से बचने की पूरी कोशिश करेगी और उन्हें सत्ता से बाहर कर देगी। जनता की यही मनःस्थिति, एनडीए गठबंधन के नेताओं और समर्थकों की बदहवासी, बौखलाहट और घबराहट का सबसे बड़ा कारण बनती जा रही है।

