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तुमसे पहले जो एक शख्स यहां तख्तनशीं था,उसको भी अपने खुदा होने पे इतना ही यकीं था

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प्रणव प्रियदर्शी

हम दिन-रात अपने जैसे दूसरे मनुष्यों और तमाम जीव-जंतुओं को मृत्यु के मुख में जाते देखते हैं, फिर भी यह माने रहते हैं कि हमारा कभी अंत नहीं होगा। इसे ही आश्चर्य बताया था युधिष्ठिर ने महाभारत में, यक्ष के पूछने पर। हम इसे आश्चर्य मानें या न मानें, इस कथन की सचाई में संदेह नहीं कर सकते। करें भी कैसे। कोई ऐसा शख्स मिला कहां है हमें जो हर पल यह मानते हुए जीता हो कि वह इस पल है मगर अगले पल पता नहीं हो या न हो।

हम सब तो यह मानते हुए जीते हैं कि पल-छिन की क्या बात, हमें अभी लंबा जीना है। तभी तो चुनौतियों को हम चुनौतियों की तरह लेते हैं, भविष्य की लंबी योजनाएं बनाते हैं, उन्हें अमल में लाने के लिए जी जान लगा देते हैं। हर पल यही सोचते रहें कि पता नहीं अगला पल देखना हमें नसीब हो न हो, तो क्या खाक जिएंगे।

यक्ष और युधिष्ठिर की जो भी चिंताएं रही हों, जीवन को जी भरकर जीने में कोई बुराई नहीं है। समस्या तब आती है, जब हम दूसरों के हिस्से का भी खुद जी लेने की कोशिश करते हैं।

अपने जीवन की चुनौतियां पूरी होती लगने लगती हैं तो बच्चों की चुनौतियों को अपनी चुनौती मान लेते हैं। उनकी पढ़ाई, उनका रिजल्ट, उनका करियर, उनकी शादी, उनके लिए घर – इन सबका बोझ अपने कंधों पर लेना हमें अपना परम पुनीत कर्तव्य लगने लगता है। उनकी सारी जरूरतें अपने जीते जी पूरी करने के मिशन में लगे रहते हैं। यह भी नहीं सोचते कि उनकी सारी चुनौतियों से हम निपट लेंगे तो अपनी जिंदगी में वे क्या करेंगे। ऐसे में क्या उनकी जिंदगी बोरिंग नहीं हो जाएगी?

ऐसे सवालों से हम आंखें मूंदे रहते हैं, लेकिन जब यही प्रवृत्ति हमारे जनप्रतिनिधियों में दिखती है तो हम बौखला उठते हैं। वे भी अपनी जरूरतों के बाद अपने करीबियों के बारे में, उनका भविष्य संवारने के बारे में सोचते हैं और हमें यह बात बेहद अनैतिक लगती है। भाई-भतीजावाद को हम सार्वजनिक जीवन की सबसे बड़ी बुराई कहने में संकोच नहीं करते।

पर अलग-अलग रूपों में यह बीमारी हर दल, हर नेता के साथ जुड़ी नजर आती है। चाहे वह शुरू से अपने सरोकार पत्नी और बच्चों तक सीमित रखते दिखने वाले लालू प्रसाद हों या जिंदगी भर परिवार से दूरी बरतते नजर आने के बाद आखिरी पलों में बेटे को उत्तराधिकारी बनाने की बेकरारी प्रदर्शित करने वाले नीतीश कुमार। राजनीति से अलग, गैर क्रिकेटर बेटे को क्रिकेट में स्थापित करने की भी राह बीजेपी नेतृत्व ने दिखा ही दी है।

इसी प्रवृत्ति का एक और रूप हमें दुनिया भर के (जीवंत या नाम मात्र के) लोकतंत्रों में मिलता है। एक बार एक कार्यकाल के लिए चुने जाने के बाद कई शासक बार-बार चुने जाने की जिम्मेदारी खुद अपने कंधों पर लाद लेते हैं। इसमें जनता या मतदाता को किसी तरह का लोड नहीं देते। वे पूरी कोशिश करते हैं कि लोगों को उनके अलावा दूसरा कोई विकल्प जमे ही नहीं, बल्कि अगर संभव हो तो दिखे ही नहीं। इसके लिए प्रचार-दुष्प्रचार के साथ ही तमाम छल-छद्म करते हैं।

यहां भी यही प्रवृत्ति है, खुद को स्थायी मानने की। वे यह माने रहते हैं कि एक बार सत्ता में आ गए तो अब तो यह सत्ता उनकी है और वे इस सत्ता के। उनका सत्ता से अलग होना मुमकिन ही नहीं।

इसी अवस्था को वर्णित करते हुए एक वेबसीरीज में श्रीमान नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने कहा था, ‘कभी-कभी तो लगता है कि साला अपुन इच भगवान है।’ इस अवस्था में आने के बाद स्वाभाविक ही शासकों को नियम-कानूनों और लोकतांत्रिक परंपराओं का पालन करना बिल्कुल गैरजरूरी लगने लगता है। इसी अवस्था को, और इसके परिणामों को लक्षित करते हुए किसी शायर ने कहा है,

तुमसे पहले वो जो एक शख्स यहां तख्तनशीं था,

उसको भी अपने खुदा होने पे इतना ही यकीं था।

(प्रणव प्रियदर्शी वरिष्ठ पत्रकार-लेखक हैं। हाल में उनकी दो किताबें आई हैं, “चौराहों पर चौराहे” और रुचिरा गुप्ता की “आई किक एंड आई फ्लाई” का अनुवाद “मैं लड़ी और उड़ी”।)

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