अनिल सिंह
सोशल मीडिया पर पांच सौ के नोटों की गड्डियों के साथ एक पुलिस वाले के बच्चों की तस्वीर क्या वायरल हुई, जैसे लोगों को पुलिस पर उंगली उठाने का मौका मिल गया। पुलिस वालों को भ्रष्ट साबित करने की होड़ मच गई। दरअसल, हम दुखी लोग हैं। किसी की खुशी देखकर, हम अंदर से सुलगने लगते हैं। किसी की सम्पन्नता देखकर पेट में मरोड़ होने लगता है। कोई गड़बड़ी मिलते ही, पुलिस तो जैसे हमारे खेलने का सामान हो जाती है। लोगों को तो बस दरोगाजी के पैसों के बंडल दिख रहे हैं, लेकिन यह पैसे कितने मुश्किल से आये होंगे, इससे किसी को कोई लेना देना नहीं है।
भले आप पुलिस में हों या फिर प्रशासन में, पैसे आसानी से नहीं आते। पेड़ पर नहीं उगते, मेहनत करना पड़ता है। इन पैसों के लिए दरोगा साहब को पता नहीं कितने जतन करने पड़े होंगे। कितना शैतानी दिमाग लगाना पड़ा होगा, कितनों को जलील करना पड़ा होगा, पता नहीं कितनी बार अपना जमीर बेचना पड़ा होगा, कितनों को हड़काना पड़ा होगा, कितनों को फर्जी फंसाना पड़ा होगा, कितनों को फंसाने की धमकी देकर वसूली करनी पड़ी होगी, कितनों के साथ अन्याय करना पड़ा होगा, कितने गलत को सही और सही को गलत साबित करना पड़ा होगा, पता नहीं कितनी बार आत्मा को मारना पड़ा होगा, तब जाकर मुश्किल से मिली होंगी ये चंद गड्डियां। आसान नहीं होता है पैसे बनाना।
परंतु, किसी को दरोगाजी की यह मेहनत नहीं दिखी होगी, कानून के प्रति समर्पण का भाव नहीं दिखा होगा, केवल नोटों का बंडल दिखा होगा। मैं तो मानता हूं कि पुलिस को लेकर इस देश का नजरिया ही बहुत घटिया और दोयम दर्जे का है। कुछ भी होते ही हम पुलिस पर दोषारोपण शुरू कर देते हैं, जबकि यह वही पुलिस है, जो आपके परिवार के खोये हुए सदस्य को खोजे या ना खोजे बड़े लोगों का भैंस-कुत्ता अवश्य खोज निकालती है। इतना महत्वपूर्ण कामों के बावजूद हम पुलिस की कौन सी मदद करते हैं? हम स्वेच्छा से पुलिस को कितनी बार पैसा देते हैं? एक बार भी नहीं, उन्हें खुद वसूली करनी पड़ती है। मुझे तो शर्म आती है कि पुलिस को धमकाकर-हड़काकर वसूली करने को मजबूर होना पड़ता है।
एक आम आदमी कितनी बार पुलिस के काम आया? क्यों नहीं किसी नागरिक ने मुठभेड़ के बाद अंधेरे का लाभ उठाकर भागने वाले व्यक्ति को पकड़कर कभी पुलिस को सौंपा? क्या सब पुलिस की ही जिम्मेदारी है? नागरिकों की लापरवाही से ही पुलिस कभी अंधेरे का लाभ नहीं उठा पाती, अंधेरे का लाभ केवल अपराधी उठाता है। मजबूरन पुलिस को दिन में लाभ उठाना पड़ता है, जिसमें कई बार बेचारे पकड़े भी जाते हैं। मैं तो मांग करता हूं कि वसूली की जिम्मेदारी सीधे कप्तान और आईपीएस की होनी चाहिए, लेकिन पुलिस सिस्टम उल्टा काम करता है। छोटे पुलिस वाले वसूलकर मोटी रकम बड़े साहब को देते हैं, जो गरीब-मजलूम पुलिस वालों के साथ अन्याय है।
कई चुनौतियों से जूझने के बावजूद पुलिस पर उठने वाले सवाल कभी कम नहीं होते। पुलिस पर आरोप लगाने से पहले अपने गिरेबान में झांकों बे आम नागरिकों, है तुम्हारी औकात इतनी मेहनत करके पैसा जुटाने की? तुम्हें ऐसा करते शर्म आयेगी, लेकिन पुलिस शर्म-हया को दरकिनार कर मेहनत करती है, तब जाकर एक थाने और कप्तान की कुछ मात्र कुछ लाखों की कमाई हो पाती है। आसान नहीं है इतना हरामखोर और भ्रष्टाचारी होना, लाज-हया सब त्यागनी पड़ती है। एक पुलिसवाला यह सब त्यागकर कैसे जीता है, यह हमारे जैसे आम नागरिक क्या जानेंगे बे? बेगैरत होकर जीना पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के अलावा केवल नेता समझ सकता है, आम आदमी नहीं। आम आदमी तो साला एक नंबर का बेचारा है, उससे हरामीपना की उम्मीद करना मूर्खता है।
कुछ लोग अपराध बढ़ने पर भी पुलिस को कोसते हैं, लेकिन यह नहीं सोचते कि अपराध होगा ही नहीं तो पुलिस रोकेगी किसे? पुलिस फिर काम क्या करेगी? पुलिस तनख्वाह तो काम करने का ही लेती है ना, तो जब अपराध बढ़ेंगे, तभी तो पुलिस अपराध रोकने का काम करेगी। अपराध बढ़ना ही पुलिस के काम करने की निशानी है। जाहिर सी बात है, खाली दिमाग शैतान का घर होता है। पुलिस जब खाली रहेगी तो यहां छापा मारेगी, वहां छापा मारेगी। किसी को हेरोइन-गांजा और कट्टा में फंसाने को सोचेगी। किसी चोर-बेईमान सेठ के यहां के छापा मारकर परेशान करेगी। अरे, पुलिस किसी को परेशान करने तो बैठी नहीं है, पुलिस का काम है अपराध रोकना। और जब अपराध होगा नहीं तो पुलिस रोकेगी किसे?
अपराध बढ़ने पर तो लोगों को खुश होना चाहिए कि पुलिस काम कर रही है, लेकिन कुछ मूरख इस पर भी खुश नहीं होते बल्कि घिनौने आरोप लगाते हैं। आरोप लगाते समय पुलिस के स्टैंडर्ड का भी ख्याल नहीं रखा जाता है। कुछ बेहद आम नागरिक आरोप लगाते हैं कि पुलिस अपने संरक्षण में हेरोइन, गांजा, चरस, अफीम, शराब, मिलावटी डीजल-पेट्रोल बिकवा रही है। अब इन मूर्खों को कौन समझाये कि पुलिस ये सब नहीं बिकवायेगी तो क्या गरीबों वाले चना और मूंगफली बिकवायेगी? अबे स्टैंडर्ड भी कोई चीज होती है। वैसे भी, पुलिस ये सारे काम मुफ्त में करवाती है, इसके लिये वह सरकार से कोई तनख्वाह भी नहीं लेती है। पुलिस की महानता है कि तनख्वाह वह केवल अपराध रोकने का लेती है, बाकी अवैध काम वह जनसेवा समझकर मुफ्त में करती है।
पुलिस जनता की सेवा के लिये है, और उसका काम है अपराध कम करना। पुलिस जब अपराध कम करने के लिये एफआईआर नहीं लिखती है, तब भी हमको शिकायत रहती है। पुलिस आंकड़ों के माध्यम से अपराध कम करती है, तो हमें उसका साथ देना चाहिए, लेकिन हम लूट, डकैती, चोरी, रेप की घटना होने पर फटाक से पुलिस के पास पहुंच जाते हैं। एफआईआर कराने की जिद्द करने लगते हैं। पुलिस के पास केवल एफआईआर दर्ज करने और अपराधियों को पकड़ने की ही जिम्मेदारी नहीं होती है, उन्हें थाना क्षेत्र में मादक द्रव्य बिकवाने से लेकर वसूली तक के दर्जनों काम होते हैं। फर्जी फंसाने और फरियादियों से मारपीट एवं गाली-ग्लौज करने की जिम्मेदारी होती है। यार कानून-व्यवस्था सुधारने का काम जब पुलिस ही करेगी तो हम और आप क्या करेंगे? घास छिलेंगे?

