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तार्किक राजनीति का प्रचलन?

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शशिकांत गुप्ते

इनदिनों राजनीति में सक्रिय लोग तर्कशास्त्री Logician हो गए हैं।
महाराष्ट्र के ‘भूत’ पूर्व मुख्यमंत्री की अर्धांगिनी ने अभूतपूर्व तर्क प्रस्तुत किया है। मुम्बई में ट्रैफिक जाम के कारण 3℅ तलाक़ होतें हैं। निश्चित ही मोहतरमा ने यह तर्क गहन अनुसंधान के बाद ही प्रस्तुत किया होगा? मोहतरमा जो अनुसंधान किया होगा उसमें निश्चित यह निष्कर्ष निकाला होगा कि, मुम्बई में सन 2019 के दिसंबर के बाद मतलब सत्ता परिवर्तन के बाद ही ट्रैफिक जाम होता होगा। इसके पूर्व तो मुम्बई का यातायात एक सुगम,और सुचारू रूप से चलता होगा?
पिछले लगभग आठ वर्षों से राष्ट्रवादी,आस्थावान और निहायत ही ईमानदार लोग सत्ता में विराजित हुए हैं। इनके लिए एक विशेषण और है, पहली बार। इन लोगों में तकरीबन सभी तर्कशास्त्री हैं।
कोई अपने शरीररसौष्ठव की (56 इंच का सीना) तर्क पूर्ण स्तुति स्वयं ही करता है?कोई चुनाव में मतदान के लिए उपयोग में लाई जा रही इवीम मशीन में करंट की खोज कर ऐसा तर्क प्रस्तुत करता है और, इवीम मशीन का करंट आंदोलनकारियों के स्थान पर पहुँचा देता है।
इलेक्ट्रिक अभियंताओं का कहना है कि यदि किसी मशीन में करंट फैलाता है,मतलब उस मशीन में कोई तकनीकी Fault मतलब दोष है। सरल भाषा में कहा जाता है कि, मशीन बिगड़ी हुई है।
सन 2019 के चुनाव में एक बहुत मनोरंजक तर्क सुनने में आया था। चुनाव यदि अपने देश के विपक्षी दल के विजयी होने पर जश्न पडौसी देश में होने की तार्किक सम्भवना प्रकट की गई थी।
इनदिनों पाँच राज्यों में चुनावी सरगर्मी चल रही है। चुनाव में तर्कशास्त्रियों को मूलभूत मुद्दों से कोई मतलब नहीं है? चुनाव के समय इन तमाम तर्कशास्त्रियों को पडौसी देश और उसके प्रथम मुखिया से असीम प्रेम पैदा हो जाता है।
उपर्युक्त मुद्दों पर गम्भीरता विचार विमर्श करने पर सहज ही एक तर्क उपस्थित होता है।
पूर्व में मतलब सामंती युग में राजाओं, महाराजाओं को मनोरंजन के लिए दरबार में विदूषक रखना पड़ते थे। विदूषक राजाओं महाराजाओं का मनोरंजन करतें थे।
सर्कस में जोकर होतें हैं।
पुरानी मतलब सत्तर के दशक के पूर्व की तमाम फिल्मों में हास्य कलाकार होतें थे। कितनी भी सीरियस फ़िल्म क्यों न हो, उस फिल्म में भी एक दो हास्य कलाकार अनिवार्य रूप से होतें थे।
जब से अभिनेताओं ने ही हास्य की भूमिका अदा करना शुरू कर दिया है,फिल्मों में हास्य कलाकारों की जरूरत ही नही पड़ती है।
फिल्मों में एक विशेषता होती है। जो खलनायक का अभिनय करतें हैं। वे सभी कलाकार चरित्र अभिनेता कहलाते हैं। खलनायक और चरित्र अभनेता फिल्मों में ही पाये जातें हैं।
फिल्मों की अधिकांश कहानियां काल्पनिक ही होती है। फिल्मों में मात्र तीन घण्टे में मनुष्य जीवन के भूत, वर्तमान और भविष्य के दर्शन हो जातें हैं।
इसी प्रकार हूबहू राजनीति में हास्य कलाकारों की जरूरत नहीं है। तमाम तर्कशास्त्री लोग ही मनोरंजन करने के लिए सक्षम हैं।
वैसे यथास्थितिवादी कहतें हैं कि, तर्क सत्य का शत्रु होता है?
उक्त लेख महज तार्किक है।
लेखक ने भी अपने तर्क प्रस्तुत किए हैं। इन्हें कोई भी गम्भीरता से समझने की कोशिश ना करें।यही निवेदन है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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