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संसदीय लोकतंत्र का गला घोंटने पर उतर आई है वर्तमान सरकार

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मुनेश त्यागी 

      आजकल पूरा देश और दुनिया भारतीय संसद में लगातार हो रहे अजीबोगरीब कारनामों को देख रही है। भारत की संसद में विपक्षी दलों के सांसद अपनी आवाज उठाते हैं, सरकार से सवाल पूछते हैं, मगर सरकार इनका कोई जवाब नहीं देती और सवाल पूछने वाले सांसदों को निलंबित करके संसद से बाहर निकाल दिया जाता है और उनकी आवाज बंद कर दी जाती है।

     भारत के संविधान में सरकार और विपक्ष के सिद्धांत मौजूद हैं, जिनके आधार पर संसद का काम चलता है। दुनिया में जहां जहां पर संसदीय व्यवस्था कायम है, वहां पर संसद के दोनों सदनों में सांसद चुने जाते हैं। वहां पर पक्ष और विपक्ष होता है। एक तरफ सरकार देश को चलाने के लिए नियम कानून बनती है। वहीं दूसरी तरफ विपक्ष सरकार के मंत्रियों पर,  सरकार पर, उनके कारनामों पर, उनकी गतिविधियों पर, उनकी भूल चूक पर सवाल उठाते हैं, उनसे सवाल पूछते हैं और वहां पर सांसदों द्वारा सरकार की कार्यवाहियों पर और सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों पर बहस और चर्चा की मांग का प्रावधान है।

     भारत की संसदीय व्यवस्था में भी यही प्रावधान मौजूद हैं जहां पर सारे सांसद चुनकर आते हैं, बहुमत के सांसद अपनी सरकार बनाते हैं और विपक्ष के सांसद सरकार के बनाए गए कानून पर और सरकार द्वारा की गई कार्यवाहियों पर नुक्ता चीनी करते हैं, सवाल-जवाब करते हैं। अगर सरकार के कार्य और तौर-तरीके गलत हैं तो उनकी आलोचना करते हैं। इसी आधार पर हमारे देश की संसदीय व्यवस्था चल रही है।

     मगर भारत की संसद पिछले कुछ दिनों से बहुत ही अजीबोगरीब मार्ग पर चलायी जा रही है। पूरे देश और दुनिया के लोग देख रहे हैं कि भारत की सरकार जब कार्य करती है, नियम कानून बनाती है। मगर जब विपक्षी दलों के सांसद सरकार की इन गतिविधियों पर, इन कार्यवाहियों पर और सरकार द्वारा बनाए गए नियम कानूनों पर नुक्ता चीनी करते हैं, जनहित में उनकी आलोचना करते हैं और उन पर बहस की मांग करते हैं, तो सरकार इसे बर्दाश्त नहीं कर रही है और अब तो सरकार इन्हें निलंबित कर संसद से बाहर का रास्ता दिखाने पर उतर आई है।

      पिछले कई महीनों से हम देख रहे हैं कि जो भी विपक्षी सांसद सरकार से सवाल पूछ रहे हैं, कानूनों पर बहस की मांग कर रहे हैं और उसके जनविरोधी स्वरूप की आलोचना कर रहे हैं तो उनको सरकार द्वारा संसद से निलंबित कर दिया जाता है और उनकी आवाज बंद कर दी जाती है। इसी क्रम में राहुल गांधी, संजय सिंह, महुआ चटर्जी और अब विपक्षी दलों के 143 सांसदों को सरकार द्वारा निलंबित कर दिया गया है और उनकी जायज विरोध की मांग को भी खारिज कर दिया गया है।

     सरकार की ये तमाम कार्यवाहियां एक मिशन के एक सोची समझी रणनीति के तहत पूरी की जा रही है। इसमें सरकार मानकर चल रही है है कि उसने जो कुछ भी किया है, जो कानून पास किये हैं, सारी संसद, पक्ष और विपक्ष, उसे बिना किसी नुक्ता चीनी के, बिना किसी रोक-टोक और बिना किसी बहस के, बिना किसी चर्चा के मानकर स्वीकार कर ले और पास कर दे। सरकार की ये समस्त कारवाइयां और चालबाजियां, संसदीय जनतांत्रिक प्रणाली के एकदम विपरीत और अमान्य हैं।

     दरअसल सरकार की इस कार्य प्रणाली के पीछे एक बहुत बड़ा राज है और वह यह है कि यह सरकार मनुवादी सिद्धांतों में विश्वास करने वाली सरकार है। मनुवाद में पक्ष विपक्ष, बहस, आलोचना का कोई कॉन्सेप्ट नहीं है। वहां पर न्याय, अन्याय, समता, समानता, भाईचारे की कोई बात पर चर्चा करने का प्रावधान ही नहीं है। वर्तमान सरकार भी इसी चिंतन और सोच पर आधारित है। वह भी संसद में किसी चर्चा होने पर विश्वास नहीं करती है, किसी बहस करने पर उसका विश्वास नहीं है, बस उसने जो कर दिया, वही सही है।

      इस प्रकार हम देख रहे हैं कि वर्तमान सरकार केवल और केवल देश और दुनिया के चंद पूंजीपतियों के हितों को आगे बढ़ाने की बात और काम कर रही है। वह केवल इन चंद पूंजीपतियों की धन संपत्ति बढ़ाने और तिजोरियां भरने का काम कर रही है। किसानों मजदूरों नौजवानों की समस्याओं पर विचार करना उसकी नीतियों में नहीं है। पूरे देश में फैली गरीबी भुखमरी शोषण जुल्म अन्याय विकराल रूप धारण कर ती जा रही गैरबराबरी भ्रष्टाचार महंगाई को दूर करना, उसके एजेंडे में शामिल नहीं है। अगर कोई विपक्षी सांसद इस सोच और मार्ग में रोड़ा बनता है तो सरकार उससे निजात पा लेना चाहती है और वह किसी भी तरह की चर्चा, बहस या आलोचना सुनना नहीं चाहती।

      इसी मन: स्थिति के साथ सरकार लगातार विपक्षी सांसदों पर हमले कर रही है, उनकी गैरवाजिब आलोचना कर रही है और अब उसने विपक्षी सांसदों को बिना किसी खौफ के, संसद से ही बाहर करने का रास्ता अख्तियार कर लिया है। अब वह सोची समझी मनमानी पर उतर आई है अब उसे संवैधानिक प्रक्रियाओं का कोई लिहाज नहीं रह गया है और वह पूरी तरह मनमानी, तानाशाही और फासीवाद पर उतर आई है। इस प्रकार सरकार की ये समस्त गतिविधियां और सोच बता रही है कि उसने संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था का गला घोट दिया है और उसने संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था और संविधान के बुनियादी सिद्धांतों को तिलांजलि दे दी है। अब वह बिना विपक्ष के ही सरकार चलाने की मानसिकता पर उत्तर आई है।

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