तेजपाल सिंह ‘तेज’“
दलित राष्ट्रपति नहीं, दलित प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और नौकरशाही में
उच्च पदों पर न्यायपूर्ण भागीदारी। और सबसे बढ़कर—एक ऐसा समाज जहाँ किसी दलित को
सिर्फ ‘दलित’ न समझा जाए, बल्कि ‘मनुष्य’ समझा जाए। जब तक यह नहीं होता, तब तक ‘एक
दलित का राष्ट्रपति होना’ सत्ता की सजावट है—सशक्तिकरण नहीं। यह उस विडंबना को
उजागर करता है जहाँ समाज का सबसे हाशिए पर खड़ा व्यक्ति सत्ता के सबसे ऊँचे सिंहासन पर
बैठा प्रतीत होता है, लेकिन असल में सबसे दूर होता है निर्णय की शक्ति से।

भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है जहाँ संविधान के अनुसार हर नागरिक को समान
अधिकार प्राप्त हैं। संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने सामाजिक न्याय और समानता
की अवधारणा को इस देश की आत्मा बनाया। किंतु क्या आज का भारत उस आत्मा को जीवित
रखे हुए है? दलितों के संदर्भ में यह प्रश्न और अधिक तीव्र हो जाता है। यद्यपि देश ने दलित
राष्ट्रपति देखे हैं—के. आर. नारायणन से लेकर द्रौपदी मुर्मू तक—परंतु क्या यह ‘प्रतिनिधित्व’
वास्तविक सत्ता में हिस्सेदारी में तब्दील हो पाया है? क्यों दलित प्रधानमंत्री या प्रभावशाली
मुख्यमंत्री बनने की स्थिति में नहीं पहुंच पाते, लेकिन राष्ट्रपति जैसे ‘शुभंकर’ पद के लिए
उपयुक्त माने जाते हैं?
भारतीय लोकतंत्र में जब किसी दलित को राष्ट्रपति पद जैसे सर्वोच्च संवैधानिक स्थान पर
नियुक्त किया जाता है, तो पूरा राजनीतिक तंत्र इसे ‘समावेश’ और ‘सशक्तिकरण’ की उपलब्धि
के रूप में प्रस्तुत करता है। किंतु यह उपलब्धि अक्सर केवल प्रतीकात्मक होती है, न कि
सामाजिक या राजनीतिक यथार्थ की कोई ठोस अभिव्यक्ति। जिस समाज में आज भी दलितों को
मंदिर में प्रवेश से रोका जाता है, कुएँ से पानी भरने पर पीटा जाता है, और दलित महिलाओं के
साथ बलात्कार को सत्ता का साधन माना जाता है—वहाँ एक दलित का राष्ट्रपति होना क्या
सच में बदलाव का संकेत है, या सिर्फ एक परदे के पीछे छिपी असमानता की चमकदार परत?
राष्ट्रपति पद: अधिकार या प्रतीक?
भारत का राष्ट्रपति पद संवैधानिक दृष्टि से अत्यंत गरिमामय है, लेकिन कार्यपालिका
की शक्ति वास्तविक रूप से प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद में निहित होती है। राष्ट्रपति की
भूमिका, विशेष रूप से दलित राष्ट्रपति की, सत्ता की एक ऐसी छवि गढ़ती है जो सामाजिक
न्याय का भ्रम रचती है लेकिन असल फैसले कहीं और लिए जाते हैं। दलित को राष्ट्रपति बनाकर
एक ‘सांकेतिक समावेश’ (Symbolic Inclusion) का प्रदर्शन किया जाता है—वास्तविक सत्ता
की कुर्सी से बहुत दूर।
“द्रौपदी मुर्मू”: दलित नहीं, आदिवासी—फिर भी प्रतीकात्मकता का उपयोग
2022 में जब द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाया गया, तो सत्ताधारी दल ने इस निर्णय को
“आदिवासी सशक्तिकरण” और “महिला सशक्तिकरण” की मिसाल बताया। मीडिया से लेकर
संसद तक, इसे एक ऐतिहासिक कदम कहा गया। लेकिन उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे
आदिवासी बहुल राज्यों में आदिवासियों पर हो रहे अत्याचार, वन अधिकार अधिनियम की
उपेक्षा, और विस्थापन की घटनाएँ यह उजागर करती हैं कि यह सिर्फ एक चेहरा था, न कि
व्यवस्था में परिवर्तन।
उड़ीसा: द्रौपदी मुर्मू की मातृभूमि में दलितों और आदिवासियों की दुर्दशा
उड़ीसा, जो राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की जन्मभूमि है, आज भी आदिवासी और दलित
अत्याचारों का गढ़ बना हुआ है। कुछ उदाहरण:
- 2022, कोरापुट: एक दलित युवक को चोरी के संदेह में पेड़ से बांधकर पीटा गया,
पुलिस मूकदर्शक बनी रही। - 2023, मलकानगिरी: एक आदिवासी महिला को डायन बताकर जिंदा जला दिया गया,
और कोई प्रभावशाली सरकारी हस्तक्षेप नहीं हुआ। - 2024, बालासोर: दलित बस्ती में आगजनी की गई, लेकिन मुख्यधारा मीडिया में यह
घटना महज एक लाइन की खबर बनी रही।
जब एक आदिवासी महिला देश की राष्ट्रपति हो और उसी राज्य में आदिवासी महिलाओं
का सम्मान सुरक्षित न हो, तो यह प्रतीकात्मकता व्यंग्य बन जाती है।
दलित प्रधानमंत्री क्यों नहीं? - सवाल यह है कि दलितों को राष्ट्रपति बनाने में कोई संकोच नहीं होता, लेकिन
प्रधानमंत्री या मुख्य मंत्री बनाने में इतनी हिचक क्यों? इसके उत्तर में भारतीय लोकतंत्र की
संरचनात्मक असमानता छुपी है। दलित नेतृत्व का उदय कभी सत्ता का केंद्र नहीं बन सका। जब
बहुजन समाज पार्टी की सरकार उत्तर प्रदेश में आई, तब भी मायावती को ‘दलित की बेटी’
कहकर सीमित कर दिया गया, जैसे वह केवल दलितों की नेता हैं, देश की नहीं।
ब्राह्मणवादी सत्ता-तंत्र को यह सहज नहीं लगता कि निर्णय लेने वाले पदों पर कोई
दलित बैठें। उनके लिए दलित ‘दर्शाया जा सकता है’, लेकिन ‘निर्देश दे’ यह नहीं स्वीकार्य।
मीडिया, कॉरपोरेट और नौकरशाही—इन तीन स्तंभों में दलितों की भागीदारी अत्यंत नगण्य
है, जिससे वे सत्ता तक पहुँचने की प्रक्रिया में स्वाभाविक रूप से बाधित होते हैं।
प्रतिनिधित्व बनाम अधिकार
राष्ट्रपति के रूप में किसी दलित या आदिवासी को चुनना प्रतिनिधित्व की ‘आभासी’ पूर्ति
है, लेकिन जब तक उन्हें वास्तविक नीति-निर्धारण और सत्ता के केंद्र में भागीदारी नहीं दी
जाती, तब तक यह लोकतंत्र की आत्मा के साथ छल है। सत्तारूढ़ दलों द्वारा दलितों को उच्च पदों
पर नियुक्त करना एक राजनीतिक चतुराई भी है—वे इससे दलित वोट बैंक को आकर्षित कर
लेते हैं, लेकिन उनकी सामाजिक स्थिति में सुधार नहीं आता।
डॉ. अंबेडकर की चेतावनी — डॉ. अंबेडकर ने कहा था:
“Political democracy cannot last unless there lies at the base of it
social democracy.” (“राजनीतिक लोकतंत्र तब तक कायम नहीं रह सकता, जब तक कि
उसके आधार में सामाजिक लोकतंत्र न हो।” आज यदि हम सामाजिक लोकतंत्र को दरकिनार
करके राजनीतिक दिखावटीपन में रम गए हैं, तो हम उस चेतावनी की अनदेखी कर रहे हैं।
हमें क्या चाहिए—दलित राष्ट्रपति या दलित न्याय?
एक दलित का राष्ट्रपति होना यदि दलित समुदाय की बेटियों को बलात्कार से, उनके
बेटों को मॉब लिंचिंग से, और बस्तियों को जलाए जाने से नहीं बचा सकता—तो वह केवल एक
संवैधानिक ‘कवच’ है, जिसमें आत्मा नहीं है। अत: हमें चाहिए —
- वास्तविक सशक्तिकरण, जिसमें दलित नीति-निर्धारण में भागीदार हों;
- सामाजिक सम्मान, जो केवल राजनीतिक पद से नहीं आता, अपितु समाज की
मानसिकता बदलने से आता है; - संवेदनशील शासन, जो उड़ीसा जैसे राज्यों में दलितों के जीवन की रक्षा करे, न कि
उनके ऊपर प्रतीक लगाकर चुप्पी साधे।
राष्ट्रपति भवन में कोई दलित बैठा है या नहीं, उससे अधिक महत्वपूर्ण है कि क्या दलित
को उसके गाँव में इज्जत, न्याय और अवसर मिल पा रहा है? जब तक उत्तर “नहीं” है, तब तक
“एक दलित का राष्ट्रपति होना” एक सुर्ख़ी है—संविधान की नहीं, सत्ता के छद्म का। क्या सरकार
ने दलित राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद और मुर्मू को नए संसद भवन के भूमि पूजन और उसके
उद्घाटन समारोह में बुलाया गया? नहीं तो क्यों? और न ही मंदिरों में .प्रवेश की अनुमति दी
गई—क्यों? क्या सरकार के पास इसका कोई जवाब है, शायद नहीं। जाहिर है दलितों को
कितने ही ऊचें पद पर बिठा दिया जाए लेकिन उनके प्रशासनिक और सामाजिक स्तर “दलित”
ही बना रहता है।
दलित राष्ट्रपति का प्रतीकवाद (Dalit President Symbolism
प्रस्तुत निबंध को विस्तार देते हुए ऐतिहासिक संदर्भों, उद्धरणों और केस स्टडी के साथ समृद्ध
रूप में संगठित कर दिया है।
- उड़ीसा में हालिया घटनाओं की संख्या और विवरण
- दलित राष्ट्रपति पद की तुलना दलित मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल से
- अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व बनाम असली सत्ता
राष्ट्रपति: संवैधानिक गौरव या सत्ता से कटाव?
भारत का राष्ट्रपति संविधान का संरक्षक और औपचारिक सर्वोच्च पद है, लेकिन उसकी
शक्तियाँ अत्यंत सीमित हैं। संविधान के अनुच्छेद 74 के अनुसार, राष्ट्रपति प्रधानमंत्री और
मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना कोई कार्य नहीं कर सकता। ऐसे में जब कोई दलित इस पद पर
पहुंचता है, तो क्या वह वास्तविक निर्णयों में भागीदारी करता है या केवल राज्याभिषेक का
पात्र बनता है? यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का तात्पर्य
केवल चेहरा भर देना नहीं होता—बल्कि नीति निर्धारण में भागीदारी होती है।
डॉ. के.आर. नारायणन (भारत के पहले दलित राष्ट्रपति, कार्यकाल: 1997–2002)
(i) ‘रबर स्टांप’ कहे जाने की प्रवृत्ति:
डॉ. नारायणन एक अत्यंत शिक्षित और विचारवान राष्ट्रपति थे, परंतु उन्हें अक्सर ‘रबर स्टांप’
कहकर उनकी भूमिका को कम करके आँका गया। जबकि उन्होंने कई अवसरों पर संवैधानिक
और नैतिक रूप से महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ की थीं (जैसे गुजरात दंगों पर उनका बयान)। के. आर.
नारायणन ने 1997 में जब राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी, तो उन्होंने अपने भाषण में कहा था:
“I am not a rubber stamp. I am the conscience keeper of the Constitution.”
(“मैं कोई रबर स्टाम्प नहीं हूं। मैं संविधान का विवेक रक्षक हूं।”) किन्तु बाद के वर्षों में ऐसा
कोई उदाहरण सामने नहीं आया जब कोई दलित राष्ट्रपति, किसी दलित विरोधी नीति के
विरुद्ध खुलकर खड़ा हुआ हो।जातिगत पृष्ठभूमि के कारण ही उन्हें उस प्रभाव और सम्मान से
वंचित रखा गया जो अन्य ब्राह्मण/सवर्ण राष्ट्रपतियों को सहज प्राप्त हुआ।
(ii) गुजरात दंगों पर राष्ट्रपति की चुप्पी की अपेक्षा:
वर्ष 2002 में जब गुजरात दंगे हुए, तो राष्ट्रपति नारायणन ने स्वयं पहल कर प्रधानमंत्री
अटल बिहारी वाजपेयी को पत्र लिखा और कहा कि “राज्य में जो हो रहा है, वह लोकतंत्र पर
धब्बा है।” परंतु मीडिया और सरकार ने उस पत्र को दबाने का प्रयास किया। एक दलित
राष्ट्रपति की नैतिक आपत्ति को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया।
(iii) राष्ट्रपति भवन में जातिगत दृष्टि:
यह बात कई वरिष्ठ पत्रकारों और नौकरशाहों द्वारा दर्ज की गई है कि जब एक दलित
राष्ट्रपति पद पर आए, तो राष्ट्रपति भवन के भीतर भी ‘उनकी जाति’ की चर्चा दबी ज़ुबान में
होती थी, और कुछ उच्च प्रशासनिक अधिकारियों ने उन्हें वह गरिमा नहीं दी जो परंपरागत रूप
से राष्ट्रपति को दी जाती है।
- रामनाथ कोविंद (भारत के दूसरे दलित राष्ट्रपति, कार्यकाल: 2017–2022):
(i) राम मंदिर भूमि पूजन से बहिष्करण (2020): जब 5 अगस्त 2020 को अयोध्या में राम
मंदिर का शिलान्यास हुआ, तो प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, संघ प्रमुख और RSS के प्रतिनिधि
शामिल हुए, लेकिन भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को आमंत्रित नहीं किया
गया। जबकि वह भारतीय संविधान के प्रमुख प्रतिनिधि थे। यह साफ संकेत था कि एक दलित
राष्ट्रपति की धार्मिक/सांस्कृतिक मामलों में उपस्थिति ‘अप्रिय’ मानी गई।
(ii) मीडिया और सवर्ण बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा निरंतर उपेक्षा:
रामनाथ कोविंद को अक्सर “मोदी के चयन” या “RSS के आदमी” कहकर उनके
व्यक्तिगत विचार, संघर्ष और भूमिका को नजरअंदाज किया गया। जबकि कई ब्राह्मण राष्ट्रपति
बिना विचारों के भी “विद्वान” माने गए। कोविंद का कार्यकाल शांतिपूर्ण और गरिमामय रहा,
पर मीडिया द्वारा उन्हें “कमजोर”, “अप्रभावी” और “विचारहीन” कहा गया – यह रवैया सवर्ण
वर्चस्ववादी मानसिकता का प्रमाण है, जहाँ दलित नेतृत्व को हमेशा ‘कमतर’ आँका जाता है।
(iii) सांस्कृतिक उपेक्षा:
संविधान दिवस, दलित आइकनों की जयंती, या सामाजिक न्याय के अवसरों पर
राष्ट्रपति कोविंद की भूमिका को सरकारी आयोजनों में भी सीमित किया गया। उदाहरण के
लिए, बाबासाहेब अंबेडकर की जयंती पर राष्ट्रपति भवन से कोई विशेष पहल नहीं हुई क्योंकि
उनके विचारों को पटल पर लाना RSS की विचारधारा के अनुकूल नहीं था। - द्रौपदी मुर्मू (भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति, कार्यकाल: 2022–वर्तमान)
हालाँकि आदिवासी हैं, दलित नहीं, फिर भी जातिवादी अपमान की शृंखला में उनका
उल्लेख आवश्यक है:
(i) नरेन्द्र मोदी द्वारा एक समारोह में नाम भुलाना:
एक बार पीएम मोदी ने सार्वजनिक रूप से भाषण में “राष्ट्रपति” का ज़िक्र किए बिना
उनका नाम नहीं लिया और कहा कि “राष्ट्रपति जी तो…”, जबकि इससे पहले पुरुष राष्ट्रपतियों
को पूरा सम्मानजनक नाम और संबोधन दिया जाता था।
(ii) विपक्षी नेताओं द्वारा संबोधन में अपमान:
कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने उन्हें “राष्ट्रपत्नी” कहकर संबोधित किया, जिसे बाद में
भारी आलोचना के बाद ‘जुबान फिसलना’ कहा गया। परंतु यह “स्त्री” और “दलित-आदिवासी”
होने के दोहरे भेदभाव को उजागर करता है। सच तो ये है कि जातीय भेदभाव सत्ता के उच्चतम
पद तक पहुँचने के बाद भी समाप्त नहीं होता, बल्कि वह केवल अधिक सूक्ष्म और सांस्कृतिक
रूप में प्रकट होता है।
राष्ट्रपति बनने के बाद भी दलितों को सामाजिक गरिमा, सांस्कृतिक सम्मान और वैचारिक
महत्त्व नहीं दिया जाता। उन्हें केवल “सांकेतिक प्रतिनिधि” बना दिया जाता है — जिससे
बहुसंख्यक समाज दिखा सके कि “देखो, दलित भी राष्ट्रपति बन सकते हैं”, लेकिन उनकी
वास्तविक शक्ति और सम्मान को सीमित रखा जाता है।
नए संसद भवन के भूमि पूजन के अवसर पर कोविंद जी और उदधाटन मे अवसर पर
मूर्मू जी को न बुलाना भी जातीय भेदभाव को दर्शाता है। यह संकेत बिल्कुल सही और अत्यंत
महत्वपूर्ण है। यह तथ्य स्वयं में एक गहन संवैधानिक विडंबना और जातीय भेदभाव का प्रमाण
है कि जब भारत के नए संसद भवन — जो लोकतंत्र का प्रतीक है — का भूमिपूजन और
उद्घाटन हुआ, तो उस समय देश के तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और बाद में राष्ट्रपति
द्रौपदी मुर्मू — दोनों को ही आमंत्रित नहीं किया गया। इस पूरे घटनाक्रम को क्रमवार इस प्रकार
देखा जा सकता है:
- नए संसद भवन का भूमिपूजन (5 अगस्त 2020) : राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को नहीं
बुलाया गया 5 अगस्त 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में राम मंदिर के
शिलान्यास के दिन ही नई संसद के निर्माण की आधारशिला भी रखी। इस अवसर पर भारत के
तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, जो कि संविधान के संरक्षक हैं और संसद के सर्वोच्च
अधिकारी माने जाते हैं, को इस धार्मिक-राजनीतिक आयोजन में शामिल नहीं किया गया।
भूमिपूजन एक पूर्णतः धार्मिक अनुष्ठान के रूप में हुआ — जिसमें संवैधानिक पदों की
गरिमा की उपेक्षा की गई। यह घटना बताती है कि दलित राष्ट्रपति को संवैधानिक रूप से
अपेक्षित सम्मान नहीं दिया गया, क्योंकि प्रधानमंत्री ने स्वयं वह भूमिका निभाई जो परंपरागत
रूप से राष्ट्रपति की होती।
- नए संसद भवन का उद्घाटन (28 मई 2023) : ��ाष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भी नहीं ब
ुलाया गया। जब संसद भवन बनकर तैयार हुआ और उसका उद्घाटन होना था, तो उस समय द
ेश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू थीं — भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति। उद्घाटन
समारोह में भी उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं संसद भवन का उद्घाटन क
िया, जबकि परंपरागत रूप से यह कार्य राष्ट्रपति द्वारा संपन्न होता है, क्योंकि संसद उन्हीं के न
ाम पर कार्य करती है। इस निर्णय की कई संवैधानिक विशेषज्ञों, विपक्षी दलों और सामाजिक क
ार्यकर्ताओं ने आलोचना की।
उदाहरण के लिए: “राष्ट्रपति देश की प्रथम नागरिक हैं। यदि संसद उद्घाटन कोई और करे, तो
यह केवल परंपरा का नहीं, संविधान के मूल स्वरूप का भी अपमान है।” — शशि थरूर
क्या यह केवल “संयोग” है? या सोच-समझ कर किया गया “संकेत”?
जाति और सत्ता के समीकरण को समझें:
राष्ट्रपति जातीय पृष्ठभूमि भूमिका भूमिपूजन/उद्घाटन में आमंत्रण
रामनाथ कोविंद दलित राष्ट्रपति (2020) ❌ नहीं बुलाया गया
द्रौपदी मुर्मू आदिवासी महिला राष्ट्रपति (2023) ❌ नहीं बुलाया गया
प्रणब मुखर्जी ब्राह्मण राष्ट्रपति (पूर्व) ✅ राम मंदिर भूमि पूजन
(2019) में बुलाया गया
यह तुलना दिखाती है कि दलित और आदिवासी राष्ट्रपति को न केवल नजरअंदाज किया
गया, बल्कि संवैधानिक गरिमा को प्रधानमंत्री द्वारा हड़पने का प्रयास हुआ — और मीडिया
तथा प्रशासन ने इसे सामान्य बताने की कोशिश की।
यह जातीय भेदभाव के “सांकेतिक” रूप की पुष्टि करता है:
- संवैधानिक संस्थाओं का निजीकरण — राष्ट्रपति जैसे पद को केवल “संविधान की शोभा”
बनाकर छोड़ देना। - जातिगत प्रतिनिधियों को “दृश्य से हटा देना” — ताकि राष्ट्रीय आयोजनों में सांस्कृतिक
श्रेष्ठता और सवर्ण वर्चस्व बना रहे। - राष्ट्रपति की भूमिका को “मौन और अप्रभावी” बना देना — ख़ासतौर पर जब वह दलित
या आदिवासी पृष्ठभूमि से हों।
अफसोस की बात है कि “दलित और आदिवासी जब सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर पहुँचते हैं, तब
भी उन्हें सामाजिक और सांस्कृतिक स्वीकृति नहीं दी जाती।”— यह नई संसद के भूमिपूजन और
उद्घाटन में स्पष्ट दिखाई देता है।
प्रतीकवाद बनाम वास्तविक सशक्तिकरण :
भारतीय राजनीति में ‘दलित प्रतिनिधित्व’ का उपयोग अकसर प्रतीकात्मकता के रूप में
होता है: दलित को राष्ट्रपति बनाया जाता है, लेकिन संसद में अनुसूचित जाति-जनजाति
अत्याचार निवारण अधिनियम को कमजोर किया जाता है (जैसे 2018 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा
SC/ST एक्ट पर लगाए गए प्रतिबंध, जिसे सरकार ने जनता के दबाव में पलटा)।
दलित महिला राष्ट्रपति बनती है, लेकिन उन्हीं के राज्य उड़ीसा में दलित और आदिवासी
महिलाओं के खिलाफ बलात्कार और हिंसा की घटनाएँ बदस्तूर जारी रहती हैं। दलितों को नगर
निगम, पंचायतों में आरक्षण मिलता है, लेकिन उन्हें वास्तविक निर्णयों से वंचित रखा जाता है।
उनके ‘सरपंच’ होते हैं लेकिन ‘सचिव’ ब्राह्मण होता है, जो सारी फाइलें चलाता है।
द्रौपदी मुर्मू और उड़ीसा की विडंबना :
2022 में द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति बनना एक ऐतिहासिक घटना कहा गया। वे पहली
आदिवासी महिला थीं जो इस पद तक पहुँचीं। लेकिन उनके राज्य उड़ीसा में उसी वर्ष और
उसके बाद अनेक अमानवीय घटनाएँ घटती रहीं: - कोरापुट (2022): एक दलित युवक को चोरी के शक में गाँव के बीच पेड़ से बांधकर
पीटा गया। कोई अधिकारी या पुलिस समय पर नहीं पहुँची। - बालासोर (2023): एक दलित बस्ती में आग लगा दी गई। पीड़ितों ने बताया कि
‘हमारी जाति ही हमारी सजा है’। - मलकानगिरी (2024): एक आदिवासी महिला को ‘डायन’ कहकर जला दिया गया, और
पुलिस ने FIR दर्ज करने में दो सप्ताह लगा दिए। - कंधमाल (2023): दलित ईसाई परिवारों पर हमला कर उनकी झोपड़ियाँ जला दी गईं।
प्रशासन मौन रहा। - नवरंगपुर (2024): आदिवासी किशोरी से गैंगरेप कर पंचायत में ‘समझौता’ करवा दिया
गया, कोई कानूनी कार्यवाही नहीं।
इन घटनाओं की पृष्ठभूमि में, राष्ट्रपति भवन में बैठी एक आदिवासी महिला की गरिमा
खोखली प्रतीत होती है। क्या यह ‘न्याय की प्रतीक’ थीं या सत्ता की ‘नौटंकी’ में एक पात्र? यह
विरोधाभास केवल राजनीतिक ढांचे की असंवेदनशीलता को ही नहीं, बल्कि उस सामाजिक
मानसिकता को भी उजागर करता है जो आदिवासी और दलित को सम्मान का नहीं, दया और
नियंत्रण का पात्र मानती है।
दलित प्रधानमंत्री क्यों नहीं?
भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में अब तक कोई दलित प्रधानमंत्री नहीं बना। यह संयोग
नहीं है—बल्कि व्यवस्था की जातिवादी बनावट का द्योतक है। डॉ. अंबेडकर स्वयं कभी
प्रधानमंत्री पद के पास नहीं पहुँच पाए, जबकि वे स्वतंत्र भारत के सबसे शिक्षित और दूरदर्शी
नेता थे। कांशीराम और मायावती ने दलित राजनीति को राष्ट्रीय स्तर पर खड़ा किया, लेकिन
उन्हें हमेशा क्षेत्रीय, जातीय या ‘कट्टर’ नेता कहकर सीमित कर दिया गया। रामविलास
पासवान, जो हर सरकार में मंत्री रहे, परंतु उन्हें कभी शीर्ष पद की संभावना नहीं दी गई। यह
दिखाता है कि दलितों को सत्ता की ‘हाजिरी’ दी जाती है, ‘हुकूमत’ नहीं।
ऐतिहासिक केस स्टडी: जब दलित राष्ट्रपति भी असहाय थे
के. आर. नारायणन (1997–2002) के कार्यकाल में गुजरात दंगे हुए (2002)। उन्होंने
इन दंगों को ‘राष्ट्रीय शर्म’ कहा, और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से हस्तक्षेप
करने को कहा। किन्तु उनकी चेतावनियों की अनदेखी की गई। एक दलित राष्ट्रपति की
संवैधानिक चेतना, एक बहुसंख्यकवादी सत्ता के सामने असहाय थी। क्या यह पद गरिमा का था
या असहायता का?
अंबेडकर का दृष्टिकोण: प्रतीक नहीं, परिवर्तन चाहिए
डॉ. अंबेडकर ने चेताया था: “We must not be content with mere
representation; we must have real power to influence policy and
governance.” (“हमें मात्र प्रतिनिधित्व से संतुष्ट नहीं होना चाहिए; हमारे पास नीति और
शासन को प्रभावित करने के लिए वास्तविक शक्ति होनी चाहिए।”) उनके लिए दलितों का
सशक्तिकरण केवल पद या सीट तक सीमित नहीं था—बल्कि वह एक सामाजिक क्रांति की मांग
थी। आज सरकारें उसी क्रांति को प्रतीकों के ज़रिए टालते जा रही हैं।
प्रतीकात्मकता से आगे जाकर वास्तविक भागीदारी।
नीति निर्माण में दलितों की निर्णायक उपस्थिति।
दलित राष्ट्रपति नहीं, दलित प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और नौकरशाही में
उच्च पदों पर न्यायपूर्ण भागीदारी। और सबसे बढ़कर—एक ऐसा समाज जहाँ किसी दलित को
सिर्फ ‘दलित’ न समझा जाए, बल्कि ‘मनुष्य’ समझा जाए। जब तक यह नहीं होता, तब तक
‘एक दलित का राष्ट्रपति होना’ सत्ता की सजावट है—सशक्तिकरण नहीं।
प्रस्तुत लेख यह उस विडंबना को उजागर करता है जहाँ समाज का सबसे हाशिए पर
खड़ा व्यक्ति सत्ता के सबसे ऊँचे सिंहासन पर बैठा प्रतीत होता है, लेकिन असल में सबसे दूर
होता है — निर्णय की शक्ति से। इसलिए सवाल यह है कि क्या संविधान को और अधिक प्रभावी,
उत्तरदायी और समानतावादी बनाने के लिए उसमें सुधार आवश्यक है?
संभावित संवैधानिक सुधार जो मददगार हो सकते हैं:
- राजनीतिक प्रतिनिधित्व में गुणवत्ता की शर्त
वर्तमान में अनुसूचित जातियों को आरक्षित सीटें दी जाती हैं, लेकिन कई बार ये सीटें दलित
हितों के बजाय प्रमुख दलों की कठपुतली बन जाती हैं।
सुधार: ऐसी संवैधानिक गारंटी होनी चाहिए जिससे इन आरक्षित सीटों पर खड़े होने वाले
उम्मीदवारों की स्वायत्तता, सामाजिक प्रतिबद्धता और जनभागीदारी सुनिश्चित हो सके। - सत्ता की विकेन्द्रीकरण और दलित नेतृत्व का सशक्तिकरण
पंचायतों और स्थानीय निकायों में दलित सरपंच होते हैं, लेकिन सचिव और अधिकारी
सभी उच्च जातियों से होते हैं। इस व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है और वह है कि संविधान
की अनुसूची 11वीं और 12वीं को और मजबूत करते हुए दलित चुने हुए प्रतिनिधियों को
प्रशासनिक अधिकार, संसाधनों की स्वतंत्रता और कानूनी संरक्षण दिया जाए। - SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम का संवैधानिक बल
यह अधिनियम संसद द्वारा बनाया गया है, न कि संविधान के भीतर समाहित कोई मूल
अधिकार है। परंतु इसे संविधान की अनुसूची या अनुच्छेद के अंतर्गत लाया जाए ताकि इसकी
शक्ति को सर्वोच्च संवैधानिक संरक्षण मिले। - न्यायपालिका में दलित भागीदारी सुनिश्चित करना
आज तक कोई दलित व्यक्ति भारत का मुख्य न्यायाधीश नहीं बना। न्यायपालिका में
उनका प्रतिनिधित्व नगण्य है। किंतु Collegium प्रणाली में सामाजिक न्याय आधारित
प्रतिनिधित्व की संवैधानिक व्यवस्था होनी चाहिए। - राष्ट्रपति/उप-राष्ट्रपति की भूमिका में संशोधन
राष्ट्रपति को केवल ‘अनुच्छेद 74’ के तहत सलाह मानने वाला न बनाया जाए, बल्कि
सामाजिक-न्याय संबंधी मामलों में उसकी भूमिका को निर्णायक बनाया जाए। इसमें भी सुधार
की आवश्यकता है कि राष्ट्रपति को SC/ST अत्याचार, आरक्षण से जुड़े मामलों में ‘सार्वजनिक
अनुशंसा’ देने की संवैधानिक शक्ति प्रदान की जाए।
चेतावनी: संवैधानिक सुधार तभी सार्थक होंगे जब…
संविधान में बदलाव या सुधार अकेले समाधान नहीं है। जब तक राजनीतिक
इच्छाशक्ति, न्यायपालिका की प्रतिबद्धता, और सबसे बढ़कर समाज की मानसिकता नहीं
बदलती, तब तक कोई भी संवैधानिक प्रावधान केवल काग़ज़ पर रहेगा।
डॉ. अंबेडकर ने 1949 में कहा था: “संविधान केवल राज्य के अंगों जैसे विधायिका,
कार्यपालिका और न्यायपालिका को ही प्रदान कर सकता है। इन अंगों का काम करने के लिए
जिन कारकों पर निर्भर करता है, वे हैं जनता और वे राजनीतिक दल जिन्हें वे अपने साधन के
रूप में स्थापित करेंगे।”
( “A constitution can provide only the organs of State such as the
legislature, the executive and the judiciary. The factors on which the
working of those organs depends are the people and the political parties
they will set up as their instruments.”)
निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि सुधारों की दिशा और गहराई दोनों ज़रूरी हैं।
संवैधानिक सुधार एक सशक्त उपकरण हो सकता है बशर्ते उसे दलित जनजीवन के यथार्थ के
आधार पर निर्मित किया जाए—प्रतीकों की प्रतिक्रिया में नहीं, बल्कि परिवर्तन की प्यास में।
एक दलित का राष्ट्रपति होना तभी सार्थक होगा जब उसकी स्थिति संविधान के केंद्र में
होगी—केवल भवन के भीतर नहीं।