पुष्पा गुप्ता
“ये हमारी लडाई नहीं है। हमारी जिम्मेदारी बस इतना देखना है कि यह उक्रेनी सीमा के बाहर न निकले।“
~ नाटो.
अमरीकी-नाटो नेता जो भी बयानबाजी करें पर इतना साफ है कि रूसी साम्राज्यवादी हमले के समय नाटो, या नाटो की मदद से उक्रेनी सत्ता कब्जाने वाले शासक, उक्रेनी जनता के मित्र तो नहीं हैं।
रूसी साम्राज्यवाद के साथ जंग भडकाकर उक्रेनियों को बलि का बकरा बनाने के बाद खबर है कि नाटो देश रूसी गैस पहले के मुकाबले और अधिक मात्रा में खरीद रहे हैं – जर्मन मंत्री साफ कह रहे हैं कि रूस पर पाबंदी का मतलब ये तो नहीं कि हम ठंड में सिकुडें।
ब्रिटिश पूंजीपति वर्ग तो और ड्रामेबाज है – रूसी हमले के विरोध में उक्रेन के साथ एकजुटता में वे मैंचेस्टर में लगी फ्रेडरिक एंगेल्स की मूर्ति हटाने पर विचार कर रहे हैं (इसमें कोई ‘तर्क’ ढूंढेंगे तो दिमाग के डॉक्टर के पास जाना पड़ेगा!) उक्रेन के अपने शासकों का ये हाल है कि पिछले आठ साल में अपनी जनता का खून चूसकर नाटो से जो बडी मात्रा में हथियार खरीदे बताये गये थे, वे अब मौके पर कहीं नजर नहीं आ रहे!
रूसी फौज के टैंक, बख्तरबंद व अन्य गाडियां 65 किलोमीटर के कारवां में बंपर से बंपर ट्रैफिक जाम की तरह खडे हैं और इतने आसान निशाने पर बमबारी के लिए जहाज, हेलीकॉप्टर, तोपखाना सब गायब है।
इस संकट के वक्त में भी उक्रेनी जनता के साथ अगर कोई सच में खडा है तो वह रूस और दुनिया का मजदूर वर्ग। दमन के बावजूद भी कन्फेडरेशन ऑफ लेबर ऑफ रशिया, सोशलिस्ट आल्टरनेटिव, आदि रूसी मजदूर वर्ग के तमाम समूह रूसी शासक वर्ग द्वारा छेडे गए इस साम्राज्यवादी युद्ध के खिलाफ और उक्रेनी जनता के साथ एकजुटता में निरंतर आंदोलित हैं।
पूरे रूस में विरोध प्रदर्शनों का आह्वान किया गया है। उक्रेनी जनता को भी समझना होगा कि उसके अपने देश के दक्षिणपंथी नवनाजी शासकों और नाटो साम्राज्यवादियों के बजाय रूसी मेहनतकश जनता के साथ उसकी एकजुटता ही अंततः दोनों देशों की जनता की मुक्ति की राह निर्मित करेगी।
(चेतना विकास मिशन)

