रमाशंकरसिंह
यह चित्र मप्र कांग्रेस के भोपाल स्थित मुख्यालय का है जिसकी एक प्रमुख दीवार पर गॉंधी परिवार का कोई सदस्य छूटा नहीं है और जो एक किसी कारण से छूट भी गया तो पूर्वमुख्यमंत्री कमलनाथ के दफ़्तर की दीवार उसकी पूर्ति कर देती है, संजय गांधी की। यानी नेहरु से लेकर घांढी और वाड्रा तक सभी , पूरा ख़ानदान ! फ़िरोज़ गांधी की स्पेलिंग दरअसल Gandhi न थी , वे पारसी थे तो Ghandhi सरनेम था और वैसे ही लिखते थे और बाद में बोलते बोलते सुविधापूर्वक वह गांधी हो गई। फ़िरोज़ घांढी एक शानदार सांसद और राजनीतिज्ञ थे जिन्हें संसद में अपने ससुर नेहरू की सरकार के ग़लत काम उजागर करने में क़तई संकोच नहीं होता था। इंदिरागांधी भी वोटर लिस्ट में इंदिरा नेहरू गांधी ही थीं। चलो कोई बात नहीं वह भी मान लिया।
कांग्रेस में तिलक गोखले की याद को तो भूल ही जाओ ? जब कि गांधी जी , सरदार पटेल, सुभाषचंद्र, मौलाना आज़ाद ,डा० राजेंद्रप्रसाद, गोविंद वल्लभ पंत , आचार्य नरेंद्र देव, राजागोपालाचारी , कामराज , लालबहादुरशास्त्री, गुलज़ारी नंदा, ही कहीं नज़र नहीं आते। यह सूची यदि पूर्व कांग्रेस अध्यक्षों तक ही सीमित हो जाती तो भी कोई शिकायत न होती।
१३५ साल पुरानी पार्टी है तो क़रीब ८०-९० अध्यक्ष तो रहे होंगें । कांग्रेस सदस्यों को सब अध्यक्षों के जीवन चरित से परिचय भी होना चाहिये यदि प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह , चंद्रशेखर , अश्फ़ाकउल्ला, बिस्मिल , जेपी , डा लोहिया, अरुणा आसिफ़ अली, युसुफ मेहर अली, कमला चट्टोपाध्याय , सत्यवती को भुलाना ही चाहते थे तो।
यही कांग्रेस के मटियामेट व सत्यानाश होने का असल कारण है और जब तक परिवार से बाहर कांग्रेस नहीं निकलेगी इसका कुछ नहीं हो सकता ! चम्मच छाप कांग्रिसियों और अंधअनुचर मंडली में क्या फ़र्क़ है ? चम्मच छाप मूर्खता के साथ साथ बिकाऊ भी हैं !
पुनश्च : इससे कुछ ही बेहतर हाल अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी २४ अकबर रोड नई दिल्ली का है जहॉं गांधी चित्र तो हैं और बक़ौल एक पूर्व महामंत्री एआईसीसी उन्हें अपने कमरे में सरदार पटेल और सुभाषचंद्र बोस का चित्र लगानें में काफ़ी मशक़्क़त करनी पड़ी थी और इतिहास से ढेर संदर्भ निकाल कर कांग्रेस अध्यक्ष को दिखाने पड़े थे। कहने की ज़रूरत नहीं कि पॉंच दशकों तक कांग्रेस संगठन में काम कर चुके उन नेता को आज पूरी तरह विस्मृत किया जा चुका है।और वैसे ही असंख्य कांग्रेसियों को जो मनसा वाचा कर्मणा कांग्रेस की वैचारिकता में पगे थे। आज उन चमचों की भरमार है जो अंधभक्त मंडली की तरह ही नेताओं के इर्दगिर्द गणेश परिक्रमा कर अपने जीवन को ‘सुफल’ बनाने में जुटे रहते हैं , जहॉं मौक़ा मिला नहीं कि जूठन चाटना शुरु।
लेखक वरिष्ठ समाजवादी नेता और मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री रहे हैं

