मुनेश त्यागी
सभी तरह की साम्प्रदायिक ताकतें अपने अपने धर्म की बातें करती हैं।वैसे ये ताकतें धर्म की कम, अधर्म, अंधविश्वास और धर्मांधता की बातें ज्यादा करती हैं। इनकी सोच और दृष्टिकोण एकदम अवैज्ञानिक है। इनका तर्क, लॉजिक, विवेक, विष्लेषण, आलोचना और समालोचना से कोई मतलब नहीं है। वैज्ञानिक संस्कृति में, वैज्ञानिक संस्कृति के प्रचार प्रसार में इनका कोई यकीन नही है।
इन सांप्रदायिक ताकतों का भारत की आजादी के आंदोलन में कोई रोल नहीं था। ये तब भी हिंदू मुस्लिम एकता तोड़ रहे थे और आज भी वही काम कर रहे हैं। इन्हीं तत्वों ने भारत को हिंदू और मुसलमान दो राष्ट्र का नारा देकर तोड डाला था। आज भी यह वही काम कर रहे हैं। आजादी के आंदोलन में ये अंग्रेजो के साथ थे और भारत के स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ गवाही देकर अंग्रेजों के बगल गीर थे और ये आज भी लुटेरी साम्राज्यवादी ताकतों के साथ मिलकर भारत की जनता की एकता तोड़ रहे हैं उसको गुलाम बनाने पर आमादा है और उसके हक और अधिकारों को छीन कर उसको गुलाम बनाना चाहते हैं। ये कल भी लुटेरे साम्राज्यवादी अंग्रेजों का साथ देकर भारतीय जनता के साथ गद्दारी कर रहे थे, ये आज भी लुटेरे साम्राज्यवादी अमेरिका और दूसरी लुटेरी साम्राज्यवादी शक्तियों का साथ देकर भारतीय जनता के साथ गद्दारी कर रहे हैं। ये पूरी तरह से भारत की एकता और आजादी के दुश्मन हैं।
ये साम्प्रदायिक ताकतें, दूसरे धर्मों से नफरत करना सिखाती हैं। दूसरे धर्मों के खिलाफ हिंसा का जहर उगलती है और नफरत फैलाती हैं। इस मायने में इन तत्वों को धार्मिक ताकतें नहीं कहा जा सकता। इन जहरीली ताकतों का भारत की साझी संस्कृति में कोई विश्वास नहीं है। ये दोनों हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिक ताकतें भारतीय जनता की एकता के खिलाफ हैं, हिंदू मुस्लिम जनता की एकता को तोड़ना चाहती हैं। ये साझी संस्कृति के खिलाफ है और गंगा जमुनी तहजीब के खिलाफ है इनका मिली-जुली संस्कृति में कोई विश्वास नहीं है। इनमें बौद्धिकता एकदम गौण होती है। ये ताकतें बौद्धिकता के तर्क की कसौटी पर खरी नही उतरती क्योंकि इनकी बौद्धिकता में तर्क, विश्लेषण और विवेकशीलता का कोई स्थान नही है। ऊपरी तबके ने जो कह दिया बस वही सच है। इसके अलावा सब झूठ है, सब असत्य है।
हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक तत्वों में ब्राह्मण बनियों, क्षत्रियों और ओबीसी के कुछ हिस्सों का वर्चस्व है। इन्हें विचारक नही प्रचारक चाहिए। इन तत्वों का संविधान में कोई विश्वास नहीं है। हिंदुत्ववादी ताकतें मनु स्मृति को अपना आदर्श मानती हैं और भारत के संविधान में इनका कोई विश्वास नहीं है। यही हालत इस्लामिक सांप्रदायिक ताकतों की भी है इनका भी भारतीय संविधान में कोई विश्वास नहीं है।
सांप्रदायिक ताकतें जातिवाद में विश्वास करती हैं और हिंदुत्ववादी ताकतें तो जाति और वर्ण को भी मानती है। ये वर्णो में विश्वास करती हैं और शूद्र वर्ण से गुलामों की तरह व्यवहार करती हैं। ये ताकतें अपने लोगों को दंगों और फसाद में रोकना चाहती हैं। यह काम औरों से करवाना चाहती हैं। अपने बच्चों को इनसे बचाए रखती हैं। इन ताकतों में से कोई भी अपने बच्चों को दंगों में भेजना नहीं चाहता। इनमें से अधिकांश ताकतें और लोग अपने बच्चों को अच्छे अच्छे स्कूलों में पढ़ा रही हैं, जबकि दूसरों के बच्चों को दंगों, फसाद और हिंसा में झोंक देना चाहती हैं।
ये ताकतें कट्टर मानसिकता का विकास करती हैं। मनुष्य को कट्टरपंथी और हिंसक बनाती हैं, उसको विवेकशील और तर्कशील नही। खासतौर से हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक ताकतों में जातिवाद और छुआछूत का बोलबाला है। ये ताकतें शूद्रों को, एससी एसटी को, ओबीसी को, दलितों को, गुलाम बनाकर रखना चाहती हैं। सब प्रकार की सांप्रदायिक ताकतें साम्राज्यवाद की पोषक हैं।
इनके एजेंडे में दलितों का और शूद्रों का कल्याण नहीं है। हिंदुत्ववादी संप्रदायिक ताकतें दलितों और आदिवासियों की गुलामी में और छुआछूत में विश्वास रखती हैं। ये छुआछूत और गुलामी का खात्मा नही चाहती बल्कि इसकी वकालत करती हैं। इनके व्यवहार में ऊंच-नीच की भावना मौजूद है, छोटे-बड़े की भावना मौजूद है। जिस धर्म में, संप्रदाय में, ऊंच-नीच और छोटे बड़े की मानसिकता मौजूद है वह धर्म नही हो सकता।
जनता द्वारा भुगती जा रही बुनियादी समस्याओं,,,, रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा स्वास्थ्य, रोजगार, सुरक्षा जैसी समस्याओं से इन्हें कुछ लेना देना नहीं है। यह ताकतें शोषण, अन्याय, भेदभाव, असमता, अन्याय भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ नही लड़ना चाहती, आतंकवाद से नहीं लड़ना चाहती, छोटे बड़े और ऊंच-नीच की मानसिकता से भी नहीं लड़ना चाहती, इनका खात्मा करने को तैयार नही हैं, बल्कि इनको कायम रखना चाहती हैं।
उपरोक्त सब समस्याओं का समाधान और खात्मा सभी प्रकार की सांप्रदायिक ताकतों के एजेंडे में नहीं है। ये सांप्रदायिक ताकतें पूर्ण रूप से सामंतवादी, पूंजीवादी, साम्राज्यवादी और उदारीकरण की नीतियों की अलंबरदार हैं, उनकी बगलगीर हैं, उनको बढ़ाना चाहती हैं, उनका खात्मा नहीं चाहती। आज ये इन्हीं नीतियों का पालन कर रही हैं और पूरी जनता को साम्राज्यवाद का गुलाम बनाने पर आमादा हैं।
वर्तमान में हम देख रहे हैं कि ये सांप्रदायिक ताकतें उपरोक्त जनविरोधी नीतियों के कतई खिलाफ नहीं है बल्कि उन को बढ़ावा देने में लगी हुई हैं और उनको बढ़ावा देने का मामला यहां तक पहुंच गया है कि इन्होंने किसानों और मजदूरों पर गुलामी के कानून थोप दिए हैं। अभी तक जो मजदूर और किसान आजादी की सांस ले रहे थे, उस छोटी मोटी आजादी को भी छीनना चाहती हैं।
इन तत्वों का समता समानता, न्याय, आजादी, संविधान, कानून के शासन, जनतंत्र, गणतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और वैज्ञानिक समाजवाद के सिद्धांतों में कोई यकीन नहीं है। हम यहां कहना चाहेंगे कि दुनिया में जो ये आधुनिकतम विचार हैं, उनमें इन तत्वों का कोई विश्वास नहीं है।
हमारे देश के बहुत सारे लोग इन जन विरोधी ताकतों को धार्मिक समझते हैं जबकि हकीकत में इन साम्प्रदायिक ताकतों का धर्म से कुछ लेना देना नहीं है। धर्म के दस लक्षण हैं जिन्हें ये ताकतें कभी अमल में नहीं लातीं, धर्म के दस लक्षणों के खिलाफ लगातार काम करती रहती हैं। धर्म के दस लक्षण हैं,,,,,1.धैर्य, 2.सहनशीलता/क्षमा, 3.मन पर नियंत्रण, 4.चोरी न करना/धन इकट्ठा न करना 5.पारदर्शिता, 6.इंद्रिय वशीकरण, 7.सर्व हिताय बुद्धि, 8.सर्व हिताय शिक्षा/विद्या, 9.सत्य/सच्चाई और 10.गुस्सा न करना/क्रोध न करना। यहां पर यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि धर्म में पूजा पद्धति, ईश्वर, भगवान, मंदिर शामिल नहीं है। धर्म में ईश्वर में विश्वास करना या नास्तिक होना भी शामिल नहीं है। ईश्वर में विश्वास करना या नास्तिक होना, यह आदमी की इच्छा पर निर्भर करता है।
तमाम तरह की सांप्रदायिक ताकतें किसानों, मजदूरों, दलितों, ओबीसी, एससी और एसटी की गुलामी को बरकरार रखना चाहती हैं। ये ताकतें 80 फ़ीसदी जनता को गुलाम बना कर रखना चाहती हैं, उनको शूद्र बनाकर रखना चाहती हैं, उनको अछूत बनाकर रखना चाहती हैं। उनसे काम तो सारे कराना चाहती हैं मगर उनको कोई भी बुनियादी सुविधा और अधिकार देना नही चाहती।
इनका आधुनिक विचारों में कोई विश्वास नहीं है। यह ताकतें एकदम मानव विरोधी हैं, जनतंत्र विरोधी है, समाजवाद विरोधी हैं, धर्मनिरपेक्षता विरोधी हैं, गणतंत्र विरोधी हैं। ये ताकतें संपूर्ण रूप से संविधान विरोधी हैं, कानून विरोधी हैं, कानून के शासन में इनका कोई विश्वास नहीं है। अब तो इन्होंने भारत के संविधान को और कानून को धता बताकर भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित कर दिया है। इनका आधुनिक भारत के निर्माण में ना कोई यकीन है और ना ही कोई योगदान है।

