सुब्रत चटर्जी
सत्ता धारी दलों, बाहुबलियों और असामाजिक तत्वों द्वारा चुनाव में धाँधली करना कोई नई बात नहीं है । बूथ लूटने की कोशिश बैलॉट पेपर से चुनाव के दौरान दृश्य तरीक़े से होता था और मशीनी युग में अदृश्य तरीक़े से होता है ।
इलेक्ट्रॉनिक हैकिंग अदृश्य और ज़्यादा घातक है, क्यों कि इसमें बहुत बड़े पैमाने पर जनमत को धता बताकर सत्ता धारी दल अपने मनमुताबिक रिज़ल्ट पा सकता है । ख़ैर, इस पर फिर कभी ।
मुद्दे की बात ये है कि उत्तर प्रदेश के रामपुर में हमने हालिया उपचुनाव में जो देखा ( मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है) वह २०२४ की एक बानगी भर है ।
इस मुस्लिम बहुल इलाक़े में भाजपा की जीत सरकारी मशीनरी के जिस निर्लज्ज प्रयोग से हुआ है, उसकी बड़े पैमाने पर पुनरावृत्ति २०२४ में नहीं होगी इसकी कोई गारंटी नहीं है । विशेष कर उन परिस्थितियों में जब चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं रहा और पुलिस और अर्धसैनिक बलों का सांप्रदायिक करण बड़े पैमाने पर हो चुका है ।
फासीवाद की अवधारणा हमेशा से ही a state within a state या राज्य के अंदर राज्य पर टिका हुआ है , उसे समझने की ज़रूरत है । द्विराष्ट्रवाद इसी सिद्धांत का घृणित प्रतिपादन है । जनता के एक वर्ग के प्रति घृणा ( जर्मनी में यहूदी और भारत में मुस्लिम) अंततः एक vertical split म में प्रतिस्फलित होता है ।
देश के विभाजन के साथ इस सिद्धांत का अंत नहीं होता, बल्कि विस्तार होता है । ये महज़ संयोग नहीं है कि अविभाजित भारत से ज़्यादा सांप्रदायिक दंगे आज़ाद भारत में हुए ।
अब जबकि दंगाबाज खुद सत्ता पर क़ाबिज़ हैं तो खुले आम दंगों में शामिल होना संभव नहीं है । दिल्ली दंगों से निगेटिव मेसेज गया है और सरकार बार बार उसे दुहरा नहीं सकती है ।
अब नए पैंतरे आज़माने का वक़्त है । मुस्लिम आबादी को मताधिकार से वंचित कर उनको दोयम दर्ज़े का नागरिक बनाना है । मोदी के लोकतंत्र की ‘ माँ’ में सरकार मुसलमानों का मताधिकार नहीं छीन सकती है, लेकिन सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग से ऐसी स्थितियों को जन्म दे सकती हैं कि मुसलमान वोट ही नहीं डाल सके। यानि १८% आबादी के जनमत का कोई मतलब ही नहीं है । अब शायद आप योगी के ८० बनाम २० के फ़ॉर्मूले को समझ रहे होंगे ।
हिंदुत्व की प्रयोगशाला का विस्तार जब गुजरात से चल कर यूपी जैसे पिछड़े राज्य में हुआ, उस समय मुझे ये देख कर आश्चर्य हुआ था कि किस तरह सांप्रदायिक घृणा की गिरफ़्त में देश का सबसे धनी राज्य और सबसे ग़रीब राज्य दोनों आ गए । मन में सवाल उठा कि संपन्न लोगों की मानसिकता और दरिद्रों की मानसिकता दोनों एकरूप कैसे हो सकती है? इसका जवाब है, संपन्न लोगों को exclusive politics, यानि विशिष्ट राजनीति पसंद आती है, क्यों कि उनकी संपन्नता का आधार शोषण की जिस अवधारणा पर स्थापित है, उसमें समाज के एक बड़े वर्ग को आर्थिक, राजनीतिक शक्ति से वंचित रखने में भलाई है । २००२ के संघ प्रायोजित दंगों के बाद गुजरात में हिंदू आबादी द्वारा औने पौने दाम पर मुसलमानों की संपत्तियों की ख़रीद इसका उदाहरण है ।
दूसरी तरफ़, यूपी जैसे ग़रीब बहुल राज्य में जनता को यह समझाना आसान है कि राज्य की २०% आबादी ८०% का हक़ छीनकर जी रहा है, इसलिए उनको दोयम दर्जे का नागरिक बनाने की ज़रूरत है । इस विंदु पर आकर exclusive politics यानि अलगाव वादी राजनीति का एक नया प्रारूप उभरता है और पूरी जनता सांप्रदायिक घृणा से लबरेज़ हो जाती है ।
इसके समाधान पर चर्चा दूसरे लेख में करूँगा । फ़िलहाल, बहुत कुछ सुप्रीम कोर्ट के रवैये पर निर्भर करता है । चंद्रचूड़ के चीफ़ जस्टिस बनने के बाद सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा हो गई है, इसलिए किरण रिजुजू जैसे बेवकूफ सुप्रीम कोर्ट पर नियंत्रण की बात कर रहे हैं । दरअसल न्यायपालिका पर संपूर्ण नियंत्रण के बिना फासीवाद पूरी तरह से सफल नहीं हो सकता है और NJAC उसी दिशा में किया गया एक प्रयास है । कोलेजियम सिस्टम में लाख ख़ामियों के वावजूद इसके ज़रिए आज भी नमस्ते सदा वत्सले गाते हुए जजों की नियुक्ति नहीं होती है, जो कि इस सरकार की असल मंशा है ।
मेरे विचार से सुप्रीम कोर्ट को नोटबंदी की तरह अयोध्या से लेकर राफाएल तक और और गुजरात दंगों से लेकर पेगासस तक हरेक उस मामले की पुनर्वीक्षा करनी चाहिए जिनपर २०१४ के बाद से सरकार के पक्ष में फ़ैसले आए हैं । चीफ़ जस्टिस चंद्रचूड़ के रहते ये संभव है, उसके बाद कोई उम्मीद नहीं है ।
यह एक लोकतांत्रिक देश का दुर्भाग्य है कि मैं फासीवाद के विरोध में किसी भी राजनीतिक दल या आंदोलन पर विश्वास नहीं करने की स्थिति में हूँ और मजबूरन न्यायपालिका से उम्मीद लगा रहा हूँ । यह एक मरे हुए लोकतंत्र की निशानी है ।

