शशिकांत गुप्ते
सीतारामजी पुरानी फिल्मों के गानों के शौकीन हैं।
सीतारामजी मूलतः व्यंव्यकार हैं। फिल्मी गीतों का भी व्यंग्य के रूप में प्रयोग करतें हैं।
आज सीतारामजी Old is gold इस कहावत को चरितार्थ करते हुए सन 1957 में प्रदर्शित फ़िल्म प्यासा के गीत की निम्न पंक्तियाँ गुनगुना रहे थे। इस गीत के गीतकार है साहिर लुधियानवी
ये कूचे, ये… हं ऽऽऽ , घर दिलकशी के
ये कूचे, ये नीलाम घर दिलकशी के
ये लुटते हुए कारवां ज़िंदगी के
कहाँ हैं, कहाँ हैं मुहाफ़िज़ खुदी के
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
कहाँ हैं, कहाँ हैं, कहाँ हैं
मुहाफ़िज़ शब्द का हिंदी में अर्थ होता है। अभिभावक या सरंक्षक।
मैने पूछा आज इन पँक्तियों का स्मरण करने का कोई विषेश कारण है?
सीतारामजी ने कहा देश में कुछ ऐसी घटनाएं घट रही है, जो अमानवीयता की पराकाष्ठा है। इसलिए मै इन पंक्तियों को आज के संदर्भ में प्रासंगिक समझकर गुनगुना रहा हूँ।
मैने कहा इनदिनों तो सन 1957 में प्रदर्शित फ़िल्म नो दो ग्यारह के गीत ये पंक्तियाँ भी प्रासंगिक है। गीतकार है मजरूह सुल्तानपुरी
हम है राही प्यार के,हमसे कुछ न बोलिये
जो भी प्यार से मिला हम उसी के हो लिये
धूप थी नसीब में,तो धूप में लिया है दम
चाँदनी मिली तो हम,चाँदनी में सो लिए
सीतारामजी ने कहा आप भी सच में व्यंग्यकार ही हैं।
मिरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा
इसी सियाह समुंदर से नूर निकलेगा
शायर अमीर क़ज़लबाश के इस शेर का यकायक स्मरण होता है।
सीतारामजी ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा,इनदिनों सिर्फ और सिर्फ बातें बहुत हो रही है लेकिन नतीजा कुछ भी नहीं निकलता है। नतीजे इश्तिहारों में जरूत दिखाई देतें हैं। इस मुद्दे पर शायर एतबार साजिद का ये शेर मौजु है।
गुफ़्तुगू देर से जारी है नतीजे के बग़ैर
इक नई बात निकल आती है हर बात के साथ
जो भी हो नतीजा तो सन 2024 में पता चलेगा। यह कहते हुए सीतारामजी पुनः सन 1970 में प्रदर्शित फ़िल्म जॉनी मेरा नाम का यह गीत गुनगुनाने लग गए। यह गीत लिखा है गीतकार
इंदीवर जी ने।
नफरत करने वालों के
सीने में प्यार भर दूँ
अरे मैं वह परवाना हूँ
पत्थर को मोम कर दूं
यह गीत गुनगुनाते हुए हमने चर्चा को पूर्णविराम दिया।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

