- तेजपाल सिंह ‘तेज’
भारत का लोकतंत्र अपने अस्तित्व के शुरुआती दिनों से ही एक मजबूत और स्वतंत्र मीडिया पर निर्भर
रहा है। अखबार, रेडियो, फिर टीवी और अब डिजिटल माध्यम — इन सबने नागरिकों को सूचना से सशक्त
किया है और सत्ता से सवाल पूछने की संस्कृति विकसित की है। किंतु बीते एक दशक में, विशेषतः नरेंद्र मोदी
सरकार के तहत, यह स्वतंत्रता लगातार सिमटती दिख रही है।

मुख्यधारा मीडिया के सरकारी नियंत्रण में आने और आलोचनात्मक पत्रकारिता के लगभग निष्क्रिय हो
जाने के बाद, यूट्यूब जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स आशा की किरण बनकर उभरे। स्वतंत्र पत्रकार, जो टीवी स्टूडियो
से बेदखल हो चुके थे, उन्होंने यूट्यूब पर अपने चैनल बनाए, जहाँ वे सत्ता से असहमत स्वर को मंच देने लगे।
लेकिन अब यह मंच भी सरकार की सेंसरशिप, ब्लॉकिंग, विमुद्रीकरण और मनमानी कार्रवाइयों की चपेट में है।
भारत में मीडिया की स्वतंत्रता लंबे समय से लोकतंत्र का एक अभिन्न स्तंभ रही है। स्वतंत्र पत्रकारिता
ने हमेशा सत्ता से सवाल पूछने, जनमत का निर्माण करने और नागरिकों को सूचना संपन्न बनाने का कार्य किया
है। किंतु पिछले एक दशक में, विशेषतः नरेंद्र मोदी के शासनकाल में, यह स्वतंत्रता लगातार संकट में दिखाई देने
लगी है। मुख्यधारा के मीडिया पर बढ़ते सरकारी प्रभाव और भय के वातावरण के बीच अनेक पत्रकारों ने
यूट्यूब जैसे वैकल्पिक डिजिटल प्लेटफॉर्म का सहारा लिया। यहीं से एक नई “जनमाध्यम पत्रकारिता” की लहर
उठी, जिसमें छोटे और स्वतंत्र यूट्यूब चैनल सरकार से असहमत स्वर को मंच देने लगे।
किन्तु हालिया घटनाएं दर्शाती हैं कि अब यह स्वतंत्र मंच भी सरकार की सेंसरशिप और प्रतिबंधों से
अछूता नहीं रहा। 2024 के आम चुनावों की पृष्ठभूमि में यूट्यूब चैनलों को ब्लॉक करना, विमुद्रीकरण करना और
पत्रकारों को बिना चेतावनी के उनके कंटेंट से वंचित करना एक खतरनाक संकेत है — यह न केवल प्रेस की
स्वतंत्रता पर हमला है, बल्कि भारत के लोकतंत्र की जड़ों को भी हिला देने वाला कदम है।
यह लेख इसी संकट का एक बहुआयामी चित्र प्रस्तुत करता है — जिसमें पत्रकारों के अनुभव, तकनीकी
और कानूनी पहलू, यूट्यूब की भूमिका, और सरकारी रणनीतियाँ शामिल हैं। साथ ही यह सवाल भी उठाता है:
क्या भारत में स्वतंत्र मीडिया के लिए कोई सुरक्षित मंच बचा है? और क्या डिजिटल पत्रकारिता सरकार की
आलोचना करने का साहस जुटा पाएगी, या उसे भी मुख्यधारा की तरह नियंत्रित कर लिया जाएगा?
यूट्यूब बनाम सेंसरशिप: जब लोकतंत्र की आवाज़ को चुप कराने की कोशिश होती है
भारतीय पत्रकारों ने जब पारंपरिक मीडिया में जगह और स्वतंत्रता दोनों खो दीं, तब यूट्यूब उनके लिए एक
नई राह बना। एक ऐसा मंच जहाँ वे सत्ता के विरुद्ध सवाल उठा सकते थे, सत्ताशीन शक्तियों की आलोचना कर
सकते थे, और उन आवाज़ों को मंच दे सकते थे जिन्हें मुख्यधारा का मीडिया अनदेखा कर रहा था। लेकिन अब,
जब देश 2024 के सबसे निर्णायक आम चुनाव की ओर बढ़ रहा है, वही यूट्यूब चैनल सरकार के निशाने पर
आते दिख रहे हैं।
चुप कराए जा रहे चैनल : 4 अप्रैल को, लोकप्रिय हिंदी यूट्यूब चैनल बोलता हिंदुस्तान को एक ईमेल मिला
जिसमें बताया गया कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के निर्देश पर चैनल को ब्लॉक किया जा रहा है। यह ईमेल
यूट्यूब द्वारा भेजा गया था। बिना किसी स्पष्ट सूचना या स्पष्टीकरण के, 2.75 लाख सब्सक्राइबर और 4,000 से
अधिक वीडियो वाला यह चैनल गायब हो गया। इसके संस्थापक हसीन रहमानी कहते हैं, “हमें अब तक नहीं
पता कि आखिर ऐसा क्यों हुआ। हमारे पास कोई ठोस कारण नहीं है।” इसी तरह लोकहित इंडिया, इंडस न्यूज़
टीवी और नेशनल दस्तक जैसे अन्य स्वतंत्र यूट्यूब चैनलों के भी विमुद्रीकरण की खबरें सामने आईं हैं। नेशनल
दस्तक के 10 मिलियन से अधिक सब्सक्राइबर हैं और यह खासकर दलित, आदिवासी, महिलाओं और किसानों
की आवाज़ बुलंद करने वाला मंच माना जाता है। यूट्यूबर सोहित मिश्रा बताते हैं कि उनके ईवीएम और चुनाव
आयोग पर आधारित पांच वीडियो यूट्यूब ने हटा दिए हैं। वे कहते हैं, “अगर हम चुनाव आयोग की आलोचना
भी नहीं कर सकते, तो यह तय किया जा रहा है कि हमें क्या बोलने की इजाजत है और क्या नहीं।”
मीडिया : लोकतंत्र के मुहाने पर खड़ी चुप्पी
इन प्रतिबंधों के खिलाफ 19 अप्रैल को यूट्यूबर्स का एक प्रतिनिधिमंडल चुनाव आयोग गया। लेकिन
कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं मिली। मतदान शुरू होने से कुछ ही दिन पहले कांग्रेस पार्टी ने चुनाव आयोग से इन
कार्रवाइयों के विरुद्ध अपील की। उनका कहना था कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का खुला उल्लंघन है। यह
विडंबना ही है कि जिन प्लेटफॉर्म्स ने लोकतंत्र की असली आवाज़ों को जगह दी, उन्हें अब लोकतंत्र के नाम पर
ही चुप कराया जा रहा है।
यूट्यूब: नई पत्रकारिता की जमीन
भारत के 1.3 अरब लोगों में से आधे से अधिक के पास इंटरनेट है और यूट्यूब पर लगभग 46 करोड़
भारतीय सक्रिय हैं। रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 56% लोग समाचारों के लिए यूट्यूब का
उपयोग करते हैं। राहुल गांधी जैसे विपक्षी नेता अब केवल यूट्यूबर्स को इंटरव्यू दे रहे हैं। रवीश कुमार,
अभिसार शर्मा जैसे वरिष्ठ पत्रकारों ने टीवी से हटकर यूट्यूब को चुना है। यह बदलाव केवल पत्रकारों का नहीं,
बल्कि जनता की सूचना ग्रहण करने की प्रवृत्ति का भी है।
मीडिया की आज़ादी का सवाल
यह पूरा परिदृश्य केवल सेंसरशिप नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर हो रहे हमले की तस्वीर पेश
करता है। मीडिया, विशेषकर डिजिटल मीडिया, लोकतंत्र की आंखें और आवाज़ है। अगर इन आंखों को बंद कर
दिया जाए, और इस आवाज़ को कुचल दिया जाए, तो फिर लोकतंत्र एक सजावटी शब्द बनकर रह जाएगा।
आज यूट्यूब एक ऐसा डिजिटल अखाड़ा बन गया है जहाँ सत्ता और जनता की वास्तविक लड़ाई लड़ी जा रही
है। इसमें जो पत्रकार खड़े हैं, वे न केवल अपनी जीविका के लिए, बल्कि जनता के अधिकार के लिए लड़ रहे हैं
— यह जानने के लिए कि उन्हें क्या जानने का हक़ है।
भारतीय लोकतंत्र की सेहत अब इस बात पर निर्भर करती है कि क्या हम सूचना के इस युद्ध में स्वतंत्र
आवाज़ों के पक्ष में खड़े हो पाते हैं या नहीं। सवाल केवल पत्रकारों और यूट्यूब चैनलों का नहीं है — सवाल
जनता के जानने, पूछने और तय करने के अधिकार का है।
मोदी सरकार की सेंसरशिप और यूट्यूब पत्रकारिता पर बढ़ता शिकंजा
भारत में जब 2024 के आम चुनावों की शुरुआत हुई, तब न सिर्फ़ राजनीतिक दल आमने-सामने थे,
बल्कि सरकार और स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारिता के बीच भी एक अदृश्य युद्ध छिड़ चुका था। यह टकराव सिर्फ़
विचारों का नहीं, बल्कि लोकतंत्र के सबसे अहम स्तंभ — मुक्त और निर्भीक मीडिया — की अस्मिता का संघर्ष
बन गया। पारंपरिक मीडिया पर सरकार के प्रभाव से परेशान होकर अनेक स्वतंत्र पत्रकारों ने यूट्यूब जैसे
डिजिटल प्लेटफॉर्म को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। लेकिन अब, इन यूट्यूब चैनलों को सेंसर करने,
ब्लॉक करने और विमुद्रीकरण (demonetization) जैसी कार्रवाइयों के ज़रिए सरकार उन आवाज़ों को भी
दबाने का प्रयास कर रही है, जो अपनी बात सीधे जनता तक पहुंचाना चाहती हैं।
यूट्यूब क्यों है निर्णायक मंच?
वरिष्ठ पत्रकार सेवंती निनान ने उल्लेख किया कि मोदी सरकार के पहले कार्यकाल से ही मीडिया को
नियंत्रित करने की एक रणनीति सक्रिय है — पहले पारंपरिक मीडिया को सरकारी स्रोतों से दूर किया गया,
और फिर डिजिटल मीडिया पर शिकंजा कसा गया। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने एक भी खुली
प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की। संवाद का माध्यम सिर्फ़ सरकारी मीडिया या सोशल मीडिया रहा। अब यूट्यूब को भी
नियंत्रित करने का प्रयास तेज़ हो गया है। भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ता लगभग 70 करोड़ हैं, और उनमें से
बड़ी संख्या में लोग यूट्यूब को समाचार और राय का प्राथमिक स्रोत मानते हैं। रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के
अनुसार, भारत में 56% लोग यूट्यूब से समाचार प्राप्त करते हैं — यह किसी भी देश में सबसे ज़्यादा है।
लोकतांत्रिक संवाद के लिए यूट्यूब की भूमिका
टीवी न्यूज़ की गिरती विश्वसनीयता के बीच यूट्यूब एक वैकल्पिक मंच बनकर उभरा है। पत्रकार रवीश
कुमार और अभिसार शर्मा जैसे कई नामचीन पत्रकारों ने यूट्यूब चैनल शुरू किए हैं। राहुल गांधी ने भी अपने
यात्रा के दौरान केवल यूट्यूबर्स को इंटरव्यू दिए — टीवी पत्रकारों से दूरी बनाए रखी। यूट्यूब अब न केवल
पत्रकारों का मंच है, बल्कि लोकतांत्रिक संवाद का नया मैदान भी बन चुका है। लेकिन यदि यहां भी सेंसरशिप
की तलवार लटकने लगे, तो भारत की लोकतांत्रिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है।
कानूनी धुंध और मनमानी कार्रवाई
सरकार द्वारा डिजिटल चैनलों को ब्लॉक करने के लिए जिन नियमों का सहारा लिया जा रहा है, वे हैं
2021 के सूचना प्रौद्योगिकी नियम। इनमें कुछ धाराएँ इतनी अस्पष्ट हैं कि सरकार किसी भी कंटेंट को “देश की
संप्रभुता, अखंडता या सार्वजनिक व्यवस्था के विरुद्ध” बताकर ब्लॉक कर सकती है। बोलता हिंदुस्तान को बिना
नोटिस के ही ब्लॉक कर दिया गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि संवाद और उत्तरदायित्व के लोकतांत्रिक
सिद्धांतों का पालन नहीं किया जा रहा। इसके तहत सरकारी अधिकारी सोशल मीडिया सामग्री की जांच कर
सकते हैं और उसे हटाने का आदेश दे सकते हैं। बोलता हिंदुस्तान को कोई पूर्व सूचना नहीं दी गई, न ही अपील
का अवसर मिला।
मेटा, लाभ-प्रेरित कंपनियां हैं। वे सरकार के आदेशों का पालन अपने व्यावसायिक हितों की रक्षा के
लिए कर सकती हैं, जैसा कि रॉय का तर्क है। अप्रैल 2024 में मेटा और वॉट्सऐप ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका
दायर की — अगर उन्हें उपयोगकर्ता की पहचान बताने के लिए मजबूर किया गया, तो वे भारत में सेवा बंद कर
सकते हैं।
सरकार और यूट्यूब — एक तरफा समीकरण?
एक तरफ़ सरकार आलोचकों के चैनल ब्लॉक कर रही है, दूसरी ओर वह खुद यूट्यूब का खूब इस्तेमाल
भी कर रही है। केंद्रीय मंत्रियों ने 2023 में कई यूट्यूबर्स को साक्षात्कार दिए, जिनमें अक्सर सवाल नरम होते
हैं। मनीष कश्यप नामक एक यूट्यूबर, जो फर्जी वीडियो के आरोप में जेल गए, अब भाजपा से चुनाव लड़ रहे हैं।
सरकार ने मार्च 2024 में कई यूट्यूबर्स को राष्ट्रीय निर्माता पुरस्कार से सम्मानित भी किया। बीस वर्षीय
यूट्यूबर जाह्नवी सिंह को जब प्रधानमंत्री ने हेरिटेज फैशन आइकन का पुरस्कार दिया, तो उन्होंने कहा — “मैं
हिंदू धर्म पर सरकार के फोकस को महत्व देती हूं।”
क्या लोकतंत्र डिजिटल सेंसरशिप की गिरफ्त में है?
सरकार यह दावा करती है कि वह फर्जी खबरों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है। लेकिन जब निष्पक्ष
और हाशिए की आवाज़ें, दलितों, महिलाओं, किसानों के मुद्दों को उठाने वाले चैनल निशाने पर आते हैं, तो
सवाल उठना लाज़िमी है — क्या यह सेंसरशिप है या लोकतंत्र का गला घोंटने की प्रक्रिया? एक लोकतांत्रिक
देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता केवल अधिकार नहीं, जनता की संप्रभुता का प्रमाण होती है। अगर यह
स्वतंत्रता यूट्यूब तक में सिसकने लगे, तो हमें यह पूछने का हक है — हम किस ओर जा रहे हैं?
यूट्यूब: एक नए मीडिया की क्रांति और उसका दमन : नया मीडिया, नई संभावनाएं
जब पारंपरिक मीडिया पर सरकार का शिकंजा कसने लगा, तब यूट्यूब स्वतंत्र पत्रकारों का सबसे बड़ा
सहारा बना। यहाँ न संपादक का डर, न कॉर्पोरेट विज्ञापनों की दबाव, न सरकारी विज्ञापन के लिए समझौता
— केवल कैमरा, सवाल और जनता। रवीश कुमार, अभिसार शर्मा, और तमाम नए पत्रकारों ने इस मंच को
अपनाया। 2024 के आम चुनावों से पहले, राहुल गांधी जैसे नेता भी मुख्यधारा मीडिया से दूरी बनाकर केवल
यूट्यूब पत्रकारों को इंटरव्यू देने लगे। जनता ने भी यह बदलाव अपनाया — रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के
अनुसार, भारत में 56% लोग समाचार के लिए यूट्यूब का प्रयोग करते हैं।
और फिर सरकार की नज़र पड़ी
लेकिन जैसे-जैसे यूट्यूब चैनलों की लोकप्रियता और प्रभाव बढ़ा, सरकार ने इसे भी नियंत्रण में लेने की
कोशिशें तेज कर दीं। ‘बोलता हिंदुस्तान’, ‘नेशनल दस्तक’, ‘लोकहित इंडिया’, ‘इंडस न्यूज़ टीवी’ — इन सभी
स्वतंत्र चैनलों पर सेंसरशिप और ब्लॉकिंग की कार्रवाइयां हुईं। बिना पूर्व सूचना, बिना अपील का मौका, केवल
एक ईमेल या अल्गोरिद्मिक निर्णय।
सेंसरशिप के औज़ार: कानून, डर और तकनीक : 2021 के सूचना प्रौद्योगिकी नियम
सरकार ने 2021 में जो आईटी नियम लागू किए, वे सोशल मीडिया और डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म्स को
नियंत्रित करने के लिए बनाए गए। इनमें “राष्ट्रीय संप्रभुता”, “सार्वजनिक व्यवस्था”, और “राज्य की अखंडता”
जैसे शब्दों का प्रयोग इतना लचीला है कि किसी भी असहमति को ब्लॉक करने का आधार बना लिया जाता है।
सत्ता का डिजिटलीकरण और मीडिया का अधिग्रहण
वरिष्ठ मीडिया विश्लेषक सवंत निनान ने लिखा है कि मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में ही मीडिया
को सरकारी स्रोतों से काट दिया गया था और प्रधानमंत्री संवाद के लिए केवल सरकारी मीडिया या सोशल
मीडिया का उपयोग करने लगे। उनका कहना है कि मोदी का दूसरा कार्यकाल इस नियंत्रण को डिजिटल
मीडिया तक ले आया है। मोदी ने अब तक एक भी पूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की है। मुख्यधारा मीडिया को लगभग
निष्क्रिय बना दिया गया है। अब सेंसरशिप का अगला निशाना डिजिटल प्लेटफॉर्म हैं।
यूट्यूब और मेटा (फेसबुक, इंस्टाग्राम) जैसी कंपनियां लाभ-प्रेरित हैं। वे भारत जैसे बड़े बाजार को
बनाए रखने के लिए अक्सर सरकारी आदेशों को चुनौती नहीं देतीं। यही कारण है कि स्वतंत्र पत्रकारों के चैनल
हटाए जा रहे हैं, जबकि भाजपा नेताओं को इंटरव्यू देने वाले यूट्यूबर्स को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
- दोहरा मापदंड: सरकार और यूट्यूब का गठजोड़?
जहाँ एक ओर स्वतंत्र पत्रकारों और चैनलों पर कार्रवाई हो रही है, वहीं दूसरी ओर भाजपा नेताओं को
यूट्यूबर्स से सहानुभूति भरे इंटरव्यू मिल रहे हैं। 2023 में कई केंद्रीय मंत्रियों ने यूट्यूबर्स को साक्षात्कार दिए,
जिनमें कठिन सवालों से परहेज़ किया गया। मार्च 2023 में एक यूट्यूबर मनीष कश्यप ने फर्जी वीडियो साझा
किया, फिर भी वह जेल से निकलकर भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। इससे साफ होता है कि सेंसरशिप
का उपयोग केवल विपक्षी या असहमति वाले सुरों को दबाने के लिए हो रहा है।
भाजपा और ‘दोस्ताना यूट्यूब पत्रकारिता’
एक तरफ़ स्वतंत्र यूट्यूब चैनल्स को सेंसर किया जा रहा है, दूसरी तरफ़ सरकार समर्थित यूट्यूबर्स को
पुरस्कार दिए जा रहे हैं। मार्च 2024 में प्रधानमंत्री ने कई यूट्यूबर्स को ‘राष्ट्रीय निर्माता पुरस्कार’ से नवाज़ा।
भाजपा नेताओं ने ऐसे यूट्यूबर्स को इंटरव्यू दिए जिनमें कोई कठिन या असहज सवाल नहीं था। फर्जी खबर
फैलाने के आरोपी मनीष कश्यप जैसे यूट्यूबर्स भाजपा से टिकट पाकर चुनाव भी लड़ रहे हैं।
लोकतंत्र पर खतरा: जब सूचनाएं मौन कर दी जाएं
यह संघर्ष केवल पत्रकारों या यूट्यूब चैनलों का नहीं है। यह लोकतंत्र की आत्मा — नागरिकों के जानने,
सवाल पूछने और सूचना तक पहुंचने के अधिकार — का सवाल है। जब स्वतंत्र मीडिया को बिना कारण, बिना
प्रक्रिया के बंद कर दिया जाए, तो लोकतंत्र एक छलावा बनकर रह जाता है। भारत के संविधान में अनुच्छेद
19(1)(a) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित की गई है। पर क्या डिजिटल सेंसरशिप के ज़रिये यह
स्वतंत्रता खोखली नहीं हो रही?
क्या यह चुप्पी लोकतंत्र के अंत की पूर्वसूचना है?
लोकतंत्र केवल मतपत्रों से नहीं चलता — वह सूचनाओं, संवाद और असहमति की संस्कृति से जीवित
रहता है। जब सरकार डिजिटल प्लेटफॉर्म्स तक को नियंत्रित करने लगे, तब यह संकेत है कि लोकतंत्र अब केवल
एक औपचारिक ढांचा रह गया है।आज ज़रूरत है कि नागरिक, पत्रकार, शिक्षाविद् और न्यायपालिका — सभी
मिलकर इस चुप्पी के विरुद्ध आवाज़ उठाएं। क्योंकि अगर मीडिया चुप हो गया, तो अगली बारी आपकी होगी।
कहीं गोदी मीडिया ये चुप्पी लोकतंत्र को ही न लील जाए?0000