मुनेश त्यागी
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के चीफ एम सोमनाथ का कहना है कि आधुनिक “विज्ञान की उत्पत्ति वेदों से हुई है” यह बात उन्होंने उज्जैन के संस्कृत और वैदिक विश्वविद्यालय में कही है। पहले तो इस बात पर यकीन ही नहीं हुआ, पर यह बात सही है। उन्होंने ऐसा ही कहा है। अब यहां पर सवाल उठता है कि यह सब कहां से आया और कैसे आ गया? क्या उनका यह बयान वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सही है?
जब हमने विज्ञान की पढ़ाई की तो तब से लेकर आज तक हमें ऐसा कहीं पढ़ने को नहीं मिला, ना ही किसी वैज्ञानिक शिक्षक ने ऐसा बताया। बाद में पता चला कि विज्ञान का सबसे ज्यादा विकास तो यूरोप, अमेरिका, रूस, चीन, जापान आदि जगह हुआ है। विज्ञान के विकास का इतिहास भारत के हिस्से में भी आता है। पर विज्ञान की पैदाइश वेदों से हुई है, ऐसा तो हमने कभी नहीं सुना और पढ़ा।
आईये, जरा विज्ञान और वेदों की जानकारी हासिल करते हैं। कंप्यूटर का वेदों से क्या संबंध है, यह कौन से श्लोक में लिखा गया है? क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी वेदों से निकली है? क्या इंटरनेट भी वेदों से निकला है? इनका स्रोत वेदों में कौन से श्लोक में लिखा है? इनका आविष्कार तो सबसे पहले पश्चिम में हुआ था। बिजली और हवाई जहाज के बनाने की थ्योरी कौन से वेदों की ऋचा में हुई थी? इनका आविष्कार भी पश्चिम से होकर पूरी दुनिया में फ़ैला था।
पुष्पक विमान का निर्माण कौन सी फैक्ट्री में हुआ था, इसे किसने बनाया था? इसका उल्लेख वेदों में कहां किया गया है? उसके बाद उस फैक्ट्री का क्या हुआ? हमें बताया गया कि सूरज को हनुमान निगल गया था। आइये सूरज के बारे में जानकारी हासिल करते हैं। हमारी पृथ्वी का ब्यास लगभग 12,700 किलोमीटर है। इसका वजन लगभग 66, 00, 00, 00, 000 अरब टन है। सूरज इतना बड़ा है कि इसमें हमारी पृथ्वी जैसे 13,00,000 पिंड समा सकते हैं सूर्य पृथ्वी से 3, 30, 000 गुना भारी है। सूर्य की सतह का तापमान 6,000 डिग्री सेंटीग्रेड है परंतु इसके केंद्र भाग का तापमान लगभग डेढ़ करोड़ डिग्री सेंटीग्रेड है। क्या किसी बंदर या हनुमान द्वारा सूर्य को निगल जाना संभव हो सकता है? क्या यह सब गपोड़ और अंधविश्वास ही नहीं कहा जायेगा?
कहा जाता है की हनुमान हिमालय पर्वत को उखाड़ लाया था। मगर क्या कोई बंदर हिमालय पहाड़ को वो भी अंधेरी रात में उखाड़ कर हजारों मील दूर तक उड़ कर लें जा सकता है? क्या माइथॉलजी को इतिहास के स्थान पर पढ़ा जा सकता है? क्या यह बात वैज्ञानिक तथ्यों से परिपूर्ण है और इसमें विवेक और लॉजिक का लेश मात्र भी कोई अंश मौजूद है?
वेदों में गति और गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांतों का वर्णन किस अध्याय में किया गया है, उसके बाद इन सिद्धांतों को भारत की जमीन पर क्यों नहीं उतारा गया और फिर वे कहां विलुप्त हो गए? वेदों में इसका कोई भी जिक्र मिलता है। विज्ञान की पुस्तकों में या किसी भी क्लास के पाठ्यक्रम में ऐसा कुछ भी नहीं लिखा हुआ है।
चंद्रयान 1,2,3 में प्रयोग में लाये गए थ्रस्ट और प्रोपल्शन के कौन से सिद्धांतों के वर्णन की जानकारी वेदों में दी गई है? रॉकेट साइंस के सिद्धांत का ब्यौरा वेदों में कहां दिया गया है? ओर्बिटर, लैंडर और रोवर के कौन से सिद्धांतों का वर्णन वेदों में कहां और कब किया गया था? क्या इसकी जानकारी के बारे में किसी को कुछ पता है?
अगर यह सब हजारों साल पहले से वेदों में मौजूद था तो भारत स्पेस साइंस में कैसे पिछड गया? और कैसे रूस, अमेरिका, चीन हमसे आगे निकल गए और चांद पर जा पहुंचे? इसका कोई भी जिक्र या वर्णन इसरो के अध्यक्ष ने नहीं किया है।
वेदों में विज्ञान होने के बाद भी हमारा देश और हमारे वैज्ञानिक क्यों रूस, अमेरिका, चीन और दुनिया के तमाम देशों की स्पेस साइंस का अध्ययन करते रहे? क्यों हमारे वैज्ञानिक वहां की जानकारी और अनुभव और आविष्कारों का अध्ययन करते रहे? वेदों से कौन से विज्ञान की जानकारी इसरो अध्यक्ष ने हासिल की है? उन्होंने यह जानकारी कौन से स्कूल और विश्वविद्यालय से हासिल की है? उन्हें इसकी पूरी जानकारी हमारे देश की जनता को देनी चाहिए ताकि हमारे बच्चे और हमारे तमाम वैज्ञानिक अपना देश छोड़कर क्यों विदेशी विश्वविद्यालयों की खाक छानते फिरें, इस पूरी जानकारी और ज्ञान को क्यों हमारे विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल नहीं किया गया? क्या इसका कोई जवाब इसरो अध्यक्ष के पास है?
पेन, साइकिल, स्कूटर, मोटरसाइकिल, कार, बस, रेल, टेलीविजन, रेडियो, फ्रिज, ऐसी, पंखा, कूलर, फ़ोन, मोबाइल, वाशिंग मशीन, फोटोग्राफी, टेलीफोन, गृहों का ज्ञान, लैंप, बल्ब, टेबल लैंप, चश्मा, एक्स-रे, कागज, प्रिंटिंग प्रेस, अखबार, छापाखाना, हवा, तमाम तरह की गैसेस, अणु, एटम बंम, वायु प्रदूषण के माप यंत्र, चिकित्सा क्षेत्र की अधिकांश दवाइयां और उपकरण का ब्यौरा वेदों में कहां लिखा हुआ है? इस सारे ज्ञान विज्ञान का जिक्र किस वेद में किया गया है? इन सब का हवाला इसरो अध्यक्ष ने कहां दिया है? इसका कोई विवरण भी उन्होंने नहीं दिया है।
इसरो अध्यक्ष ने अपना बयान देकर जो कहा है वह सब खुशामदी चरित्र की निशानी है, और उनकी गरिमा और पद के खिलाफ है। यह सब बिना औचित्य की एहसान फरामोशी में किया गया कृत्य है और यह सब कुछ पद, प्रतिष्ठा और पैसा पाने की लालसा है या किसी दबाव में आकर वैज्ञानिक संस्कृति के अभियान बहुत बड़ी चोट पहुंचाने वाला ब्यान है। एक वैज्ञानिक जिसकी टीम ने भारत की स्पेस साइंस के इतिहास में इतना बड़ा ऐतिहासिक पराक्रम किया है, उसको यह सब करने की और कहने की क्या जरूरत है?
यह सब करके इसरो अध्यक्ष ने अपने पद, गरिमा और मान मर्यादा का अपमान किया है। इससे इसरो की साख की पूरे देश में किरकिरी हो रही है। इसरो अध्यक्ष द्वारा यह सब करना एकदम अनावश्यक था। यह बयान भारत के संविधान में लिखित ज्ञान विज्ञान की संस्कृति के अभियान के एकदम खिलाफ है। भविष्य में इस तरह की गिरी हुई हरकतों से हर कीमत पर बचा जाना चाहिए। यही देश के ज्ञान विज्ञान के अभियान के हित में है।

