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योनि~मुद्रा : काम से राम देने वाला ध्यान का सोपान

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सुधा सिंह

    _सीखिए काम-उर्जा के रूपांतरण का अनूठा प्रयोग! यानि उर्जा की काम से राम की ओर यात्रा की किमिया._

         योग में गुदाद्वार को भीतर खींचने को “मूलबंध” लगाना कहते हैं।  गुदाद्वार के साथ ही मूत्रद्वार को भी भीतर खींचते हुए ध्यान सहस्त्रार चक्र पर केंद्रित करने को “योनि-मुद्रा” कहा गया है.

    _योनि का अर्थ यहाँ मानवयोनि से है, जिसमें मनुष्यमात्र शामिल है._

योन-मुद्रा उर्जा जागरण के बाद हमारे शरीर पर घटने वाली प्रमुख घटनाओं में से एक घटना है। उर्जा जागरण जब घटता है तो हमारा शरीर योनि-मुद्रा में प्रवेश करता है।

     _योनि-मुद्रा में प्रवेश करने पर हमारा ध्यान सहस्त्रार चक्र पर केंद्रित हो जाता है। जैसे ही हमारा ध्यान सहस्त्रार चक्र पर केंद्रित होता है नीचे के दोनों रास्ते स्वत: बंद हो जाते हैं। मलद्वार और मूत्रद्वार दोनों भीतर की ओर स्वतः ही मुड़ जाते हैं।_

      जिस भांति हम मल-मूत्र को रोकने के लिए दोनों रास्तों को भीतर सीकोड़ते हैं, उसी भांति योनि-मुद्रा के घटने पर दोनों रास्ते अपने से भीतर की ओर सिकुड़ जाते हैं और ऊर्जा सहस्त्रार चक्र की ओर बहने लगती है, लेकिन~

  ऐसा होता है उर्जा जागरण घटने के बाद। 

इसी घटना को फिर दूसरे सिरे से लिया गया कि यदि उर्जा जागरण पर योन मुद्रा घटती है तो यदि हम नीचे के दोनों द्वारों को बंद कर ध्यान को सहस्त्रार चक्र पर केंद्रित करते हुए योनि-मुद्रा में प्रवेश करते हैं तो उर्जा जागरण के लिए यात्रा पथ का निर्माण शुरू हो जाता है।

यानि कि घटना दूसरे छोर से भी घट सकती है। 

लेकिन…

    _यदि मूलाधार पर उर्जा जागी ही नहीं है और हम योनि मुद्रा में प्रवेश करते हैं तो फिर उर्जा ऊर्ध्वगामी कैसे होगी? इसलिए योनि -मुद्रा में तब प्रवेश करना होता है जब हमारी उर्जा योनि-केंद्र पर इकत्रित हो गई होती है!_

   योनि -मुद्रा के इस प्रयोग को कभी भी और कहीं भी किया जा सकता है। पहले तो तब करना है जब मन में कामवासना का विचार उठे और योन-केंद्र पर उर्जा इकत्रित होने लगे तब और दूसरा तब करना है जब हम सुबह जागने पर बिस्तर में होते हैं तब करना है।

       _रात को नींद में गहरी श्वास से योन-केंद्र पर उर्जा इकत्रित होती है और सुबह तक लिंगोत्थान हो जाता है। जागने पर यह उर्जा मूत्र-मार्ग से बाहर चली जाती है। अतः दिन में कामोत्तेजना होने पर और सुबह नींद से जागने के समय जब कामकेंद्र पर उर्जा इकत्रित होती है तब बिस्तर से उठने के पहले योन-मुद्रा में प्रवेश करना होता है।_

        जहां कहीं भी कामोत्तेजना के पकड़ने पर तथा सुबह जागने पर योन-केंद्र पर जब उर्जा इकत्रित होने लगती है तब… आंखें बंद करके श्वास को गहरी और धीमी कर लेते हैं।

      उतनी धीमी और गहरी, जितनी रात सोते समय नींद में होती है। 

फिर मूत्रद्वार और गुदाद्वार दोनों को भीतर सिकोड़ लेते हैं।

       ठीक उसी तरह भीतर सीकोड़ते हैं जिस तरह से हम मल-मूत्र को रोकने के लिए सिकोड़ते हैं। 

 अब सारा ध्यान सिर में केन्द्रित करते हैं आँखें बंद करके सारा ध्यान सिर में लगा देते हैं, जहां अंतिम सहस्त्रार चक्र है। सिर में उस जगह ध्यान केन्द्रित करते हैं जहां चुटिया होती है।

      _यानी चुटिया वाली जगह को आंख बंद करके भीतर से देखते हैं। ठीक उसी तरह से देखते हैं, जिस तरह से मानो हम अपने कमरे में बैठे हैं और गर्दन उठाकर उपर छत पर टंगे पंखे को देख रहे हैं।_

    इस तरह भीतर से सिर में ध्यान लगाकर देखते हैं तो उर्जा सहस्त्रार चक्र की ओर बहने लगती है। 

आप बहुत चकित होंगे जब योनमुद्रा में आपका प्रवेश होगा! यदि कामवासना के पकड़ने पर और सुबह जागने पर जब उर्जा कामकेंद्र पर इकठ्ठा हो जाती है तब हम मूत्रद्वार और गुदाद्वार दोनों को भीतर सिकोड़ लेते हैं।

      आँखें बंद कर के सारा ध्यान सिर में सहस्त्रार चक्र पर केन्द्रित करते हैं… और देखते रहते हैं… देखते रहते हैं… देखते रहते हैं… तो कुछ ही क्षणों में कामकेन्द्र पर उठी उर्जा, रीढ़ के माध्यम से चक्रों पर गति करती हुई सहस्त्रार की ओर बहने लगती है, और कामकेंद्र धीरे-धीरे शिथिल होने लगता है। यानी काम-उर्जा, ध्यान-उर्जा में परिवर्तित होने लगती है।

       अर्थात उर्जा काम से राम की ओर बहने लगती है।

       _यदि हम अपनी बाहर जाती इस उर्जा को भीतर मोड़कर उसका श्रृजनात्मक उपयोग कर लेते हैं। यदि हम कामकेंद्र पर उठी काम उर्जा को सिर में सहस्त्रार चक्र की ओर लौटा देते हैं तो धीरे-धीरे उर्जा जागरण के लिए रास्ता बनना आसान होता चला जाता है।_ 

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