मुनेश त्यागी
यह भारत के गांवों के गांव, स्वतंत्रता आंदोलन के गांवों के केंद्र, गांव “रासना” जिला मेरठ की बहादुराना दास्तान है। हमारे श्रध्देय ताऊजी और स्वाधीनता संग्राम सेनानी श्री प्रणाम सिंह त्यागी मरने से एक दिन पहले बीमार थे, पीएल शर्मा अस्पताल मेरठ में एमरजेंसी वार्ड में भर्ती थे। हम सुबह सुबह जैसे ही उनका हालचाल पूछने पहुंचे, तो हम सुबह सुबह क्या देखते हैं कि नहा धोकर कपडे पहने बैड पर लेटे हुए हैं, हमने पूछा ताऊजी आज कहां जाना है, बडी जल्दी सज धज कर बैठ गये हो, तो वो तपाक से बोले,,,,, आज भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम दिवस का दिन 10 मई है, औघडनाथ के मंदिर चलना है, तुम लोग भी तैयार हो जाओ और जल्दी करो। यह था उनका देश की आजादी के प्रति समर्पण, प्रतिबद्धता और अनुशासनप्रियता कि वे आजादी के मौके को मनाने के अवसर को, यूंही नहीं गंवा देना चाहते थे। बीमार थे, मरने की करीब है थे तो भी आजादी की लौ, उस आजादी को बरकरार रखने की ज्वाला उनके अंतर्मन में अभी भी जिंदा थी और गजब की बात यह थी की यही जज्बा उस समय के तमाम स्वतंत्रता सेनानियों में मौजूद था।
वे काफी बीमार थे, फिर भी बिना किसी सहारे के 91 वर्षीय हमारे स्वतंत्रता सेनानी ताऊजी पैदल चलकर औघड़नाथ मंदिर के भाषण कक्ष में पंहुच गये। उस समय वे स्वतंत्रता सेनानी परिषद मेरठ के जिला अध्यक्ष भी थे। हाल में जोरदार तालियों की गडगडाहट के बीच में उनका जोरदार खैरमकदम किया गया और वे अपने आसन पर जाकर बैठ गये।
जब उन्हें बोलने को कहा गया तो आजादी का तराना गाने को तैयार हो गये। हमने अपने साथियों की मदद से उन्हें समझाया कि दिल और दमे के मरीज हो, गाना मुनासिब न होगा, तो खैर मान गए। अगले दिन उनका देहावसान हो गया। तो यह है मरने से एक दिन पहले की उनकी चंद यादें.
1942 के भारत छोडो आंदोलन में दो वर्ष की जेल काटी। कमाल की बात यह है कि 1942 के आंदोलन में हमारे दादा जी महाशय सागर सिंह त्यागी, मेरठ की जेल में अपने दो बेटों स्वर्गीय ओमप्रकाश त्यागी उर्फ “कानूनी ” और प्रणाम सिंह त्यागी के साथ और हमारे गांव रासना के 17 स्वतंत्रता सेनानियों के साथ जेल में बंद थे।
सच में लोगो में आजादी के प्रति दीवानगी किस कदर थी कि एक बाप अपने दो बेटों के साथ आजादी के लिए अपना सब कुछ यहां तक कि अपने जीगर के टुकडों को लेकर अंग्रेजों से जंग करने हिंदुस्तान की आजादी की जंग में कूद पडा, यह जाने बगैर की उनका क्या हस्र होने वाला है, कभी वापस घर आयेंगे भी या नही? वैसे इस समय के हमारे गांव के सारे, आजादी के दीवानों का कहना था कि “हमें घर वापस आने की कोई उम्मीद थी ही नही।”
लोग, हमें गुलाम बनाने वाले अंग्रेजों से किस कदर नाराज, हताश, निराश और परेशान थे कि हमारे आजादी के आंदोलन के दीवाने, सब कुछ अपने घर वालों या यार, कुटुम्बियों पर छोडकर, आजादी की लडाई में कूद पडे। उनका कितना बडा जिगर रहा होगा और किस कदर हौंसला बुलंदी थी कि देश की आजादी के लिए सब कुछ स्वाह करने को तैयार थे। हमारे दादा जी का हौंसला कितना बुलंद रहा होगा कि अपने दो बेटों को लेकर, देश की आजादी के लिए जेल चले गए। आज यह सब कितना आश्चर्यचकित करने वाला लगता है। दिल की गहराईयों से शत शत नमन, वंदन और अभिनंदन है, उस महान चेतना को। यह देश की आजादी के दीवानों का दुर्लभ उदाहरण है कि जहां एक पिता अपने दो बेटों के साथ, भारत की गुलामी की बेड़ियां तोड़ने के लिए आजादी के आंदोलन में जेल में हो।
एक बार हमारे स्वतंत्रता सेनानी ताऊजी 1930 के दशक में फैली अंग्रेजों की दहशत के बारे में बता रहे थे कि कांग्रेस का फरमान आया की झंडा यात्रा निकालनी है और भारत की आजादी की और महात्मा गांधी जय के बोलने हैं, नारे लगाने हैं। गांव वालों के साथ मिलकर और सलाह मशविरा करके, समय और लोग तय हो गये। सुबह 5:00 का समय तय किया गया और तय किया गया कि फला फला लोग झंडा यात्रा में शामिल होंगे। नियत समय के अनुसार, हमारे स्वतंत्रता सेनानी दादा जी झंडा लेकर नियत स्थान पर पहुंच गए और वहां लोगों के आने की इंतजार करते रहे। अंग्रेजों के इस खौफ और दहशत के बाद भी हमारे गांव से सत्रह स्वतंत्रता सेनानी 1942 के “करो या मरो” और “अंग्रेज़ों भारत छोड़ो” के एतिहासिक आंदोलन में जेल गए थे।
5:00 बजे कोई नहीं आया, इंतजार करते-करते 6:00 बज गए, कोई नहीं आया। फिर इंतजार करते-करते 7:00 बज गए, कोई नहीं आया। इंतजार करते-करते 8:00 बज गए, कोई नहीं आया, तब कोई रास्ता न देख, हमारे दादा जी अकेले ही चल पड़े और कमाल की बात देखिए कि वे खुद ही आजादी का नारा लगाते और खुद ही आजादी के नारे की जय बोलते, क्योंकि वहां नारे का साथ देने के लिए कोई नहीं था। यह सब इसलिए हुआ क्योंकि उस समय लोग अंग्रेजों से बहुत डरते थे। अंग्रेजों की दहशत फैली हुई थी।
हमारे दोनों ताऊजी, जब आजादी के संग्राम का वृतांत सुनाते तो रोंगटे खडे हो जाते। वे बताते कि कैसे उन्होंने दूसरे आजादी के सेनानियों के साथ मिलकर जेल में रात के समय होने वाली हर घंटे की गिनती को रोका, कैसे चक्की से रोजाना पांच पांच किलो आटा पीसे जाने को रोका, कैसे रोजाना पांच पांच किलो बाण बांटने को रोका, इस सब के लिए जेल में पिटाई सही।
हमारे स्वतंत्रता सेनानी ताऊजी श्री प्रणाम सिंह जेल में अपने साथियों में सबसे छोटी उम्र के थे। एक दिन जेल में पिटाई के निशान जब हमारे दादा जी ने उनके जिस्म पर देखे तो वे रो पडे और बहुत देर तक रोते रहे। वे बताते थे कि भारत माता की जय और महात्मा गांधी की जय बोलने की पाबंदी थी, कैसे आजादी के गाने और तराने गाने पर पाबंदी थी?
वे बताते कि हम कहां मानने वाले थे, मौका मिलते ही, नारे लगाकर सारी जेल को गुंजायमान कर देते, कैसे दूसरे कैदी भी आजादी के तरानों को गाने और गुनगुनाने लगते। कुछ गीतों को गाये जाने पर तो सीधी गिरफ्तारी और जेल मिलती। हमारे बड़े ताऊजी ओमप्रकाश त्यागी उर्फ कानूनी द्वारा सुनाए गए, कुछ गानों गीतों की चंद पंक्तियां देखिये,,,,,,
मैं फानी नही हूं, फनाह क्या करेंगे,
मेरा मारकर वो भला क्या करेंगे,
हथेली पै जो सिर लिए फिर रहा हो,
वो सिर उसका धड से जुदा क्या करेंगे?
और देखिये, वो बताते कि भगत सिंह की फांसी ने नौजवानों में बडा जोशोखरोश भरा। शहीद भगतसिंह पर गीत गाने भी खूब रचे गए, बनाये गये और सरेआम गाए गए। कुछ पंक्तियां देखिये,,,,,
क्या भगतसिंह वीर को यूं ही भुलाया जायेगा?
बेशकीमती लाल क्या यूं ही खपाया जायेगा?
फूंक दो ऐसेंम्बली, घर तोड दो सैय्याद का,
तीन के बदले में ये, जालिम मिटाया जायेगा।
उन दिनों हमारा गांव यानी रासना कांग्रेस का अंडर ग्राउंड अड्डा था। वहां पर गांधी आश्रम था जहां पर खादी बनाने का काम होता था और यही पर कांग्रेस के वे लोग जिनकी गिरफ्तारी के वारंट हो जाते थे, तो वे तो वह चुप कर रहने के लिए यही पर आ जाते थे। कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता यहां आए थे एक बार चंद्रशेखर आजाद भी हमारे गांव में आए थे और उन्होंने हमारे गांव के स्वतंत्र सेनानी मास्टर रघुवीर सिंह के घर पर सरसों का साग और मक्का की रोटी का खाना खाया था।
हमारे दादा जी उन दिनों गांव रासना के कांग्रेस के सबसे बड़े कार्यकर्ता थे। उन दिनों बहुत गरीबी थी, रोटी के लाले थे। घर घर में मुफलिसी पसरी हुई थी। आजादी के स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों के लिए वक्त बेवक्त खाने का इंतजाम करना बडा ही मुश्किल हो जाता था। वक्त बेवक्त का खाना हमारे घर से ही बनकर आता था। हमारी दादी कटोरा उठाकर कहां कहां से आटा मांग कर लाती और फिर रोटियां बनाकर आश्रम में ठहरे सैनानियों को भिजवाती, और अनजाने में वे भी आजादी के संग्राम में अपना रोल अदा कर रही होतीं।
आजादी के बाद, देश के किसानों के, मजदूरों के, बेरोजगारों के, हालात देखकर हमारे दोनों ताऊजी कहा कहते थे कि “हम ऐसे भारत की दुर्दशा के लिये जेल में नही गये थे, यह जनता का राज नही है, यहां तो अमीरों और गद्दारों की चांदी हो रही है, यह हमारे सपनों का हिंदुस्तान नही है।” यहां की शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और किसानों और मजदूरों की दुर्दशा और दुर्गति को देखकर वो बडे ही मायूस हो जाया करते और वे कहा करते कि हम ऐसे भारत के लिए, ऐसे भारत के निर्माण के लिए, जेल में नहीं गए थे। यह वह आजादी नहीं है जिस की कामना करके हम जेलों में गए थे। हम यहां पर कहना चाहेंगे कि जिस आजादी के लिए हमारे दादाजी और ताऊ जी जेल में गए थे, वह अभी अधूरी है और हमें फक्र है कि हम भारत के किसानों, मजदूरों और आम जनता की मुकम्मल आजादी के अभियान में लगे हुए हैं और वह आजादी किसानों मजदूरों का राज्य और सरकार कायम होने पर, केवल समाजवादी व्यवस्था में ही मिल सकती है।
गांव रासना के अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के नाम इस प्रकार हैं मास्टर रघुवीर सिंह, रतिराम त्यागी, रेवा त्यागी, सूरत सिंह त्यागी, काले सिंह त्यागी, पंडित भृंग शर्मा, भिक्कन त्यागी, सेठ फूल सिंह, मास्टर सुंदरलाल छज्जू, जहारिया, मिट्ठू लाल, डालचंद और उमराव सिंह।
उन सबकी याद को नन्दन, वंदन और अभिनंदन और हमारी विनम्र और भावभीनी श्रध्दांजलि। हमारे वतन के आजादी के दीवाने अमर रहे, हमें आधी अधूरी जैसी भी आजादी मिली है, आज वह खतरे में पड गयी है। उस पर काले बादल मंडरा रहे हैं। आओ इस आजादी के पौधे को कमजोर करने की मुहिम का मुकाबला करे और हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों का हिंदुस्तान बनाने के अभियान को दोबारा शुरू करें।

