एपी माहेश्वरी
हाल ही में लाए गए आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) अधिनियम, 2020 को लेकर गहन बहस चल रही है। जो लोग इस कदम का विरोध कर रहे हैं, उनका कहना है कि यह आक्रामक है और व्यक्ति की निजता के खिलाफ है। इस विषय पर अपने विचार रखने से पहले मैं एक महत्वपूर्ण बात दोहराना चाहता हूं, जो एक डॉक्टर ने रोगी का इलाज करते समय कही थी, ‘दवा की सही शक्ति ही नहीं, हमें यह भी देखना होगा कि यह औषधि जिस शरीर में जा रही है उसकी क्या स्थति है।’ समय के साथ हमने यह महसूस किया है कि अपने यहां की वकालत आधारित प्रणाली में गरीब और आम आदमी के लिए न्याय पाना दूभर हो जाता है। वास्तविक अपराधी ‘सबूत’ की कमी के आधार पर ज्यादातर मुक्त हो जाते हैं।
डेटाबेस की अहमियत
यह अपने आप में लंबे समय से बहस का विषय रहा है कि केवल प्रस्तुत साक्ष्य के आधार पर निर्णय होने चाहिए या जज द्वारा स्वयं भी छानबीन की जानी चाहिए। कुछ विशेष कानून भी समय-समय पर आरोपी के प्रथम-दृष्टया दोषी होने की मान्यता के आधार पर पारित किए गए हैं। आजकल साइबर प्लैटफॉर्म और टेक्नॉलजी का जोर काफी बढ़ गया है। ऐसे में स्वाभाविक ही कानूनी जांच के दायरे में आने वालों के तकनीकी डेटाबेस और मनो-वैज्ञानिक पहलू महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
यदि विज्ञान और तकनीक से सचाई का पता लगाने और अकाट्य सबूत जुटाने में मदद मिलती है तो कानून का शासन स्थापित करने के लिए ये मदद क्यों नहीं लेनी चाहिए? दोषियों को सजा दिलाने और यहां तक कि संभावित अपराधों को समय रहते रोक देने के लिए कानून व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों को शक्तियां देने से परहेज क्यों?
वैसे भी न्याय प्रणाली में सुधार के प्रयास लगातार होते रहे हैं। विधि आयोग ने समय-समय पर अपनी रिपोर्टों में विभिन्न आपराधिक कानूनों में संशोधनों की सिफारिश की, जिनमें गाड़ी चलाने में हुई असावधानी जैसे कुछ अपराधों को क्षम्य बनाने, गलत तरीके से गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों के लिए उपयुक्त मुआवजे से लेकर त्वरित न्याय तक की व्यवस्था करने जैसी संस्तुतियां शामिल रही हैं। विधि आयोग के अलावा, विभिन्न कमेटियों जैसे बेजबरुआ समिति, विश्वनाथन समिति, मालिमत समिति, माधव-मेनन समिति आदि ने भी आपराधिक कानूनों में धारा-विशिष्ट संशोधनों और आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार की सिफारिशें की हैं। गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने तो अपनी 146वीं रिपोर्ट में सिफारिश की थी कि देश की आपराधिक न्याय प्रणाली की व्यापक समीक्षा की आवश्यकता है।
अदालतों में अभी भी बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं, दोषसिद्धि की दर भी कम है, कानूनों द्वारा लगाए गए जुर्माने की राशि नगण्य है, कानूनी जटिल प्रकृति के कारण न्याय देने में लगातार देरी होती रही है। यह महसूस किया जाता रहा है कि प्रचलित प्रणाली गरीबों की न्याय तक आसान पहुंच को बाधित करती है। कानूनी प्रणाली में डिजिटल साधनों के अपर्याप्त उपयोग के अलावा फरेंसिक साक्ष्य का भी अभाव है। साथ ही साक्ष्य नियम तकनीकी विकास के अनुरूप नहीं हैं। इन सभी कठोर और दुर्भाग्यपूर्ण वास्तविकताओं ने आम आदमी की परेशानी को और बढ़ा दिया है।
सभी नागरिकों, विशेष रूप से समाज के कमजोर और पिछड़े वर्गों के लिए त्वरित न्याय सुनिश्चित करना किसी भी जिम्मेदार सरकार का मुख्य दायित्व होना चाहिए। विचाराधीन वर्तमान विधेयक इस प्रक्रिया की शुरुआत है जो एक सहभागी और एक परामर्शी दृष्टिकोण पर आधारित है। गृहमंत्री ने राज्यों के प्रमुखों के साथ-साथ संघीय सरकार के सुझावों के बाद विभिन्न न्यायिक संस्थानों के प्रमुखों और कानूनी चिकित्सकों के सुझाव मांगकर इस प्रक्रिया को शुरू किया। राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के कुलपति की अध्यक्षता में एक समिति ने देश भर के विशेषज्ञों, अनुसंधान केंद्रों, शिक्षाविदों, वकीलों और नागरिक समाज के सदस्यों से भी सुझाव आमंत्रित किए। बाद में संसद सदस्यों के सुझाव भी मांगे गए। एनएलयू समिति ने इस वर्ष फरवरी के अंतिम सप्ताह में अपनी अनुशंसा रिपोर्ट प्रस्तुत की।
प्रोटोकॉल के अनुसार प्रस्तावित महत्वपूर्ण विधेयकों को विधायी अनुमोदन प्राप्त करने से पहले उचित प्रतिक्रिया के लिए सार्वजनिक डोमेन में रखा ही जाता है। बाद में संसद द्वारा नामित समितियां भी इसे सख्ती से जांचेंगी। किंतु महत्वपूर्ण यह है कि हमें एक ऐसी प्रणाली लाने के लिए सामूहिक रूप से प्रतिक्रिया देनी चाहिए जो वास्तव में काम करे। इसी तरह के मॉडल अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों में मौजूद हैं।
मुठभेड़ या बंधे-बंधाए गवाहों का सहारा लेने वाली मौजूदा दोषपूर्ण व्यवस्था को चलाते रहने के बजाय आइए हम इसे तर्कसंगत तरीके से सशक्त बनाएं। लेकिन यह भी आवश्यक होगा कि सत्ता में आसीन अधिकारियों की जवाबदेही के साथ-साथ हम उनके दायित्वों को भी ध्यान में रखते हुए व्यवस्था को उचित रूप दें। वर्तमान में तकनीकी रूप से जुड़े वैश्विक अपराधियों द्वारा संचालित आतंकवादी मॉड्यूल, कट्टरपंथियों द्वारा आसान डिजिटल तरीकों से अवांछनीय प्रसार, नशीली दवाओं के साथ-साथ मानव तस्करी, ऑनलाइन शोषण, राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर स्थानीय गिरोहों या कुटिल व्यक्तियों से निपटने के लिए कुछ गंभीर और असाधारण उपाय करना समय की आवश्यकता है। एक सुरक्षित वातावरण बनाने के लिए प्रणालीगत प्रावधानों की आवश्यकता है। लेकिन अमल के स्तर पर भी पेशेवर नजरिया और आवश्यक स्वायत्तता दोनों सुनिश्चित किए जाने की जरूरत है।
समान व्यवहार की गारंटी
इसलिए आसन्न खतरों के मद्देनजर जहां एक मजबूत व्यापक कानूनी प्रणाली होनी चाहिए, वहीं कानून के प्रति जवाबदेह लेकिन स्वायत्त प्रतिक्रिया क्षमता भी विकसित की जानी चाहिए। आज के समय में दोनों समान रूप से आवश्यक हैं। हमारा मानना है कि दूसरे पहलू पर भी विधिवत विचार किया जाएगा। जिन देशों के उदाहरण ऊपर दिए गए हैं, वहां सत्ता में बैठे राजनीतिक लोगों के साथ भी आरोपी के रूप में समान व्यवहार किया जाता है। जब तक वह आश्वासन भी शीर्ष स्तर से नहीं आता, तब तक राजनीतिक उद्देश्यों के लिए ऐसे अधिनियमों के दुरुपयोग की आशंका एक निरंतर प्रतिरोध का कारक बनी रहेगी और जनता के विश्वास को डगमगाती रहेगी।
(लेखक पूर्व विशेष सचिव (आंतरिक सुरक्षा) हैं और सीआरपीएफ के डीजी रह चुके हैं)
