अमिता नीरव
एक धूप भरे सुनहरे दिन में जबकि जंगल में सबकुछ सहज था, एक खरगोश तेजी से दौड़ रहा था। उससे बंदर ने पूछा, ‘क्या हुआ भई, क्यों दौड़ रहे हो?’उसने जवाब दिया, ‘आसमान गिरने वाला है।’
बंदर भी उसके साथ दौड़ने लगा। आगे उन्हें जिराफ मिला, उसने भी वह सवाल किया, उसे भी वही जवाब मिला। जिराफ भी साथ हो लिया। एक-एक कर औऱ भी जानवर मिले, सबने यही पूछा, सबको वही जवाब मिला, वे सारे भी साथ हो लिए। आखिर में शेर मिला, उसने भी वही पूछा, उसे भी वही जवाब मिला। जवाब सुनकर शेर भी भागने लगा।
किसी ने रूककर यह नहीं सोचा कि ऐसा कैसे हो सकता है? या ये कि खरगोश को यह किसने कहा कि आसमान गिरने वाला है? औऱ यदि आसमान गिर ही रहा है तो ये सब बचने के लिए कहाँ भागेंगे? बचपन में यह नीतिकथा हममें से हरेक ने सुनी होगी। शायद पहला पोस्ट-ट्रुथ खरगोश ने ही बोला होगा।
साल 2016 में ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने एक शब्द ‘पोस्ट-ट्रुथ’ को ‘वर्ड ऑफ द इयर’ चुना था। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार सबसे पहले पोस्ट-ट्रुथ शब्द का इस्तेमाल 1992 में सर्बियन अमेरिकन प्ले राइटर स्टीव टेसिच ने अपने निबंध ‘द नेशन’ में किया था, लेकिन तत्कालीन दुनिया में डोनाल्ड ट्रंप का अमेरिकी राष्ट्रपति हो जाने और रेफरेंडम में यूरोपियन यूनियन से ब्रिटेन के निकल जाने के समर्थन में आए नतीजों ने इसे उस साल इस्तेमाल किए गए शब्दों में सबसे ऊपर ला खड़ा किया।
2016 के राष्ट्रपति चुनावों में जब डोनाल्ड ट्रंप जीते थे, तब जैसे पूरी दुनिया सकते में आ गई थी। दुनिया का ‘मेल्टिंग पॉट’ कहे जाने वाले अमेरिका में एक धुर दक्षिणपंथी का राष्ट्रपति हो जाने का मतलब सीधा-सा यही था कि अमेरिका वह अमेरिका नहीं रहा, जिसके बौद्धिक आतंक से डरा जाए। यूँ अमेरिकी बौद्धिकता का गुब्बारा भी वहाँ के पूँजीवाद का फुलाया हुआ ही था, लेकिन आखिर परसेप्शन तो यही था न!
पोस्ट-ट्रुथ को कैंब्रिज डिक्शनरी में ‘relating to a situation in which people are more likely to accept an argument based on their emotions and beliefs, rather than one based on fact.’ की तरह परिभाषित किया था। (एक ऐसी स्थिति जिसमें लोग तथ्यों की बजाए भावनाओं और विश्वासों के आधार पर तर्क स्वीकार करते हैं।)
यह सूचना-क्रांति के प्रारंभिक दौर की घटना है। ऐसा नहीं है कि इससे पहले इस तरह की घटनाएँ नहीं हुई हैं। इससे पहले 2001 में तत्कालीन राष्ट्रपति बुश ने दुनिया को बताया कि इराक के पास ‘वेपंस ऑफ मास डिस्ट्रक्शंस’ हैं और इऱाक दुनिया में शांति के लिए बड़ा खतरा है।
इसी आधार पर 2003 में अमेरिका के साथ यूके, ऑस्ट्रेलिया औऱ पोलैंड की सेनाओं ने इऱाक पर आक्रमण किया। तीन सप्ताह चले इस दूसरे खाड़ी युद्ध के अंत में सद्दाम हुसैन को गिरफ्तार कर लिया गया था। पूरी दुनिया ने राष्ट्रपति बुश के ‘वॉर ऑन टेरर’ की सराहना और समर्थन किया।
जब 2004 में यूके सरकार द्वारा नियुक्त बटलर कमिटी की रिपोर्ट का प्रकाशन हुआ तो दुनिया के सामने यह तथ्य खुला कि अमेरिकी राष्ट्रपति बुश ने जिस डर के सहारे इराक के खिलाफ युद्ध में यूके, ऑस्ट्रेलिया औऱ पोलैंड को अपने साथ किया था, वह एक बड़ा झूठ था, जिसे बाद में ‘बुश्स बिग लाई’ के नाम से जाना गया।
सूचना क्रांति के दौर का भारतीय राजनीति का इतिहास भी कुछ कम दिलचस्प नहीं था। मनमोहनसिंह के नेतृत्व वाली यूपीए की सरकार में अन्ना हजारे ने लोकपाल विधेयक की माँग करते हुए आंदोलन की शुरुआत की थी। बाद में कांग्रेस सरकार के खिलाफ तमाम भ्रष्टाचार के मामले सामने आए।
उनमें सबसे बड़ा मामला तत्कालीन सीएजी विनोद राय के आरोपों से सामने आया टू जी स्पैक्ट्रम घोटाला। विनोद राय ने उस वक्त 1.75 लाख करोड़ के स्कैम का आरोप लगाया था। एकाएक देश में कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनने लगा था।
उस दौर में देश की सबसे बड़ा विपक्षी दल सिविल सोसायटी की आड़ में अपनी सियासत चमका रहा था। उसके बाद एक-एक करके देश के उद्योगपति नरेंद्र मोदी के समर्थन में बयान देने लगे। औऱ अंततः देश ने 2014 में अपने राजनीतिक इतिहास का सबसे खर्चीला चुनाव देखा। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने अब तक की सबसे बड़ी जीत का स्वाद चखा…। यह सब पोस्ट-ट्रुथ का प्रभाव कहा जा सकता है।
2017 में इस मामले में हुए फैसले में इस कथित स्कैम के सारे आरोपियों को कोर्ट ने बरी कर दिया था। अंततः 1.75 लाख करोड़ रुपए के स्कैम को सिद्ध तो नहीं किया जा सका, लेकिन इस शगूफे ने जनता में ऐसा माहौल बनाया कि कांग्रेस सत्ता से बेदखल हुई औऱ नरेंद्र मोदी को इसका फायदा मिला।आधुनिक दुनिया के इतिहास में बीसवीं सदी का अंतिम दशक बहुत सारे, बड़े और महत्वपूर्ण परिवर्तनों का वाहक सिद्ध हुआ। द्वितिय विश्व युद्ध के बाद सदी के अंतिम दशक में जिस तरह औऱ जिस स्तर पर जीवन के हरेक क्षेत्र में बदलाव हुए वह कई मायनों में अभूतपूर्व थे।
नब्बे के दशक की शुरुआत में जैसे ही सोवियत संघ के कमजोर पड़ने की खबरें आने लगी, दुनिया के दूसरे मोर्चे, पश्चिमी या पहली दुनिया की राजनीतिक औऱ आर्थिक सत्ताएँ एकदम से सक्रिय हो चली थी। ग्लोबल विलेज नामक नया विचार पूरी दुनिया में सफर कर रहा था औऱ हमने उसे वसुधैव कुटुम्बकम से जोड़कर स्वीकार कर लिया था। कहा जा रहा था दुनिया सिकुड़ रही है और सीमाएँ धुँधली होने लगी है।
उन्हीं दिनों पश्चिम एशिया में एक युद्ध हुआ जिसे इतिहास ने खाड़ी युद्ध के नाम से दर्ज किया। साल नब्बे के बीच में एकाएक दुनिया ने सूचनाओं के एक रूप का स्वाद लिया था, वह था खाड़ी युद्ध का लाइव कवरेज। सीएनएन ने खाड़ी युद्ध का सीधा प्रसारण किया था, जिसे भारत में स्टार प्लस ने दिखाया था।
यह पहली घटना थी, जब हमने सूचनाओं से मनोरंजन किया था। इस वॉर इंटरटेनमेंट ने इंसान में हिंसा आधारित मनोरंजन के उस सुप्त बीज को जगा दिया था, जो मानवीय मूल्यों के आग्रहों के बोझ तले कहीं दबे हुए थे।
1996 की उस दोपहर देश के अलग-अलग हिस्सों में इस देश में गणपति की मूर्तियों के दूध पीने की खबरें आईं और लोग मंदियों के आगे दूध लेकर कतार में खड़े मिले। सिर्फ हमारे यहाँ ही नहीं, दुनिया के दूसरे देशों से भी भारतीयों ने गणपति के दूध पीने की तस्दीक की। रेडियो, टीवी और फिर अगले दिन के अखबार इसी खबर किंवा सूचना से भरे पड़े थे।
ये दोनों ही घटना सूचना-क्रांति के दौर से पहले की हैं। इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि इन घटनाओं में भविष्य की दुनिया का अक्स छुपा हुआ था।नब्बे के दशक के शुरुआत में ही देश में केबल टीवी का दौर शुरू हो चुका था और प्राइवेट टीवी चैनलों ने भारत के शहरी घरों में अपने लिए जगह बना ली थी। मनोरंजन के सर्वथा नए दौर की शुरूआत हो चुकी थी। अब तक दूरदर्शन जैसे सरकारी माध्यम से मनोरंजन करते भारतीय मध्यम वर्ग के लिए जैसे मनोरंजन की एक नई दुनिया खुल गई थी। तब भी जनता सूचनाओं के लिए सरकारी इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों पर ही निर्भर थी। सूचनाओं की दिशा में बड़ी क्रांति तब हुई जब इन्हीं प्राइवेट चैनलों ने चौबीस घंटे चलने वाले न्यूज चैनलों की शुरुआत की।
यूँ सभ्यताओं में सूचना का आदान-प्रदान होता ही रहा है, लेकिन तकनीक के विकास ने उसे धीरे-धीरे सर्वसुलभ बना दिया है। इंटरनेट की सुविधा ने दुनिया को सबके लिए खोल दिया है। वह दौर सूचना क्रांति की शुरुआत का दौर था।
उस दौर में चूँकि इंटरनेट महँगा था, इसलिए सूचनाओं का एक्सेस तब साधन संपन्न वर्ग तक ही सीमित था। मोबाइल में इंटरनेट की शुरुआत ने जैसे सूचना के सर्वसुलभ होने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया था, लेकिन जैसे ही फोर-जी नेटवर्क की शुरुआत हुई और इंटरनेट पैक सस्ता हुआ तो सूचनाएँ सर्वसुलभ होती चली गई।
देखते ही देखते पूरी दुनिया में सूचनाओं की बाढ़ आ गई। इंटरनेट की नाव में सवार होकर, यूट्यूब, ब्लॉग्स, वेब मैग्जींस, सोशल मीडिया, यूट्यूब चैनल्स, पोर्टल्स… औऱ इस तरह के कई माध्यम हमारे सामने इंफर्मेशन लेकर आने लगे। 1995 से जबसे भारत के लोगों को इंटरनेट की सुविधा मिली तब समाज बड़े बदलाव से गुजर रहा था।
इंटरनेट से सूचनाओं के संसार को हरेक के लिए खोल दिया था, लेकिन अभी ठीक से इसमें उस किस्म का लोकतंत्रीकरण हुआ ही नहीं था कि स्मार्टफोंस के आविष्कार ने इस इंफर्मेशन की दुनिया में मिसइंफर्मेशन का ऐसा घालमेल किया कि इंफर्मेशन तक पहुँचना भूसे के ढेर में से सुई ढूँढना जैसा हो गया।
इसी सबके बीच तकनीक ने संचार का एक औऱ सुलभ प्लेटफॉर्म उपलब्ध करवाया व्हाट्स एप… इस प्लटेफॉर्म ने रातोंरात लोगों तक सूचनाओं की पहुँच को अपेक्षा से ज्यादा आसान कर दिया। अब एक ही संदेश एक क्लिक पर लाखों लोगों तक पहुँचाया जा सकता था। इसने समाज के सबसे आखिर में खड़े वर्ग तक सूचना पहुँचा दी।
मगर दुनिया को यहीं नहीं ठहरना था। इन्हीं इंफर्मेशन के साथ-साथ मिसइंफर्मेशन का दौर शुरू हुआ। टेक्स्ट के साथ-साथ फोटो और वीडियो औऱ ऑडियो के साथ खिलवाड़, फोटोशॉप, टेलर्ड औऱ टैंपर्ड रूप में होने लगी और इन्हीं का सहारा लेकर सत्ता ने सूचनाओं से खिलवाड़ शुरू कर दिया।
सूचनाओं और मनोरंजन के तरीकों, कंटेंट, प्रभाव, जरूरत, विचार, लक्ष्य औऱ नीयत सबमें बदलाव आया और लगभग इसी दौर में 2018 में तकनीक औऱ बाजार ने मिलकर एकदम सर्वथा प्लेटफॉर्म दिया ओटीटी, ओटीटी याने ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म ने मनोरंजन का तरीका, कंटेंट औऱ स्वाद सब बदलकर रख दिया।
ठीक इसी समय समाज की अलग-अलग तरह की सत्ताओं ने इस माध्यम का महत्व समझा और इंफर्मेशन का इंस्टीट्यूशनालाइजेश करना शुरू कर दिया। धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक, व्यवसायगत, जातिगत, वर्गगत पेजेस, पोर्ट्ल्स, चैनल्स की भरमार हो गई।नई सदी के दूसरे दशक की शुरुआत तक सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफॉर्म, ब्लॉग्स, वेब स्पेस, पेजेस, पोर्ट्ल्स की बाढ़ आ गई, जिससे मिलने वाली सूचनाओं ने सूचनाओं का अर्थ ही खत्म कर दिया।
सूचना-क्रांति के तेजी गति से होते विकास ने उसे अनचाहे ही पोस्ट-ट्रुथ से जोड़ दिया है। तकनीक का सत्ता जिस तरह से इस्तेमाल करती है उसके उदाहरण इतिहास में पहले भी मिलते रहे हैं, लेकिन सूचना-क्रांति ने दुनिया को बहुत गहरे में प्रतिकूल तरीके से प्रभावित किया है।
देखते-देखते राजनीतिक दलों ने अपने-अपने आईटी सेल बना लिए हैं। वहाँ तकनीकी ज्ञान से लैस युवाओं की फौज लगातार देश दुनिया में मिसइंफर्मेशन फैला रही है। पूँजीवाद किस तरह से उन्हीं लोगों का दोहन करता है, जिसका वह शोषण करता है यह पहले से ही विदित है, लेकिन सूचना क्रांति ने मध्यमवर्ग से उनकी एकमात्र विरासत उनके जीवन मूल्य भी छीन लिए हैं।
इंफर्मेशन और मिसइंफर्मेशन की हद टूटी
यह सही है कि सूचना क्रांति ने अब देश-दुनिया के आम आदमी तक सूचनाओं की पहुँच बढ़ा दी है अब दुनिया की सारी जानकारी हरेक को आसानी से उपलब्ध हो सकती है। इन दिनों हम रोजमर्रा में इसका असर देख सकते हैं, ऑटो वाला, सब्जी वाला या घर में काम करने वाली मैड तक हमसे राजनीति, अर्थनीति, फिल्म, फैशन, हेल्थ आदि-आदि विषयों पर बात करते मिल जाएँगे। यह अलग बात है कि उनके पास कितनी सूचनाएँ औऱ कितनी सूचनाओं के भ्रम हैं, लेकिन एक स्तर पर उनके जीवन के दायरे में वे प्रश्न भी आने लगे हैं, जो उन्हें सीधे तौर पर प्रभावित नहीं करते हैं।पोस्ट-ट्रुथ-एरा में असल में सूचनाओं के माध्यम से सत्ता जिस तरह के नैरेटिव घड़ती है औऱ उसके आधार पर अपने स्वार्थ सिद्ध करती है इसने सूचना क्रांति को एक तरह से मानवता के लिए अभिशाप बना दिया है। दरअसल लोकप्रिय झूठ को तथ्य की तरह प्रस्तुत करने की कवायद ही पोस्ट-ट्रुथ है।
जब सूचना के साधन सुलभ हुए तो सूचनाएँ भी सुलभ हो गई। इसी का लाभ सत्ताओं ने उठाना शुरू कर दिया। अपने लाभ के लिए गलत सूचनाओं को प्रसारित करना शुरू कर दिया। यूँ पहले भी ऐसा होता रहा है, लेकिन जिस वक्त सूचना के साधन उतने सुलभ नहीं थे, उस वक्त इस पूरी प्रक्रिया में बहुत वक्त लगता था और अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाते थे।सूचना क्रांति ने इंफर्मेशन औऱ मिसइंफर्मेशन के बीच के भेद को मिटा दिया है। पब्लिक डोमेन में इतनी गलत सूचनाएँ हैं कि उसमें से सही सूचना ढूँढ पाना बहुत मुश्किल होता जा रहा है। दिक्कत यह भी है कि इस दौर में सूचना का सबसे तेज औऱ सुलभ स्रोत इंटरनेट भी मिसइंफर्मेशन का शिकार हो गया है। ऐसे में इंफर्मेशन टेक्नोलॉजी से लाभ से ज्यादा नुकसान हो रहा है।
सूचनाओं का अतिरेक
The information revolution now gives us access to too much information. Our problems are that we’re just overwhelmed, so in some sense we just basically don’t even know where to turn.अमरीकन लेखक औऱ फिल्म प्रोड्यूसर Jonathan Taplin का यह कथन सूचना क्रांति की एक अलग ही कहानी कह रहा है। सूचनाओं के सही औऱ गलत होने की तस्दीक करने में एक बड़ी अड़चन सूचनाओं के अतिरेक से भी आती है। इतनी बड़ी संख्या में सूचनाएँ आती हैं कि किसी भी सूचना के सही और गलत होने के संदेह को दूर करना अपने आप में रिसर्च हुआ करता है।
दूसरी सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि सूचना के इतने माध्यमों से जिस तेजी से सूचनाएँ आती है वह असल में सही-गलत को समझने में गफलत पैदा करती है। इसका फायदा अक्सर गलत सूचनाएँ प्रसारित करने वालों को मिलता है। एकसाथ इतनी सारी सूचनाएँ हमारे सामने होती है कि हमारा दिमाग इन्हें ठीक से प्रोसेस ही नहीं कर पाता है। इसका नुकसान यह होता है कि किसी भी तरह की कोई राय नहीं बन पाती है और बदलाव के लिए कोई रास्ता नहीं खुलता है। इससे एक औऱ दिक्कत आ खड़ी होती है कि इस सबमें तथ्य तक पहुँचने में बड़ी अड़चन पेश आती है।
यहाँ सबसे ज्यादा डरावनी बात यह कि समाज की दूसरी सत्ताएँ जिस तरह से सूचना-तकनीक का षडयंत्र करने में इस्तेमाल कर रही है, वह पूरी दुनिया की शांति के लिए खतरा है।
सूचना तंत्र पर पूँजी का नियंत्रण
अमरीकन कॉमेडियन, एक्टर, प्रोड्यूसर चार्ल्स हार्डविक कहते हैं We’re not in an information age anymore. We’re in the information management age.बहुत साल हमने इस इंप्रेशन में गुजार दिए कि सूचना क्रांति से जागरूकता बढ़ेगी, राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक चेतना का विकास होगा। लोगों की व्यवस्था में सहभागिता बढ़ेगी। देखते-देखते पूरे के पूरे सूचना तंत्र पर पूँजीपतियों का नियंत्रण हो गया। लोकतंत्र की हकीकत इससे पहले तो फिर भी दबी-छुपी थी, लेकिन इससे एकदम से खुलकर सामने आ गई।
राजनीतिक सत्ता से लाभ लेते पूँजीपति सत्ता को सूट करने वाली इंफर्मेशन या मिसइंफर्मेशन का प्रसारण करते हैं। हमारा देश पूँजीवाद की इस प्रवृत्ति की सबसे शानदार प्रयोगशाला बना हुआ है। मिसइंफर्मेशन और इंफर्मेशन मैनेजमेंट से जनता के रूझानों को प्रभावित किया जाता है।
टीवी चैनल्स, अखबार, पोर्टल्स, पेजेस, सोशल मीडिया हर कहीं सत्ता के समर्थन में नैरेटिव घड़े जाते हैं और उन्हें प्रसारित कर दिया जाता है। देखते-देखते पूरा जनमत सत्ता के साथ जाकर खड़ा हो जाता है। चाहे हम सीएए-एनआरसी मसले को देखें या किसान आंदोलन को। मीडिया उन्हें आतंकवादी, खालिस्तानी कहकर प्रचारित करता रहा और इसे ही सच की तरह जनता स्वीकारती रही।
इस पूरे षडयंत्र को बहुत गौर और सावधानी से देखने की जरूरत है। एकाएक मायथोलॉजिकल, ऐतिहासिक और देशभक्ति की फिल्में, बेवसीरिज औऱ सीरियल्स की बाढ़ आने लगी है। मनोरंजन के माध्यम से गलत ऐतिहासिक तथ्य औऱ पूर्वाग्रह से ग्रस्त पौराणिक संदर्भों के माध्यम से सत्ता बहुसंख्यकों का मूल मुद्दों से ध्यान बँटाकर विभाजन की लकीर बनाने और बनी हुई लकीर को औऱ गहरा करने के अभियान में लगी हुई है।जब इंटरनेट का दौर शुरू हुआ था तो लगा था कि हम एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ हर किसी को सूचनाएँ उपलब्ध होंगी। एक तरह से सूचनाओं का लोकतंत्रीकरण होगा। सूचनाओं का लोकतंत्रीकरण हुआ तो है, लेकिन इसके माध्यम से सूचनाओं का प्रबंधन किया जा रहा है और लोकतंत्र के छद्म को रचा जा रहा है।
अमूमन आमजन को वही सूचनाएँ उपलब्ध हो रही हैं, जिनसे सत्ता को किसी भी तरह से लाभ हासिल हो रहा हो। यहाँ सत्ता से आशय सिर्फ राजनीतिक सत्ता से नहीं है, आर्थिक, धार्मिक औऱ सांस्कृतिक संस्थाओं से भी है।
एक लोकप्रिय झूठ घड़ा जा रहा है औऱ तमाम सूचना माध्यमों से इसे प्रचारित औऱ प्रसारित किया जा रहा है। यहाँ इस बात पर गौर करना बहुत जरूरी है कि सूचना उद्योग पर पूँजीपतियों का कब्जा है और इस तरह से पूँजीपति दोहरा खेल खेल रहे हैं। सत्ता के समर्थन के झूठ को सच का जामा पहनाकर उसे प्रचारित कर रहे हैं औऱ इसके एवज में सत्ता से लाभ पा रहे हैं।
सूचना क्रांति से सामाजिक बदलाव की जो उम्मीद हमने की थी वह एक तरह से ध्वस्त हो चली है। सूचना के स्रोत सत्ताओं के हाथ में चले गए हैं और सत्ताएँ मिसइंफर्मेशन या इंफर्मेशन मैनेजमेंट का सहारा लेकर हमारी सामूहिक चेतना को मैनिपुलेट कर रही है। हमारे देखते-देखते सूचना क्रांति सामाजिक मूल्यों के विलुप्त होने की कहानी बनती जा रही है और हमारा समाज तेजी से जॉम्बी सोसायटी बनने की ओर बढ़ रहा है, जिसे कमजोरों को परेशान करने, डराने औऱ सताने में मजा आने लगता है।
यह प्रवृति एक समाज के लिए बहुत हानिकारक है।

