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आएगा वक्त आमआदमी का भी

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शशिकांत गुप्ते

आमआदमी क्या करें? आम आदमी मतलब देश का वह औसत आदमी जो समाज के अंतिम सोपान पर खड़ा है।
यह स्पष्ट करना निहायत ही जरूरी है,कारण इनदिनों आमआदमी से लोग बहुत अलग ही समझने लगतें हैं।
बहरहाल दिल्ली को हिंदुस्थान का दिल कहा जाता है। दिल मानव के शरीर का बहुत महत्वपूर्ण अवयव है।
दिल में स्पंदन होता है। यही स्पंदन मानव के जीवित होने का प्रमाण है। इसी स्पंदन के कारण मानव में संवेदनाएं होती है।
संवेदनहीन मानव का दिल, पत्थरदिल ही तो कहलाएगा।
पत्थर दिल पर शाब्दिक गुस्सा करते हुए सन 1962 में प्रदर्शित फ़िल्म आशिक़ के गीत की कुछ पंक्तियाँ उक्त संदर्भ में प्रासंगिक है। इस गीत को लिखा है गीतकार शैलेंद्रजी ने।
इस गीत में प्रेमी प्रेमिका का दर्द छिपा है।
पत्थर दिल है ये जगवाले,जाने न कोई मेरे दिल की जलन
जबसे है जनमी प्यार की दुनिया,तुझको है मेरी मुझे तेरी लगन

पत्थर दिल प्रेम की भाषा समझते ही नहीं है?
देश की राजधानी दिल्ली, देश का दिल कहलाती हैं। लेकिन इसी दिल के अंदर जो बेदिली का खेल हो रहा है और हुआ है। उस पर देश का औसत व्यक्ति क्या सोचता है?
इस सवाल का जवाब इस फ़िल्म के गीत की इन पंक्तियों में है।
यह गीत सन 1962 में प्रदर्शित फ़िल्म अनपढ़ का है। इसे लिखा है, गीतकार राजा मेहंदी अली खां
गीत की ये पंक्तियां प्रस्तुत है।
सिकंदर ने पोरस से
की थी लड़ाई जो की थी लड़ाई
तो मैं क्या करूँ
तो कौरव ने पांडव से
की हाथापाई जो की हाथापाई
तो मैं क्या करूँ

गीत में कौरव और पांडव के युद्ध का प्रतीक के रूप में प्रयोग किया है।
आमआदमी के जहन में यह सवाल है,कलयुग में कौरव और पांडवों को कैसे पहचानेंगे?
स्पष्ट जवाब है पहचानना संभव ही नहीं है।
सिंकदर के लिए किसी ने एक सूक्ति कही है।
बस दिल जीतने का मक़सद रखो
दुनिया जीत कर भी सिंकदर खाली हाथ गया था
अंत में निम्न सुविचार प्रस्तुत है।
वक्त गूंगा नहीं बस मौन है
वक्त आने पर बता देगा किसका कौन है

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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