तेजपाल सिंह ‘तेज’
भूमिका : एक असहज तस्वीर और उससे उठते सवाल
हाल के दिनों में भारतीय राजनीति में एक ऐसी तस्वीर सामने आई जिसने सामान्य राजनीतिक शिष्टाचार से कहीं आगे जाकर राष्ट्रीय चेतना को विचलित किया। सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)** के केंद्रीय कार्यालय में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) के प्रतिनिधियों की उपस्थिति, वह भी ऐसे समय में जब चीन भारत की संप्रभुता को खुलेआम चुनौती दे रहा है, कई गहरे प्रश्न खड़े करती है। यह मुलाकात केवल एक औपचारिक संवाद नहीं प्रतीत होती, बल्कि इसके पीछे दीर्घकालिक राजनीतिक मंशा के संकेत दिखाई देते हैं।
1. समय का चयन : संयोग या सुविचारित रणनीति?
जिस समय भाजपा और सीपीसी के प्रतिनिधि सौहार्दपूर्ण वातावरण में बैठकर बातचीत कर रहे थे, ठीक उससे पहले चीन के विदेश मंत्रालय ने शक्सगाम घाटी को चीन का हिस्सा घोषित किया। यह वही क्षेत्र है जिसे भारत अपने अभिन्न भूभाग के रूप में मानता है। प्रश्न यह नहीं है कि बैठक हुई, बल्कि यह है कि ऐसे संवेदनशील समय में यह बैठक क्यों हुई? क्या यह मात्र संयोग था, या फिर राजनीतिक प्राथमिकताओं का ऐसा चयन जिसमें राष्ट्रीय हित को गौण रखा गया?
2. शक्सगाम घाटी : दावा, चुप्पी और सीमित विरोध:
शक्सगाम घाटी, जिसे ट्रांस-काराकोरम क्षेत्र भी कहा जाता है, 1963 के चीन–पाकिस्तान समझौते के आधार पर चीन के दावे का विषय रही है। भारत ने औपचारिक रूप से इस दावे को खारिज किया है, किंतु व्यवहारिक स्तर पर विरोध बयानों और आपत्तियों तक सीमित दिखाई देता है। जब सीपीसी के प्रतिनिधि भाजपा कार्यालय में मौजूद थे, तब यह अपेक्षा स्वाभाविक थी कि सीमा विवाद, वास्तविक नियंत्रण रेखा और शक्सगाम जैसे मुद्दों पर स्पष्ट प्रश्न उठाए जाएंगे। परंतु उपलब्ध सूचनाओं से ऐसा प्रतीत नहीं होता कि यह मुद्दे बातचीत के एजेंडे में थे।
3. भाजपा और चीन : संबंधों का लंबा इतिहास:
यह कोई नई बात नहीं है कि भाजपा और सीपीसी के बीच संपर्क हालिया वर्षों की देन हो। पिछले दो–ढाई दशकों में भाजपा के कई प्रतिनिधिमंडल चीन की यात्राएँ कर चुके हैं—चाहे पार्टी विपक्ष में रही हो या सत्ता में। विशेष रूप से नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए चीन के प्रति विशेष रुचि की चर्चा बार-बार सामने आती रही है। यह निरंतरता संकेत देती है कि चीन के साथ संबंध केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि वैचारिक अध्ययन और राजनीतिक सीख से भी जुड़े रहे हैं।
4. गलवान के बाद भी “कोई घुसपैठ नहीं” : विरोधाभास की राजनीति:
2020 की गलवान घाटी की हिंसक झड़प, जिसमें भारतीय सैनिक शहीद हुए, भारत–चीन संबंधों का निर्णायक क्षण थी। इसके बावजूद जब सर्वोच्च स्तर से यह कहा गया कि “न कोई घुसा है, न घुसा हुआ है”, तो यह बयान पूर्व में संसद में दिए गए बयानों और ज़मीनी हकीकत से टकराता दिखा।
यह विरोधाभास इस प्रश्न को जन्म देता है कि क्या चीन के प्रति राजनीतिक दृष्टिकोण, राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्नों पर भी प्रभाव डाल रहा है?
5. एक-दलीय शासन का आकर्षण : असली मंतव्य की परछाई:
इस पूरी चर्चा का सबसे महत्वपूर्ण, किंतु सबसे दबा हुआ पक्ष यही है—चीन के एक-दलीय शासन मॉडल के प्रति आकर्षण। 1949 से चीन में एक ही दल की निरंतर सत्ता, बिना किसी प्रभावी विपक्ष के, बिना सत्ता परिवर्तन की अनिश्चितता के—यह मॉडल उन राजनीतिक शक्तियों को आकर्षित करता है जो लोकतांत्रिक असहमति, संस्थागत आलोचना और चुनावी अनिश्चितता को बाधा मानती हैं।
भाजपा और उसके वैचारिक समर्थकों द्वारा “एक देश, एक विचार, एक नेतृत्व” की अवधारणा बार-बार दोहराई जाती है। यह अवधारणा लोकतंत्र के बहुलवादी स्वरूप से हटकर, केंद्रीकृत और नियंत्रित सत्ता की ओर संकेत करती है—ठीक वैसी ही जैसी चीन में देखने को मिलती है।
6. लोकतंत्र बनाम स्थायित्व : विकास का चीनी तर्क:
यह तर्क अक्सर दिया जाता है कि चीन ने तीव्र आर्थिक विकास किया है, और इसके पीछे उसका सख्त, एक-दलीय शासन मॉडल है। यही तर्क भारत में भी परोक्ष रूप से स्थापित करने की कोशिश दिखाई देती है—कि लोकतांत्रिक बहसें विकास में बाधक हैं। परंतु यह भूल जाना खतरनाक होगा कि चीन का विकास नागरिक स्वतंत्रताओं, अभिव्यक्ति की आज़ादी और राजनीतिक विकल्पों की कीमत पर हुआ है। भारत का लोकतंत्र, अपनी सभी कमजोरियों के बावजूद, इन्हीं स्वतंत्रताओं पर आधारित है।
निष्कर्ष : धीमी विदाई का संकेत
जिसमें लोकतंत्र को प्रबंधित असहमति और सत्ता को स्थायी व्यवस्था में बदलने की चाह छिपी है।यही कारण है कि यह प्रश्न बार-बार उठता है–क्या यह केवल विदेश नीति है, या फिर भारत के लोकतांत्रिक भविष्य की दिशा पर एक प्रयोग? यह निबंध किसी निष्कर्ष को थोपने का प्रयास नहीं करता, बल्कि उन संकेतों को सामने रखता है जिन्हें अनदेखा करना भविष्य में भारी पड़ सकता है। लोकतंत्र की विदाई अचानक नहीं होती—वह अक्सर धीमी, शांत और तस्वीरों के बीच मुस्कुराती हुई होती है।
(https://youtu.be/NEkB9Qr1tlM?si=QjAGezIv9l0Wxrco)

