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सच्चाई सच्चाई ही है

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शशिकांत गुप्ते

सीतारामजी आज प्रख्यात क्रांतिकारी कवि स्व.रामधारी सिंह “दिनकर” जी की वीररस की कविता समर शेष की निम्न पंक्तियां पढ़ रहें हैं।
समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं
गाँधी का पी रुधिर जवाहर पर फुंकार रहे हैं
समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है
वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है
समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल
विचरें अभय देश में गाँधी और जवाहर लाल

मैने सीतारामजी से पूछा आज ही इन पंक्तियों का स्मरण करने का कोई विशेष कारण है?
सीतारामजी ने कहा कुछ विशेष नहीं,इन दिनों कुछ लोग ने अपने पुरखों के बलिदान को याद करना छोड़ कर उनकी अवहेलना करने लगे हैं।
इतिहास के साथ उपहास किया जा रहा है। जिनका इतिहास में कोई योगदान नहीं है,वे दूसरों की लकीर पोंछ कर स्वय की लकीर बड़ी करने की साजिश रच रहें हैं।
कोई लाख चतुराई करे,असलियत को मिटाना,छिपना असंभव है।
इसीलिए मैं स्वयं साहित्य का विद्यार्थी होने के नाते,साहित्य का इतिहास खंगाल रहा हू।
आज मुझे राष्ट्रीय कवि बाबा नागार्जुन की कविता सच न बोलो की पंक्तियों का भी स्मरण हुआ है।
छुट्टा घूमें डाकू गुण्डे, छुट्टा घूमें हत्यारे,
देखो, हण्टर भांज रहे हैं जस के तस ज़ालिम सारे !
जो कोई इनके खिलाफ़ अंगुली उठाएगा बोलेगा,
काल कोठरी में ही जाकर फिर वह सत्तू घोलेगा !
एक प्राकृतिक सत्य को स्वीकारना ही पड़ेगा,भारत की माटी में रचे बसे लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता को कोई भी मिटा नहीं सकता हैं।
सम्पूर्ण विश्व में सिर्फ भारत में ही नदियों का कुदरती ही संगम है।
इसीलिए सीतारामजी ने अंत में सन 1958 में प्रदर्शित फिल्म फिर सुबह होगी के गीत की कुछ पंक्तियां गा कर सुनाई। गीतकार साहिर लुधियानवी हैं।
वो सुबह कभी तो आयेगी
इंसानों की इज्ज़त जब झूठे सिक्कों में ना तोली जायेगी
दौलत के लिए अब औरत की इस्मत को न बेचा जाएगा
अपनी काली करतूतों पर,जब ये दुनिया शरमाये ही
जरूर सुबह होगी।

साहित्यकारों वैचारिक क्रांति के लिए सिर्फ एक दीपक जलाना है।
शायर एहतिशाम अख्तर यह शेर मौजू है।
शहर के अंधेरे को इक चराग़ काफ़ी है
सौ चराग़ जलते हैं इक चराग़ जलने से
ज्योत से ज्योत जलाते चलो

इतना सब पढ़ कर सुनाने के बाद सीतारामजी ने स्पष्टीकरण दिया,उपर्युक्त पंक्तियां राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित कवियों ने लिखी है,और गीत की पंक्तियां गीतकार ने लिखी है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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