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जारी है जमीन की लूट के खिलाफ जंग

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रजनीश भारती

मौजूदा सरकार एक तरफ सारे सरकारी संस्थानों को बेचती जा रही है। दूसरी तरफ किसानों से कल-कारखानों, हवाई पट्टियों, औद्योगिक गलियारों, सड़कों… आदि के विकास के नाम पर जमीन छीन रही है। जमीन बचाने वाले आन्दोलनकारियों को विकास विरोधी बता रही है। इस लिए हम पहले ही यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हम विकास चाहते हैं, विकास विरोधी नहीं हैं। मगर किसानों के ऊपर बुलडोजर चलवाकर हम मुठ्ठी भर पूंजीपतियों का विकास नहीं चाहते।

दूसरी बात यह है कि लाखों कारखाने बन्द पड़े हैं। अगर कारखाने चलाना है तो सरकार उन बन्द पड़े लाखों कारखानों को ही चला कर दिखाए। सारी सड़कें बदहाल हैं, उनकी मरम्मत कराएँ, इसके बाद कारखानों आदि के लिए जमीन कम पड़े तब किसानों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उचित मुआवजा, मकान, जमीन, सरकारी नौकरी देकर उनकी आम रजामंदी से ही उनसे जमीन ली जानी चाहिए। अगर किसान असहमत हैं तो उनकी जमीन छीनना उनके खिलाफ युद्ध ही माना जायेगा। सरकार किसानों के खिलाफ युद्ध लड़ रही है।

दरअसल मौजूदा सरकार विदेशी साम्राज्यवादियों, देशी दलाल नौकरशाह बड़े पूंजीपतियों और सामंती जमींदारों को फायदा पहुँचाने के लिए किसानों के खिलाफ अघोषित युद्ध लड़ रही है। यह सरकार विकास के नाम पर पूरे देश में जगह जगह किसानों से जमीन छीन कर देशी, विदेशी पूँजीपतियों को कौड़ियों के भाव देती जा रही है। 

आजमगढ़ मंदूरी एअरपोर्ट के विस्तार के नाम पर आठ गांवों के किसानों की 670एकड़ उपजाऊ जमीन छीन रही है। इसके खिलाफ विगत 6 महीने से खिरिया बाग में ग्रामीण धरने पर बैठे हैं। जब धरना लगभग चार महीने चल चुका था तब दिनांक 14 फरवरी 2023 को धरना स्थल पर दिये गये मौखिक बयान में आश्वासन  देते हुए एस.डी.एम. सगड़ी श्री राजीव रतन सिंह के द्वारा कहा गया था कि अब आजमगढ़ एयरपोर्ट विस्तारीकरण की परियोजना को निरस्त कर दिया गया है,अब विस्तारीकरण नहीं होगा। मगर शासन की तरफ से कोई लिखित आश्वासन नहीं दिया जा रहा है। लिखित आश्वासन दिए जाने तक ग्रामीण धरने पर बैठे हैं। विगत 6 महीने से चल रहे धरने के दौरान जमीन मकान जाने के सदमे से 2 दर्जन से अधिक लोगों की जान चली गई है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ग्रामीणों को धरने पर बैठने और मरने के लिए क्यों मजबूर किया जा रहा है?

आजमगढ़ में खिरिया बाग का मामला अभी चल ही रहा था कि इसी दौरान आजमगढ़ फूलपुर तहसील पवई ब्लाक के अण्डिका, खुरचन्दा, बखरिया, छजोपटी आदि गांवों की 2000 एकड़ से अधिक जमीन छीनने के लिए प्रशासन के नुमाइंदे पहुँच गये। जमीन का सर्वे किया और किसानों को अगली फसल न बोने की हिदायत दिया। किसान अपनी जमीन देने को तैयार नहीं हुए और अम्बिका गाँव में धरने पर बैठ गये। एक पखवारे से वहाँ भी धरना जारी है।

 मामला सिर्फ आजमगढ़ का ही नहीं है। सरकार पूरे देश में जमीन छीनने की कार्यवाही कर रही है। लखीमपुर, बुंदेलखंड, बिहार के कैमूर व रोहतास जिले और देश के अन्य राज्यों में सरकार का आतंक जनता पर बढ़ता जा रहा है। कहीं बाघ अभ्यारण्य कहीं पेड़ लगाने के नाम पर तो कहीं खनन के लिए गांव के गांव उजाड़े जा रहे हैं।

चन्दौली जिले की चकिया तहसील के गांवों पीतपुर, केवलखाण कोठी, रामपुर, मुसाहीपुर, बभौरा, बहेलियापुर के गरीब किसानों की लगभग 80 हेक्टेयर से अधिक उपजाऊ जमीन को वन विभाग ने छीन लिया। किसानों ने कई पीढ़ियों से उस जमीन को जोतने व खेती करने का वन विभाग से दावा किया, कुछ ने अपने पट्टे के कागजात भी दिखाए। लेकिन सत्ता के इसारे पर वन विभाग व सरकारी नुमाइंदों ने उनकी कोई सुनवाई नहीं की। बगैर किसी नोटिस के जब वन विभाग के लोग उक्त गावों के किसानों की खड़ी फसल को पुलिस की बन्दूक के बल पर नष्ट कर रहे थे तो जनवादी किसान सभा के कार्यकर्ता साथी वसीम अहमद उनके इस अत्याचार को अपनी मोबाइल कैमरे में कैद कर रहे थे, इस पर पुलिस वालों ने उन्हें अन्दर कर देने की धमकी दी। 

उत्तरप्रदेश के लखीमपुर में पीढ़ियों से रहते व खेती करते आ रहे 54 गांवों को अवैध बताकर उनको गांव व खेती की जमीन से बेदखल करने का आदेश जारी हो चुका है।

दरअसल यह विकास नहीं है, यह किसानों से छीनकर सारी जमीन चंद पूँजीपतियों के हाथों कौड़ियों के भाव बेचने की जनविरोधी कार्यवाही है। इससे किसानों की क्रयशक्ति घटेगी वे बर्बाद हो जाएंगे, किसानों की क्रयशक्ति घटेगी तो बाजार में छोटे दुकानदार बर्बाद हो जाएंगे, बाजार में खरीदने बेचने वालों की संख्या घटेगी तो कारखानों का माल नहीं बिकेगा, तब बचे-खुचे कारखाने बन्द हो जायेंगे। कारखाने बन्द होने से मजदूर बर्बाद हों जायेंगे। इस तरह किसान बर्बाद होगा तो छोटे दुकानदार, मजदूर, बुनकर, दस्तकार, सभी बर्बाद होंगे। इससे बेरोजगारी बढ़ेगी जिससे छात्र, नौजवान बर्बाद होंगे। इस तरह पूरा देश बर्बाद होगा। मौजूदा सरकार इसी तरह पूरा देश बर्बाद कर रही है।

पूरे देश को बर्बाद करके सरकार चाहती क्या है? दरअसल किसानों की बर्बादी से शासक वर्ग को दोहरा फायदा हो रहा है। एक तो जल, जंगल, जमीन, पहाड़ों से आदिवासी एवं गैर आदिवासी किसानों को बेदखल करने से देशी-विदेशी बड़े पूँजीपतियों को इन क्षेत्रों से प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर दोहन करने का मौका मिल रहा है। दूसरे उजड़े हुए किसान भागकर शहरों में जा रहे हैं और वहाँ वे पूँजीपतियों के लिए सस्ते मजदूर बन रहे हैं। 

यह सरकार चंद पूंजीपतियों को मुनाफा पहुँचाने के लिए भयानक बेरोजगारी, कमरतोड़ मँहगाई, सूदखोरी, जमाखोरी, मिलावटखोरी, नशाखोरी का जाल बिछाकर किसानों मजदूरों का खून चूसकर उन्हें सस्ते मजदूर बनने के लिए मजबूर कर रही है।

एक तरफ जातिवाद और साम्प्रदायिकता फैला कर जनता को जनता से लड़ाया जा रहा है, दूसरी तरफ एक एक कर जनता का सारा अधिकार छीना जा रहा है। “फूट डालो, लूटो और शासन करो” की नीति पर चलते हुए मौजूदा शासकवर्ग जनता को लूट रहा है और जाति, धर्म के नाम पर जनता के बड़े हिस्से का रहनुमा भी बनने का ढोंग कर रहा है। सरकार शोषक वर्ग की मैनेजमेंट कमेटी की तरह काम कर रही है।

ऐसे में सरकार पर पाँच सवाल उठते हैं-

 पहला यह कि जब यह सरकार सड़क, रेल, हवाई अड्डा, स्कूल, अस्पताल, बैंक, कल-कारखाने, खान-खदान… किसी सरकारी संस्थान या उद्योग को चला नहीं पा रही है, सब कुछ बेचती जा रही है तो विकास के नाम पर किसानों की जमीन क्यों छीन रही है?

दूसरा सवाल यह है कि जब चलाने के लिए लाखों  बन्द पड़े कारखाने मौजूद हैं तो नये-नये कारखानों के नाम पर किसानों से जमीन क्यों छीनी जा रही है? सरकार के पास कारखाना चलाने का दम है तो पुराने बन्द पड़े कारखानों को क्यों नहीं चलाती? 

तीसरा सवाल यह है कि अगर विदेशी पूँजी के बल पर ही विकास करना था तो अंग्रेजों को भगाया क्यों?

 चौथा सवाल यह है कि क्या किसानों के अंदर सेना, पुलिस की दहशत पैदा करके जमीन छीनना यह दर्शाता है कि सेना, पुलिस जनता के लिए नहीं बल्कि जमीन छीनने वाली सरकार के साथ है? क्या यह देशभक्त नहीं बल्कि भाड़े की सेना, पुलिस है। जो तनख्वाह के बदले विदेशी साम्राज्यवादियों, देश के बड़े दलाल नौकरशाह पूँजीपतियों और सामन्तों के हितों के लिए काम कर रही है?

 पाँचवाँ सवाल यह है कि क्या अदालतें भी विदेशी साम्राज्यवादियों, देश के बड़े दलाल नौकरशाह पूँजीपतियों और सामन्तों के हित में काम कर रही हैं जो आन्दोलनकारियों पर फर्जी मुकदमें थोपकर उन्हें परेशान कर रही हैं?

 सच्चाई तो यह है कि समाजवाद और पूँजीवाद के बीच जीवन-मरण का युद्ध चल रहा है। मजदूर और किसान ही समाजवाद की मुख्यशक्तियाँ हैं। पूँजीवादी शोषक वर्ग इन्हें लूटकर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। चीन के समाजवादी कल – कारखानों के मुकाबले भारत के अर्धसामन्ती-अर्धऔपनिविशिक कल-कारखाने टिक नहीं पा रहे हैं। वे बाजार में अपना माल नहीं बेच पा रहे हैं। माल नहीं बिक पाने से भारत के कारखाने बन्द होते जा रहे हैं। भारत ही नहीं दुनिया भर के पूँजीपति अपना कारखाना बन्द करके चीन का माल सस्ते में खरीद कर मँहगे में बेच रहे हैं। अब नये-नये कारखाने खोलने के नाम पर किसानों से जमीन छीनना और उससे मुनाफा कमाना इनका धंधा बन गया है।

 जमीन के लिए जंग जारी है। सरकारी दमन तंत्र की क्रूरता के बावजूद किसान लड़ रहे हैं। हम सभी मेहनतकश वर्गों से अपील करते हैं कि इस देशविरोधी, जनविरोधी, मानवता विरोधी खूँखवार धंधे के विरुद्ध किसानों के साथ लामबंद हों। वरना आपका भी नंबर आएगा तब आप के लिए आवाज उठाने वाला कोई नहीं होगा।

*रजनीश भारती*

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