,मुनेश त्यागी
पिछले दिनों भारत के प्रधानमंत्री ने कहा है कि भारत की जांच एजेंसियों को भ्रष्टाचारियों के खिलाफ बेझिझक होकर कार्यवाही करनी चाहिए और सरकार में भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति है। उन्होंने यह भी कहा है कि भ्रष्टाचारी चाहे जितना भी शक्तिशाली हो जांच एजेंसियों को उसके खिलाफ बिना झिझक कार्यवाही करनी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा है कि किसी भी भ्रष्टाचारी को छोड़ा नहीं जाना चाहिए। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा है कि सीबीआई सच्चाई और न्याय का एक ब्रांड है और भ्रष्टाचार अपराधियों को जन्म देता है, वह न्याय और जनतंत्र के मार्ग में सबसे बड़ा रोड़ा है।
आज हम देख रहे हैं की आजादी के 75 साल बाद भी हमारे देश में 80 करोड़ से ज्यादा लोग गरीब हैं, 85% मजदूरों को न्यूनतम वेतन नहीं मिलता जबकि इसको रोकने के लिए अनेक कानून है। हम यहीं पर यह भी देख रहे हैं कि अधिकांश सरकारी विभाग तहसील, पुलिस, अस्पताल, नगर पालिका और कई न्यायालय भी भ्रष्टाचार की विभीषिका से पीड़ित हैं।
प्रधानमंत्री के इस वक्तव्य पर हंसी आती है और इसमें पूरा दिखावटीपन मौजूद है। पूरी दुनिया समेत हमारे देश की पूंजीवादी व्यवस्था भ्रष्टाचार के दलदल में फंसी हुई है। पूंजीवादी व्यवस्था मजदूरों को उनके श्रम का उचित दाम नहीं देती और उनके कमाए हुए धन का बहुत बड़ा हिस्सा हड़प कर जाती है, जबकि मजदूरों की रक्षा के लिए अनेकों अनेक श्रम कानून मौजूद हैं, मगर श्रमिकों को कारखानेदारों द्वारा नियुक्ति पत्र नहीं दिया जाते, तनख्वाह पर्ची नहीं दी जातीं, न्यूनतम वेतन का भुगतान नहीं किया जाता, उनका प्रोविडेंट फंड नहीं काटा जाता, बहुत सारे मजदूरों को ग्रेच्युटी नहीं दी जाती, इसके लिए उन्हें न चाहते हुए भी अदालतों की शरण जाने को मजबूर होना पड़ता है। कानून का पालन करने की मांग करने वाले अधिकांश मजदूरों को, कानूनों का पालन किए बिना ही नौकरी से निकाल दिया जाता है। यही पूंजीवादी व्यवस्था की बेईमानी और भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा कारण है।
यही पर हम देख रहे हैं कि सरकार की सबसे बड़ी विफलता का परिणाम यह है कि कानूनों को रौंदने वाले अधिकांश पूंजीपतियों के खिलाफ, सरमायेदारों के खिलाफ, कानूनों को रौदने वाले कारखानेदारों के खिलाफ और प्रबंधकों के खिलाफ कोई भी कानूनी कार्रवाई नहीं की जाती। आखिर क्यों? जबकि इतना बड़ा सरकारी अमला है फिर भी यह चुप क्यों बैठा रहता है? क्या यह इन सब के भ्रष्ट आचार का मिलाजुला रूप नहीं है?
इसका मुख्य कारण है की अधिकांश पूंजीपति अपने मजदूर विरोधी कुकर्मों को छुपाने के लिए बड़े पैमाने पर सरकारी अधिकारियों को पैसा देते हैं और इसी कारण वे कानूनों का पालन करने से बच जाते हैं और सरकारी अमला इन्हीं भ्रष्टाचारी तौर तरीकों को अपनाकर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं करता।
यहीं पर हम देख रहे हैं कि अधिकांश पूंजीपतियों द्वारा बैंकों से बड़े पैमाने पर कर्ज़ लिया जाता है। मगर आजकल देखने में आ रहा है कि अधिकांश पूंजीपति सरकारी बैंकों से लिए पैसे और ऋण को चुकता नहीं करते और येन केन प्रकारेण इसका गबन कर लेते हैं। बैंक भी अधिकांश ऋण न लौटाने वालों के खिलाफ कार्यवाही नहीं करते, आखिर क्यों? क्योंकि हमारे समाज में भ्रष्टाचार व्याप्त है।
यहीं पर सरकार से एक सवाल है कि सरकार पूरे देश के पैमाने पर तमाम बैंक से लोन लेने वालों द्वारा लोन न लौटाए जाने वाले लोगों की सूची जारी क्यों नहीं करती? इनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं करती? अभी अभी पिछले दिनों खबर आई थी कि सरकार ने देश के बड़े-बड़े पूंजीपतियों के 12 लाख करोड़ रुपए, जो उन्होंने बैंक से लोन लिये थे, उसको माफ कर दिया है, आखिर क्यों? क्या यह सरकारी भ्रष्टाचार नहीं है? और क्या यह भ्रष्टाचार को आगे बढ़ाने का सरकारी उपक्रम और पराक्रम नहीं है?
भारत की आजादी मिलने के बाद सन 1990 तक भारत में व्याप्त भ्रष्टाचार पर कुछ रोक लगी और यह बहुत सर्वव्यापी नहीं था बल्कि चोरी छुपे होता था। मगर 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद हमारे देश में वैश्वीकरण, निजी करण और उदारीकरण की नीतियों का आगमन हुआ। इनके आते ही भ्रष्टाचार चोरी छुपे रूप से निकलकर मेज के ऊपर आ गया और देखते ही देखते हमारा देश भ्रष्टाचार के गर्त में समा गया।
आज हम देख रहे हैं कि इसी भ्रष्टाचार की वजह से भारत के कई अपराधी लाखों करोड़ों रुपए का गबन करके, भ्रष्टाचार करके विदेशों में चले गए और सरकार उनके खिलाफ कोई कार्रवाई न कर पायी। इसी भ्रष्टाचार का एक भयंकर और विचलित करने वाला रोग और रुप अडानी की धोखाधड़ी किये गये मामलों में देखा जा सकता है, जहां पर अडानी के भ्रष्टाचार को और धोखाधड़ी को लेकर पूरा विपक्ष एकजुट है और जेपीसी की मांग कर रहा है, मगर सरकार जैसे अडानी के पक्ष में अडकर खड़ी हो गई है और उसने संसद की कार्यवाही भी नही चलने दी है। वह भ्रष्टाचार के इस बहुत बड़े मामले को लेकर कोई बात सुनने को तैयार नहीं है। क्या यह सरकार का भ्रष्ट आचार नहीं है?
सर्वव्यापी भ्रष्टाचार का एक भयंकर रूप हम भारत की शिक्षा व्यवस्था और स्वास्थ्य नीति में देख रहे हैं। आज अधिकांश स्कूल कॉलेजों में भ्रष्टाचार के रूप में लगभग लूट जारी है। किताबों के, जूतों के, ड्रेस के नाम पर, फीस के नाम पर, वहां पर भयंकर भ्रष्टाचार है। लगभग पूरा का पूरा स्कूल प्रशासन भ्रष्टाचारी तौर तरीके अपनाकर बस पैसा बनाने में लगा हुआ है। यही हाल स्वास्थ्य व्यवस्था में है। सरकारी अस्पताल हो या प्राइवेट अस्पताल हो, वहां भ्रष्टाचार भयंकर रूप से व्याप्त है और नाजायज तरीकों से मरीजों को टेस्ट के नाम पर, दवाई के नाम पर लूटा जाता है। उनको दरिद्र कर दिया जाता है। बड़े अफसोस की बात है कि हमारी सरकार को यह सब दिखाई नहीं दे रहा है और सरकार इन संस्थाओं में फैले भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए कतई भी गंभीर नहीं है।
आज हम देख रहे हैं एससी, एसटी और ओबीसी के लोगों को बड़े पैमाने पर नौकरियों से वंचित किया जा रहा है। संवैधानिक प्रक्रिया होने के बावजूद भी, आरक्षण होने के बावजूद भी इनको सरकारी नौकरियां नहीं दी जा रही है और कोई ना कोई बहाना बनाकर, बड़े पैमाने पर इन लोगों को सरकारी नौकरियों से वंचित किया जा रहा है। क्या यह सरकारी भ्रष्टाचार नहीं है?
यहीं पर हम देख रहे हैं कि रोज रोज अखबारों में खबरें आती रहती हैं कि तथाकथित उच्च जातियों के लोगों को सरकारी अधिकारियों द्वारा नौकरियों में नियुक्तियां दी जा रही हैं। आखिर क्यों? इन वंचित, पीड़ित, गरीब लोगों के साथ यह भेदभाव क्यों किया जा रहा है? क्या यह सरकारी भ्रष्टाचार नहीं है?
भ्रष्टाचार केवल सरकार और सरकारी विभागों में ही व्याप्त नहीं है। यह हमारे समाज में हजारों साल से बना हुआ है। साधनहीन लोगों को दास और गुलाम बनाया जाता था, किसानों और मजदूरों को जो खेती में काम करते थे, उनको जमीदारों द्वारा, उनके किए गए काम का पूरा भुगतान नहीं किया जाता था और उनके साथ बड़े पैमाने पर बेईमानी की जाती थी। इसके बाद दुनिया में पूंजीवादी व्यवस्था का आगमन हुआ और पूंजीवादी व्यवस्था ने भी मजदूरों के साथ न्याय नहीं किया और उनके साथ बड़े पैमाने पर बेईमानी, अन्याय और भ्रष्टाचार किया। उनके कानूनी अधिकार उनको नहीं दिए। उनसे 18 अट्ठारह घंटे काम कराया, उन्हें साप्ताहिक छुट्टी नहीं दी, उन्हें ओवरटाइम का भुगतान नहीं किया, उन्हें न्यूनतम वेतन नहीं दिया, हक मांगने वालों को गैरकानूनी तरीके से नौकरी से निकाल दिया गया और उनकी समय से कोई सुनवाई नहीं की गई और इस प्रकार उन्हें बड़े पैमाने पर अन्याय का शिकार बनाया गया। क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है?
वर्तमान सरकार और अधिकांश राजनीति दिलों ने भी इन मजदूरों को समय से न्याय दिलाने के लिए कोई कार्यवाही नहीं की। क्या यहां पर पूंजीवादी व्यवस्था और सरकार, दोनों ही भ्रष्ट आचरण के जिम्मेदार नहीं हैं? आज हम आजादी के 75 साल बाद भी हजारों साल पुराने शोषण, दमन, अन्याय और भेदभाव की भावना को दूर नहीं कर पाए हैं, गरीबी को दूर नहीं कर पाए हैं। क्या यह भी हमारी राजनीति की, हमारी राजनीतिक व्यवस्था की, पूरी की पूरी जनविरोधी राजनीति और सरकार का भ्रष्टाचार नहीं है?
भारत की आजादी के पिछले 75 साल का इतिहास बता रहा है भारत में व्याप्त पूंजीवादी व्यवस्था और पूरा का पूरा पूंजीपति वर्ग किसी नियम कानून को मानने को तैयार नहीं है। यह पूरा का पूरा जनविरोधी लुटेरा वर्ग, देश के शासन प्रशासन पर अपना प्रभुत्व कायम रखना चाहता है। अनेकों कानूनों के बावजूद भी कानून के शासन का उल्लंघन करता है, किसी नियम कानून को मानने को तैयार नहीं है। इसका मुख्य मकसद आज भी वही बना हुआ है कि यह अपनी मुनाफाखोरी को और अपने वर्गीय प्रभुत्व को और अपने भ्रष्ट आचार को किसी भी कीमत पर बनाए रखना चाहता है और इसका सुशासन, जन विकास और जन समस्याओं के समाधान से कोई लेना देना नहीं है। यह पूरा का पूरा वर्ग भ्रष्टाचार से लड़ाई लड़ने में और इसे खत्म करने में कोई विश्वास नहीं रखता है।
यह बात आज भी सही है कि हमारी जनता का बड़ा हिस्सा आज भी सामंती सोच, पूंजीपतियों और धन्ना सेठों के भ्रष्टाचार का मारा हुआ है। सरकार और जांच एजेंसियां भी इन दोषी लोगों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं कर रही हैं। इस प्रकार यह कहना कि हमारी जांच एजेंसियां सच्चाई और न्याय का एक ब्रांड है, एकदम सर्वथा अनुचित है और जनता को गुमराह करने वाला है। हमारे समाज में और पूरी की पूरी व्यवस्था में बहुत बड़े पैमाने पर आकंठ भ्रष्टाचार व्याप्त है और जनता को हजारों साल पुराने भ्रष्ट आचार से आज तक भी कोई निजात नहीं मिल पाई है।
हम यहां पर जोर देकर कहना चाहेंगे कि इस सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सरकारी भ्रष्टाचार को, केवल और केवल क्रांतिकारी समाजवादी व्यवस्था पर आधारित किसानों मजदूरों की सरकार ही नेशनाबूद कर सकती है। पिछले 100 सालों के इतिहास में हमने देखा है कि जहां पर किसानों मजदूरों की सरकार और समाजवादी व्यवस्था स्थापित की गई है, वहां पर भ्रष्टाचार से लगभग मुक्ति पा ली गई है। इसके अलावा वर्तमान लुटेरी और भ्रष्टाचारी पूंजीवादी व्यवस्था और भ्रष्टतंत्र में, कभी भी भ्रष्ट आचरण से और सर्वव्यापी भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं हुआ जा सकता है और वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था में भ्रष्टाचार से मुक्त होने के कोई आसार नहीं हैं।

