शशिकांत गुप्ते
आज सीतारामजी व्यथित हैं। मिलते ही कहने लगे मुझे,सर्वत्र अंधियारा ही दिखाई दे रहा है।
अब प्रतिदिन तिथियों में सिर्फ अमावस्या ही क्यों दिखाई दे रही है?
मैने कहा सिर्फ आप ही व्यथित नहीं हैं। देश हर एक शख्स जिसके अंतर्मन में संवेदनाएं चैतन्य हैं,व्यथित हैं।
मैने सीतारामजी याद दिलाया हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम साहित्यकार हैं। ऐसे समय हमें अपनी कलम से लोगों में मानवीय चेतना जागृत करने के दायित्व का निर्वाह करना चाहिए।
इतना कहते हुए मुझे देश के मूर्धन्य कवि स्व. बाल कवि बैरागीजी की कविता की इन पंक्तियों का स्मरण हुआ।
है अंधेरे से लड़ाई,है अमावस्या से लड़ाई
युद्ध है अंधियार से,इस लड़ाई को लड़े कौनसे हथियार से
एक नन्हा दीप बोला मैं उपस्थित हूँ यहाँ
रोशनी की खोज में आप जातें हो कहाँ
आपके परिवार में मेरा नाम जोड़ दें,आप खुद अंधियार से यारी निभाना छोड़ दें
उक्त पंक्तियों के महत्वपूर्ण उपदेश है।
साहित्यकार के दायित्व को कैसे निभाना यह बालकवि की इन पंक्तियों में निहित है।
पहिली ही किरन को ललकारो, यदि ये सूरज भी काला हो
किरणों का कंचन खोटा हो, नकली हो कलई वाला हो
अंजुलि को बदलो मुट्ठी में, भैरव में बदलो मन्त्रों को
मैं फिर लिख दूँगा गायत्री, पहिले निपटो षड़यन्त्रों को
हमें अपने स्वयं के जेहन के साथ देश को जगाना है। कैसे जगाएंगे?
इस प्रश्न उत्तर भी बाल कवि की कविता की निम्न पंक्तियों में है।
कहाँ गई वो आग कि जिसमें, शोणित सदा नहाता था
कहाँ गई वो आग कि जिसमें, महाप्रलय मुस्काता था
परिवर्तन के पलने में जब, अग्नि-वंश सो जाता है
तो कालान्तर में अग्नि-वंश ही मेघवंश हो जाता है।
शब्दों के अग्नि वंश को मेघवंश में परिवर्तित होने से बचाना है।
कैसे? इसका जवाब निम्न पंक्तियों में मिल जाएगा।
अंत में बाल कवि की इसी कविता की निम्न पंक्तियों को उद्धृत करते हुए,बाल कवि बैरागीजी के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रस्तुत करतें हैं।
उनकी पुरवा बहे, इनकी पछुआ बहे
पर झुलसाये मेरी बहारों को
तो ज्वाला को जोखिम लेनी ही होगी
जलना ही होगा अंगारों को।
साहित्यकार के शब्दों के अंगारे निरंतर जलते रहना चाहिए।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

