आजकल दलितों से तथाकथित हिन्दू समाज के सवर्ण लोग इसलिए नाराज हैं,क्योंकि..
गाँव का ठाकुर इस बात से नाराज़ है कि
दलित आते-जाते उससे ‘राम-राम ‘ क्यों नहीं करता !
गाँव का ब्राह्मण इस बात से नाराज़ है कि
दलित आते-जाते उसे ‘पाँय-लागूँ’ ‘क्यों नहीं बोलता ?
गाँव का बनिया इस बात से नाराज़ है कि दलित की
माँ अब पाव भर आटे के लिए,
उसके घर की चक्की नहीं पिसती !
गाँव का मुखिया इस बात से नाराज़ है कि
दलित का
बापू अब जूठन के लिए,
भरी दुपहरी उसके खेतों में बेगार नहीं करता !
गाँव की पंचायत इस बात से नाराज़ है कि
दलित का लड़का अपनी शादी में घोड़़े पर बैठकर बारात क्यों गया ?
थाने का दारोगा इस बात से नाराज़ है कि अब
चाचा उसकी चौकी की सफ़ाई और
उसकी तेल-मालिश क्यों नहीं करते !
गाँव का जमींदार इस बात से नाराज़ है कि पहले की तरह दलित की बहू
ससुराल आते ही,उसकी हवेली पर काम करने क्यों नहीं आई ?
किसी का पढ़ना और आगे बढ़ना
न जाने कितनों को नाराज़ कर देता है…!
पर ऐसी नाराज़गी से दलित क्यों और कब तक डरें ?
मुझे पता है कि सारे नाराज़ एक साथ
एक चबूतरे पर आ खड़े हुए हैं…!
और इन सबके सामने दलित अकेला खड़़ा है..!
संभव है कि
मार दिया जायेगा..!
या
किसी झूठे मुक़दमे में फँसाकर
अंदर कर दिया जायेगा…!
पर कुछ वक्त के लिए ही सही,
मरने से पहले कम से कम एक बार ही सही
ज़िंदा होने का सबूत दिया जाये.
अब दलित तुम्हारी नाराज़गी की
रत्ती भर भी परवाह नहीं करता…!
दलित न तुमसे !
न तुम्हारी पंचायत से !
न तुम्हारी चौकी से !
न तुम्हारी गरज़ से !
न तुम्हारी
गाली से !
न तुम्हारी गोली से !
किसी से रत्ती भर भी नहीं डरता !
क्योंकि दलित अब जाग चुका है..!
साभार - सुरेन्द्र कुशवाहा ,दिल्ली ,संपर्क- 93119 71299
संकलन - निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद,
