Site icon अग्नि आलोक

आस्तिक बनाम नास्तिक,वामपंथी बनाम दक्षिणपंथी,आखिर कौन श्रेष्ठ ?

Share

-निर्मल कुमार शर्मा,

ऐसे घनघोर अशिष्टों को और असभ्यों को,जिन्हें यही पता ही नहीं है कि सार्वजनिक जीवन में कैसे व्यवहार किया जाता है,वे भी आजकल सोशल मीडिया पर ‘तुम वामपंथी हो ‘ कह कर अच्छे भले,सभ्य,उच्च शिक्षित, बुद्धिजीवियों,लेखकों,कवियों,इंजीनियरों, डॉक्टरों, प्रोफेसरों लोगोंं तक का अपमान कर रहे हैं,जबकि इन अशिष्टों, असभ्यों और अशिक्षितों को वामपंथ का क.ख.ग.भी नहीं पता है,लेकिन ये उन्हें अपमान करने के लिए अक्सर वामपंथी या अर्बन नक्सलाइट शब्द कहकर इन शब्दों को अक्सर ‘गाली के तौर ‘ पर इस्तेमाल कर रहे हैं। मैं कहता हूँ कि कम्युनिज्म व्यवस्था वह राजनैतिक व्यवस्था है जो ‘शोषणविहीन समाज ‘का निर्माण करना चाहता है,भले ही आज इस दुनिया में कम्युनिज्म को स्थापित करने वाले सोवियत संघ का पतन हो गया हो,चीन,क्यूबा, वियतनाम,उत्तर कोरिया आदि देश कम्यूनिज्म व्यवस्था से कुछ विचलित हो गये हों,वे अपने रास्ते से भटक गये हों,फिर भी इससे यह प्रामाणित नहीं होता कि कम्यूनिज्म व्यवस्था ही गलत है और उसे अब सर्वत्र त्याग दिया गया है या वह व्यवस्था फेल हो गई है। ऐसा बिल्कुल नहीं है,अपितु पूंजीवादी व्यवस्था के शोषण,गैरबराबरी, बेरोजगारी, अशिक्षा आदि तमाम दुर्गुणों के विपरीत कम्युनिज्म व्यवस्था में ही यह अन्तर्निहित है कि जनता के हर व्यक्ति को मानवीयता,बराबरी, दया और करूणा आदि मनुष्यता के सर्वोच्च गुणों के आधार पर,उन सभी के लिए खाने,पहनने,रहने, शिक्षा लेने,अच्छे स्वास्थ्य के साथ, रोजगार के अवसर मिलने का,अपना जीवन जीने का उसका अधिकार हो ।*
आज पूँजीवाद के सबसे बड़े पैरोकार अमेरिका अपने देश में ही ऐसा माहौल बना दिया है कि वहाँ के लोग भारत जैसे मेडिकल सुविधाओं में जर्जर व्यवस्था वाले देशों जैसे भी लगभग निःशुल्क ईलाज करने वाला एक भी अस्पताल नहीं हैं ! दूसरी ओर वामपंथी विचारधारा का एक छोटा सा टापू देश क्यूबा, जिसकी आबादी बमुश्किल 1 करोड़ 15 लाख है,वह अपने देश के लोगों के स्वास्थ्य पर इतना अधिक ध्यान देता है कि वहाँ प्रति 155 लोगों की देखभाल के लिए औसतन एक डॉक्टर नियुक्त है,जबकि अमेरिका जो वर्तमान समय में पूंजीवादी व्यवस्था का दुनिया का सबसे बड़ा पुरोधा है,वहाँ प्रति 400 लोगों पर मात्र एक डॉक्टर है,लेकिन अमेरिकी स्वास्थ्य सेवा और क्यूबा के स्वास्थ्य सेवा में मूलभूत अंतर यह है कि जहाँ क्यूबा में वहां की जनता के लिए चिकित्सा लगभग एकदम नि:शुल्क है,वहीं अमेरिका में पूरी चिकित्सा व्यवस्था निजी हाथों में सौंपी जा चुकी है,और वहाँ आज ‘कुछ भी ‘निःशुल्क नहीं है। वहाँ सब कुछ निजी हाथों में बड़े धन्नासेठों या पूँजीपतियों के हाथों में है। भारत में दिल्ली की केजरीवाल सरकार को छोड़कर इस देश में हर जगह चिकित्सा और शिक्षा की हालत अत्यंत गंभीर और दयनीय हालात में है। भारत में औसतन 11000 लोगों पर एक डॉक्टर है,बिहार में तो 28391 लोगों पर एक डॉक्टर है,तो महाराष्ट्र में 30000 लोगों पर एक डॉक्टर है। क्यूबा जैसे नन्हें से राष्ट्र के 30000 डॉक्टर्स आज दुनियाभर में 60 देशों में अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। क्यूबा ऐसा देश है जो अपने डॉक्टरों को ‘मानवीयता के नाते ‘अपने कट्टर राजनैतिक, नीतिगत व सामरिक विरोधी देश अमेरिका के अंधसमर्थन करने वाले ‘कोरोना पीड़ित देशों ‘यथा इटली,स्पेन और इंग्लैंड तक में उन देशों के मरीजों की तिमारदारी के लिए भेज रहा है। तो क्या वामपंथी देशों की ये मानवीयता की बातें आलोचना करने के योग्य हैं ?शिक्षा और रोजगार के मामले में आज भी वामपंथी देश किसी भी पूँजीवादी देशों से अपने पराभव के बाद भी बहुत बेहतर स्थिति में हैं,लेकिन पूँजीवादी देशों में मिडिया और धर्म के ठेकेदारों यथा कथित पोप,मुल्लाओं, बाबाओं,गुरूओं, सन्तों,स्वयंभू पीठाधीश्वरों,शंकराचार्यों आदि द्वारा,जिनमें से अधिकांश आजकल बलात्कार के मामले में जेल की हवा खा रहे हैं,इन देशों की धर्मभीरु जनता को,विशेषकर बच्चों को बचपन से ही ये घुट्टी पिलाई जाती है कि वामपंथी विचारधारा वाले बुरे लोग होते हैं,वे नास्तिक होते हैं,वे भगवान को नहीं मानते,वे पूजापाठ नहीं करते,वे कभी मस्जिदों, मंदिरों और चर्चों में नहीं जाते आदि-आदि।
अब शोषणकारी पूँजीवादी व्यवस्था के चाटुकार मिडिया के घनघोर प्रचार के इस छद्म बातों में मत उलझिए कि ‘कम्युनिस्ट, वामपंथी विचारधारा बहुत तानाशाही व कुत्सित शासन व्यवस्था है, यह व्यवस्था फैक्ट्रियों पर केवल ताला बन्द करवा देती है,यह उत्पादन में रोड़े अटकाती है,यह देश की प्रगति में बाधक है। ‘यह पूँजीपतियों के पैसे पर पलनेवाले चाटुकार और भाँड़ मिडिया का दुष्प्रचार और एक बहुत ही सोचीसमझी कुटिलतम् प्रोपेगैंडा मात्र है। यक्ष प्रश्न है कि अगर वामपंथी या कम्युनिस्ट व्यवस्था इतनी त्याज्य है,तब भारत के केरल के लोग इतने शत-प्रतिशत शिक्षित, स्वस्थ्य और जागरूक क्यों हैं,जहाँ काफी दिनों से कम्युनिस्ट शासन व्यवस्था है,जबकि उत्तर प्रदेश,बिहार,ओड़िशा आदि राज्य इतने पिछड़े,अशिक्षित,बेरोजगारी से त्रस्त व भूखमरी ग्रस्त क्यों हैं ?जबकि वहाँ लम्बे समय से पूँजीवादी व्यवस्था के मानने वाले राजनैतिक दलों का ही शासन रहा है।
इतिहास गवाह है कि इस मनुष्यता या इंसानियत के अगर सबसे बड़े दुश्मन,नुकसान पहुँचाने वाले,हत्या करने वाले अगर कोई हैं तो ये भगवान को मानने वाले,अपने ललाट पर लम्बा-चौड़ा चंदन और रंगविरंगे टीका लगाने वाले, आस्तिक कहलाने वाले,कर्मकांडी,भगवान के मानने वाले,नित्य मंदिर-मस्जिद-चर्च जाने वाले ही हैं। अभी-अभी पिछले दिनों हुए दिल्ली दंगे इसके ज्वलंत उदाहरण है,जिसमें कई विडियो क्लिप्स में दंगाइयों को आगजनी और हत्या करने से पूर्व उन दंगाइयों द्वारा ‘जैश्रीराम ‘और ‘अल्लाहो-अकबर ‘के नारे लगाते हुए सुना जा सकता है। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि जितने लोग आज तक इन धार्मिक ठेकेदारों चाहे वे मुस्लिम हों,क्रिश्चियन हों,यहूदी हों,हिन्दू हों, पारसी हों आदि के धर्म के ठेकेदारों के धार्मिक कुचक्रों के कारण जानबूझकर रचे गए,धार्मिक युद्धों में आम गरीब व साधारण लोग मारे गये हैं,उतने,आज तक हुए अन्य कारणों से हुए बड़े से बड़े युद्धों में भी नहीं मारे गये हैं ! तो अब ये बात आप पर निर्भर है कि आप सोचें कि वामपंथी विचारधारा श्रेष्ठ है या शोषणकारी दक्षिणपंथी विचारधारा ! उसी प्रकार इस दुनिया के लिए मानवीयता में विश्वास करनेवाले नास्तिक लोग अच्छे हैं या भगवान और मंदिर-मस्जिद-चर्च-गुरूद्वारा के नाम पर भ्रम और पाखंड फैलाकर ये पाखण्डी आस्तिक लोग अच्छे हैं ? यह निर्णय आपको करना है । आप प्रकृति के एक सर्वश्रेष्ठ बड़े मस्तिष्क वाले सोचने-समझनेवाले इस पृथ्वी के एकमात्र प्राणी हैं,तो अपने मस्तिष्क से सोचिए और निर्णय करिए,कि आपकी भलाई किस शासन व्यवस्था में अन्तर्निहित है ?छूआछूत, अश्यपृश्ता, ऊँचनीच भेदभाव आधारित जातिवादी और शोषणकारी व्यवस्था पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था में,जिस व्यवस्था में करोड़ों लोग बेरोजगारी से त्रस्त होकर भूखों मरने को अभिशापित रखने,दवाओं की कृत्रिम कमी करके नन्हें शिशुओं को मारने, किसानों को उनकी फसलों का तर्कसंगत व न्यायोचित्त मूल्य न देकर लाखों की संख्या में आत्महत्या करने को बाध्य करने,अचानक लॉकडाउन करके अपने ही देश के मजदूरों को उनके बीवी-बच्चों सहित हजारों किलोमीटर पैदल चलाने को बाध्य करके,इस देश के अन्न के उपयोग से दोगुना अन्न की प्रचुर मात्रा में गोदामों में भरे रहने के बावजूद बीस करोड़ लोगों को रात को भूखे पेट सोने को बाध्य करके, गुजरात से लेकर इस देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली तक में जानबूझकर धार्मिकवैमनस्यता फैलाकर दिनदहाड़े कत्लेआम,आगजनी, बलात्कार करके हजारों निरपराध लोगों को मौत के घाट उतारने वाले कुकृत्य करने वाले पूँजीवादी परस्त सरकार के शासन में या बुद्धिवादी और बुद्धिजीवी बनकर,दयालु बनकर,सभी को स्वस्थ्य, सुखी,शिक्षित, सुखपूर्वक सादा जीने में मददगार बनकर उस सरकार की शासन व्यवस्था में,जो सभी को भोजन,कपड़ा,मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की समुचित व्यवस्था करना चाहती है,उस व्यवस्था में ?

*_-निर्मल कुमार शर्मा, ‘गौरैया एवम् पर्यावरण संरक्षण व समाचार पत्र-पत्रिकाओं में निष्पृह,निष्पक्ष ,बेखौफ व स्वतंत्र लेखन ‘,जी-181-ए, एचआईजी फ्लैट्स, सेक्टर-11,प्रतापविहार, गाजियाबाद,

Exit mobile version