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..तो फिर अब किसी चूड़ी वाले के पीछे आप क्यों खफा हैं

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कृष्ण कांत

तीन दिन से इंदौर का चूड़ी वाला छाया हुआ है और क्या सेकुलर, लिबरल और क्या मुसलमान.. सबके पोस्ट कमेंट तक तो उसने अपनी पहुंच बनाई ही है।मैंने आलोचना और विरोध की इस आंधी में खास तौर पर उन मुसलमानों को चेक करने की कोशिश की, जिनसे बीते एक दो साल में मेरी ओवैसी के मुद्दे पर बहस हुई है।उनमें ज्यादातर या कह लें कि सभी इस घटना से क्षुब्ध दिखे.. उन्होंने आलोचना की है, इस घटना के लिये एमपी की भाजपा सरकार की भर्त्सना भी की है।

कभी इन्होंने मुझसे ही कहा था कि हमें सेकुलर दलों ने छला है, हमें अपनी अलग सियासी हैसियत और पहचान चाहिये और इसके लिये हम ओवैसी के साथ हैं।हमें बीजेपी से मत डराइये, बीजेपी आती है तो आती रहे, हमें फर्क नहीं पड़ता.. उसे रोकने का ठेका हमने नहीं ले रखा। कुछ लोगों ने तो एक कदम आगे बढ़ कर बीजेपी को ही वोट दे देने की भी बात कही।अब वे इस घटना से कुपित हैं.. मुझे उनकी तकलीफ, गुस्से, डर का कारण नहीं समझ में आता। क्या उन्हें यह नहीं पता कि भाजपा को सियासी लाभ पहुंचाने और उनके पक्ष में हिंदू ध्रुवीकरण कराने के लिये यह सब किया जाता है।करने वाले इस वजह से बेखौफ होते हैं क्योंकि उन्हें भाजपा और संघ का संरक्षण हासिल होता है और भाजपा जो सरकार में है, जो न्यायालयों पर हावी है..जो न सिर्फ ऐसे कांड करने वालों को बचाती है, उन्हें नायक बनाती है बल्कि जो पीड़ित है, उसी के खिलाफ कई धाराओं में केस दर्ज करा देती है..

न्यायालयों पर दबाव डाल कर अपने लोगों को राहत दिलाती है और दूसरे पक्ष को परेशानी में डालती है..उसका चरित्र ही फासिज्म को सपोर्ट करने वाला है तो वह वही करती है जिसके लिये वह बनी है। यह बात वे सब लोग (जिनका जिक्र ऊपर किया) जानते हैं और उन्होंने खुद ही इस स्थिति को स्वीकार किया है।तो भाजपा अगर सत्ता में रहती है तो यह सब तो होना ही है.. फिर बकौल आपके, आपको बीजेपी से डराया नहीं जा सकता, आप पर बीजेपी के आने से फर्क नहीं पड़ता, आप खुद बीजेपी को वोट देने तक को तैयार हो जाते हैं..तो फिर अब किसी चूड़ी वाले के पीछे आप क्यों खफा हैं, बीजेपी के सत्ता में रहते.. उसे सर्वाइव करने के लिये इस तरह की घटनायें तो लगातार होते रहनी हैं..यह बात आपको पता है.. ओवैसी प्रेम में आपको यह बात मंजूर भी है.. तो फिर आज आपको परेशानी क्यों महसूस हो रही है? गुस्सा किस बात के लिये आ रहा है?आप अच्छी तरह जानते हैं कि आप अपने नेता को जिता नहीं सकते.. सरकार बनाना तो दूर की बात है, एक विधायक जिता पाना भी मुश्किल है..भाजपा को आप नहीं हराते-जिताते.. बहुसंख्यक हिंदू ही हराते या जिताते हैं, जिताने वाले हो सकता है कि संख्या में कम पड़ जायें तो ऐसी कंडीशन में आपका सपोर्ट उनके काम आ सकता है।वे जीत भी सकते हैं और सरकार भी बना सकते हैं, सरकार बदलने से काफी हद तक माहौल भी बदल जायेगा। कम से कम आप यह उम्मीद तो कर सकते हैं कि अपराधियों को सरकार और न्यायालय से सपोर्ट नहीं मिलेगा, उनके खिलाफ कार्रवाई होगी।लेकिन आपको उनमें कीड़े निकालने हैं.. बिना यह सोचे कि आप प्रकारांतर से भाजपा की ही मदद कर रहे हैं और वह सरकार बनायेगी तो यह सब तो होगा ही, जिसके लिये आप आज कलप रहे हैं..तो कम से कम इतना तो कीजिये कि या वह मत कीजिये या यह मत कीजिये.. सेकुलर दलों में कीड़े निकालते वक्त यह जरूर सोचा कीजिये कि उन्हीं की सरकारों में देश पिछले सत्तर-पचहत्तर सालों में यहा तक पहुंचा है.

.भाजपाईयों के हाथ शुरू से सत्ता लग जाती तो यह देश को कब का अफगानिस्तान सीरिया बना चुके होते। न इन्हें अर्थव्यवस्था संभालनी आती है जिसकी वजह से आज देश भूखा, कंगाल और फटेहाल होता..न इन्हें विविधता से भरा समाज संभालना आता है जिसकी वजह से अंदर ही अंदर टूट-टूट कर पूरा भारत खोखला हो चुका होता.. अगर आज भारत ऐसा नहीं है तो उन्हीं दलों की बदौलत है..आप उनमें कमियों की शिकायत कर सकते हैं पर परफैक्ट तो कोई नहीं होता, न इंसान, न पार्टी, न निजाम.. कमियां तो हर जगह मिलेंगी।जरूरत उन दलों, लोगों और व्यवस्था पर दबाव बना कर कमियों को दूर करने की है, न कि उन्हें खारिज करके अपनी अलग ही डफली बजाने लग जाने की।अशफ़ाक़ अहमद की वॉल सेचूड़ीवाले पर आरोप लगाना सबसे आसान है! हालांकि इससे पहले कभी उन पर इस तरह का इल्जाम नहीं लगा।घरों में, गांव में, फुटपाथ पर उनका काम ही महिलाओं के बीच होता है। औरतें चूड़ी वाले के सामने आपस में कैसे कैसे मजाक करती है!बच्चे तक उठ कर भाग जाते हैं मगर वह निर्विकार भाव से चूड़ियां पहनाता उतारता रहता है। गांवों में तो वहीं महिलाएं उसे खाना खिला देती है। और चाचा, ताया, मामा, भैया सारे रिश्ते बनाकर चार आने कम भी करवा लेती हैं और उधार भी कर लेती हैं।समाज का ताना बाना तोड़ रहे हैं। यह अविश्वास खाली मुसलमानों तक सीमित नहीं रहेगा। समाज के हर वर्ग को चाहे वह सामाजिक व्यवस्था में कितना ही प्रिवलेज्ड ( उच्च वर्णीय) क्लास हो कहीं न कहीं नुकसान पहुंचाएगा। नफरत से उपजे आरोप और प्रतिक्रियाएं बहुत जहरीली होते हैं।

अभी मध्य प्रदेश में ही एक ब्राह्मण युवक को ठाकुरों द्वारा थूककर चाटने के लिए बाध्य करना और जूते पर सिर रखवाने का वीडियो वायरल हुआ था। और आज यूपी में व्हटस एप पर पूछा यह सवाल वायरल हो रहा है कि ब्राहमण ज्यादा गंदी जाति है या राजपूत?सबको नफरत की आग में झौंक देंगे। ये राजनीति देश और समाज दोनों को खोखला कर रही है। प्रेम और विश्वास की राजनीति अगर फिर से शुरू नहीं हुई तो कोई नहीं बचेगा।Shakeel Akhtar

जिस देश में पीढ़ियों से मुसलमान मनिहार और मनिहारिन ही औरतों को चूड़ियां पहनाते रहे हों, वहां पर एक चूड़ी वाले को इसलिए पीटा जाता है ​क्योंकि वह मुसलमान है. पिछली पीढ़ियों में हमारे घरों की औरतें बाजार नहीं जाती थीं. अगर मनिहारिनें न होतीं तो वे सु​हागिनों के हाथ सूने रहते. आप समझ रहे हैं कि इस देश के लोगों को किस तरह बर्बर और बददिमाग बनाया जा रहा है कि वे अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने में गर्व महसूस कर रहे हैं.जिस देश का प्रधानमंत्री दावा करे कि उसने 35 साल तक भिक्षा मांगकर जीवन जिया है, उस देश में तो भिखारियों को सम्मान मिलना चाहिए. लेकिन एक भीख मांगने वाले को और उसके बच्चे को इसलिए पीटा जाता है क्योंकि वह मुसलमान है. जो लोग प्रधानमंत्री को ‘अवतार’ मानते हैं, उन्हें तो भिखारियों के चरण धोकर पी लेना चाहिए. पता नहीं किस भिखारी के रूप में परमपिता दर्शन दे रहे हों! आखिर एक महापुरुष 35 साल तक भिखारी के वेष में इसी धरती पर घूमा है. फिर भी लोग भीख मांगने वाले से नफरत क्यों कर रहे हैं? किसी भिखारी को बेवजह पीटने लोग कौन हैं? लगता है कि बीजेपी और हिंंदुत्व के समर्थकों के बीच प्रधानमंत्री की महिमा फीकी पड़ रही है. वे उनके अतीत का सम्मान नहीं कर पा रहे हैं.

वे भिखारियों का सम्मान करने की जगह उन्हें पीट रहे हैं और पाकिस्तान जाने को कह रहे हैं. क्या ऐसे लोगों को भिखारियों से नफरत है? क्या लोग चाहते हैं कि प्रधानमंत्री की तरह कोई और भीख न मांगे? क्या उन्हें डर है कि कोई भिखारी कल को प्रधानमंत्री को चुनौती दे सकता है?जिस विचारधारा से प्रभावित लोग जगह जगह गरीब निर्दोंषों की लिंचिंग कर रहे हैं, उस विधारधारा के नेता लोग इसकी निंदा करते हैं? सरकार इस बारे में क्या सोचती है? ​सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के बावजूद लिंचिंग रोकने के क्या उपाय किए गए? कोई मंत्री लिंच मॉब को माला पहनाने के लिए बेताब क्यों रहता है? नेता इस लिंचिंग कल्चर पर क्या सोचते हैं?दरअसल, कोई किसी के बारे में कुछ सोच नहीं रहा है. समाज में नफरत भरने और उसे बांटने का एक राष्ट्रीय प्रोजेक्ट चल रहा है और पब्लिक बुरी तरह उसकी चपेट में है. नेता और अपने संगठन के साथ मिलकर संगठित रूप से इस नफरत को हवा दे रहे हैं. वे चाहते हैं कि देश में गांव गांव के स्तर पर विभाजन और गहरा हो ताकि हिंदू उनकी तरफ लामबंद हो जाएं और वे सत्ता पर हमेशा के लिए काबिज रहें.मुसलमानों से नफरत का ये कारोबार मुसलमानों के खिलाफ तो है ही, यह मूलत: हिंदुओं के खिलाफ है. हिंदुओं को एक बर्बर कौम में बदला जा रहा है. उन्हें नफरत करने वाली ऐसी कौम में बदला जा रहा है जो न तो लोकतंत्र पसंद करेंगे, न कानून के शासन में भरोसा करेंगे, न ही सभ्य समाज में कोई आस्था रखेंगे. यह पूरा प्रोजेक्ट हिंदुओं को गुलाम बनाकर सत्ता में बने रहने की ​साजिश है.धार्मिक नफरत का सियासी कारोबार कभी व्यक्ति या समुदाय के खिलाफ नहीं होता. वह देश के खिलाफ होता है. यह देश को फिर से एक बंटवारे की तरफ धकेलने की साजिश है, जिसका दूरगामी परिणाम बहुत भयानक होगा.

#हिंदुस्तानकीकहानीकृष्ण कांत

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