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उधर “अ” संतुष्ट इधर संतुष्ट

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शशिकांत गुप्ते

संतुष्ट बनाम “अ” संतुष्ट इस मुद्दे पर बहस तो हो नहीं सकती चर्चा जरूरी है। बहुत से लोगों की आदत होती है,जब तक मन माफिक सुविधाएं प्राप्त होती है,तबतक वे पूर्ण रूप से संतुष्ट होते हैं। सुविधाओं में जरा कमी रह जाती है,तो यही लोग असंतुष्ट होकर पहले तो दूसरे घर जाने की धमकी देते हैं। धमकी वाला शाब्दिक तीर निशाने पर लग जाए तो,अपने स्वयं के घर के कुछ हम उम्र और वरिष्ठों की मनुहार को कबूल कर लेते हैं।
यदि धमकी को तवज्जो नहीं मिली तो दूसरे घर में जाने से कोई परहेज नहीं,भलेह जिस किसी दूसरे घर जाने के पूर्व उस घर की कितनी आलोचना की हो, उस घर के लोगों के निजी जीवन पर कितने ही कटाक्ष किए हों
सियासत में दिल खिल जाते हैं रंगों में रंग मिल जाते हैं गीले शिकवे भूलकर एक दूसरे के घोर विरोधी भी गले मिल जाते हैं
उधर से इधर जाने वालों की तो हर तरह पौ बारह हो जाती है। कारण सैया भए कोतवाल तो डर काहे का यह कहावत यथार्थ में बदल जाती है। उधर रहते हुए कोई कितना भी बड़ा गुनहगार हो यहां आकर दूध का धुला हो जाता है। कारण इधर संस्कार है,संस्कृति है,आदर्श है,राष्ट्रवाद है, ना खाऊंगा ना खाने दूंगा यह स्लोगन है।
मेरे व्यंग्यकार मित्र ने मुझे कहा,उधर के भ्रष्ट लोगों को इधर लेने का सियासी मकसद उधर के लोगों से अनुभव प्राप्त करना हो सकता है।
यह अनुभव खग ही जाने खग की भाषा वाला अनुभव होता है।
इधर आने पर किसी भी तरह की जांच की जरा भी आंच तक नहीं आ सकती है।
इधर तो सभी उम्र दराज लोगों को मौन दर्शक मंडल में विराजमान कर दिया है। क्षमा करना मार्ग की जगह मौन टाइप हो गया।
इस चर्चा के बाद एक अहम और व्यवहारिक प्रश्न उपस्थित होता है। आमजन को कब महंगाई,बेरोजगारी,और अन्य मूलभूत समस्याओं से संतुष्टि मिलेगी?
कब तक आमजन “अ” संतुष्ट रहेगा?
इस सवाल का जवाब शायर शहरयार के इस शेर में प्रकट होता है
सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का
यही तो वक़्त है सूरज तिरे निकलने का
अंत में शायर शहरयार का यह शेर जरूरी है।
उम्र भर सच ही कहा सच के सिवा कुछ न कहा
अज्र क्या इस का मिलेगा ये न सोचा हम

( अज्र का अनुवाद इनाम,नतीजा)

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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