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वंचित वर्ग में प्रगतिशील सोच का अभाव है

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डॉ राजाराम

अभी तक ऐसे बहुत से उदाहरण मिले हैं कि भिखारी सड़क पर मर गए जब उनकी झोली को देखा गया तो उसमें हजारों लाखों रुपए मिले लेकिन क्योंकि भीख मांगना उनकी आदत बन गई  इसलिए वह भीख मांगते रहे और वह इसी को अपना भाग्य मान बैठे कि हमारे भाग्य में ही लिखा है वैसे ही अनुसूचित जाति के लोग आरक्षण को अपना भाग्य मान बैठे हैं और अगर इसमें कहीं भी किसी तरह की कोई आंच आती है तो वैसे ही चीखते चिल्लाते हैं जैसे किसी व्यक्ति को घर डंडों से पीटा जाए उसे जो दर्द होता है तब वह चीखता चिल्लाता है परंतु जो आरक्षण के परिधि में नहीं आते हैं उनके साथ क्या हो रहा है ? वह कहां खड़े हैं ? इस बात को ना तो उनकी खुली आंखें देख पा रही हैं ? और ना उनकी बुद्धि समझ पा रही है ?

न समझने का प्रयास कर रही है ? यही विडंबना है। अब मैं बात आरक्षण की करूंगा। संविधान निर्माताओं ने संविधान के रास्ते भारत की जनता को क्यों बांट के रखा जो सदियों से वर्ण व्यवस्था के अनुसार बंटी हुई थी और इसके बाद के शासकों ने भी उस व्यवस्था को बनाए रखा परंतु संविधान  के द्वारा क्यों बांट के रखा गया ? क्या संविधान निर्माताओं के मंसा सबको समान रखने की नहीं थी ?  उनकी मंशा क्या थी इस पर चर्चा क्यों नहीं ??जो सदियों से वंचित वर्ग था उसके लिए कम से कम संपत्ति रोजगार के साधन शिक्षा कृषि भूमि इत्यादि के लिए विशेष अभियान क्यों नहीं चलाया गया ? क्योंकि यह मेहनत कश जनता थी। 

संविधान के अनुच्छेद 19 के द्वारा स्वतंत्रता के नाम पर व्यक्ति को स्वतंत्रता तो दी नहीं परंतु धर्म और संपत्ति को खुली छूट दे दी खुली आजादी दे दी ताकि  सदियों से जिनके पास संपत्ति थी धर्म पर अधिकार था  उन्हीं को आरक्षित कर दी, खुली छूट दे दी स्वतंत्रता के नाम पर और संविधान निर्माता यहीं नहीं रुके उन्होंने अनुच्छेद 25 26 27 28 और 31 के द्वारा पुनः आरक्षित कर दी यह विशेष वर्ग और जातियों के लिए आरक्षण ही है संविधान के नाम पर संविधान के रास्ते क्योंकि इसे गरीब जनता के हित में न बांटा गया न सोचा गया। अनुच्छेद 32 का का उपयोग अमीर आदमी कर सकता है जिसकी हिम्मत होगी सुप्रीम कोर्ट जाने की और वकीलों को 25 से 50 60 70 लाख फीस देने की ? क्या गरीब नया लिफाफा अपने मूल अधिकारों के उल्लंघन की लड़ाई लड़ पाएगा ??? इस अनुच्छेद की शक्तियां नीचे के कोर्ट में भी होनी चाहिए थी , जैसा कि उसमें प्रावधान है परंतु यह नहीं किया क्यों ? यदि ऐसा होता तो गरीब आदमी को भी न्याय मिलने में आसानी होती।। पीपल का पेड़ भी आरक्षित हो गया, क्योंकि जहां पर भी रास्ते पर है वहां धीरे-धीरे मंदिर बन जाता है, और रोजी-रोटी का साधन बन जाता है, पुजारियों के नाम पर पूजा के नाम पर…. नदियों के घाट पर, धार्मिक स्थलों के संगठन के नाम पर पूर्ण आरक्षण है जाति विशेष का ??? देश की आजादी से पहले कांग्रेस घोषणा करती थी अपनी मीटिंग में के कारखानों का खनिज संपदाओं का राष्ट्रीयकरण होगा

आदिवासी जो आदि स्वामी हैं उनकी संपत्ति उनके पास रहेगी परंतु सत्ता हस्तांतरण के बाद ऐसा नहीं हुआ फिर भी लोगों को भड़काने के लिए छोटे से आरक्षण थोड़ी इतना हो हल्ला और सुप्रीम कोर्ट भी परेशान है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट देश के लिए अपना कोई उत्तरदायित्व नहीं समझता अन्यथा ऐसा नहीं होता। संविधान में मूल अधिकार वास्तविक मूल अधिकारों की परिभाषा में नहीं आते हैं लेकिन हमारी न्यायपालिका ने कभी इस पर कुछ नहीं कहा खामोश रही जबकि यह राज्य के कानून हैं अन्य कानूनों की तरह और नाम दे दिया मूल अधिकार ??? परंतु इसके दर्शन में मूल अधिकार नहीं है। राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत संविधान की तीसरी सूची अर्थात मूल अधिकारों की सूची में क्यों नहीं रखे गए ??? इस पर ना तो आरक्षित वर्ग ने कभी अपनी खोपड़ी में यह बात घुसाई और ना ही किसी अन्य बुद्धिजीवी ने ??? जबकि संविधान सभा की डिबेट में इस पर बहुत जोर दिया गया था कि यह मूल अधिकार होने चाहिए ,अन्यथा इस देश के गरीबों को भूखे नंगे लोगों को मजदूरों को भूमिहीनों को कुछ नहीं मिलेगा इस संविधान के रास्ते। आरक्षित वर्ग को भी सही तरीके से ऐतिहासिक तरीके से इस लड़ाई को लड़ना चाहिए ताकि मामला हमेशा के लिए समाप्त हो जाए   समाधान हो जाए अंतिम समाधान हो जाए….
*डॉ राजाराम*

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