अग्नि आलोक

*गया का धनगाई गांव का शायद ही कोई ऐसा घर हो, जिसने कभी न कभी नक्सलियों की मदद न की हो*

Share

देवराज और बृजम पांडे के साथ)

गया : धनगाई गांव का शायद ही कोई ऐसा घर हो, जिसने कभी न कभी नक्सलियों की मदद न की हो. कभी जबरन, तो कभी मजबूरी में. कभी उन्हें आश्रय दिया, तो कभी उनकी जन अदालतों में पहुंचे. धनगाई मध्य बिहार के गया जिले के घने जंगलों में स्थित है. सालों तक यहां पर ‘लाल’ विद्रोहियों का कब्जा रहा है. पर अब परिस्थितियां बदल गई हैं.

ग्रामीण, युवा और बुजुर्ग उन दिनों को याद करते हैं कि कैसे नक्सली यहां झुंड में आते थे और पास की घेरा पहाड़ियों से नीचे उतरते थे. ये पहाड़ियां धनगाई गांव को झारखंड से अलग करती हैं. पक्की संकरी सड़क गांव पर समाप्त होती है और विकास भी. यहां बनी एक कच्ची सड़क राज्य की राजधानी पटना से लगभग 150 किलोमीटर दक्षिण में स्थित इस गांव के चारों ओर मौजूद पहाड़ियों की ओर ले जाती हैं.

धनगाई गांव की ओर जाती कच्ची सड़कें

नक्सली अपनी ‘जन अदालतों’ में आदेश पारित करते थे. स्कूलों पर कब्जा कर लेते थे. स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस पर काले झंडे फहराते थे. किसी भी तरह से उन्हें यह दिखाना था कि इस एरिया पर नक्सलियों का कब्जा है. अब हालात बदल गए हैं. केंद्र की नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार मार्च 2026 तक भारत को नक्सलवाद से मुक्त करने के लिए एक बड़े अभियान पर काम कर रही है. ऐसा लगता है कि धनगाई भी उस ‘दहशत’ से बाहर आ रहा है.

यहां के निवासी अपने अतीत के बारे में बात करने का साहस जुटाते हुए अपने भविष्य को लेकर आशा और संशय व्यक्त कर रहे हैं. खासकर ऐसे समय में जब राज्य में चुनाव बस कुछ ही दिन दूर है. उल्लेखनीय है कि बाराचट्टी निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले धनगाई में दूसरे चरण के दौरान 11 नवंबर को विधानसभा चुनाव के लिए वोटिंग होनी है.

यहां मौजूद हायर सेकेंड्री स्कूल इस बात के संकेतों में एक है कि यहां सरकार की मौजूदगी है. साथ ही यह स्कूल एक ऐसी जगह पर बनाई गई है, जहां निवासी खेतों में दिन भर की मेहनत के बाद इकट्ठा होते हैं. परिसर नक्सली कंगारू अदालतों की यादें ताजा करती हैं. ग्रामीण याद करते हैं कि कैसे उन्हें नक्सली हुक्मों की अवहेलना करने पर ‘जन अदालत’ में सताया जताया था. इसके चलते उनके बच्चे शिक्षा से वंचित रहे.

धनगाई गांव स्थित हायर सेकेंड्री स्कूल

गांव में सम्मानित सीपीआई एमएल नेता श्याम बिहारी सिंह का दावा है कि उन्हें नक्सलियों द्वारा बुलाई गई ऐसी कई ‘अदालतों’ की अध्यक्षता करने के लिए मजबूर किया गया था. श्याम सिंह ने ईटीवी भारत की टीम से बात करते हुए कहा, “मैं भूल गया हूं कि मैंने अपनी इच्छा के विरुद्ध कितनी ‘जन अदालतों’ की अध्यक्षता की थी. ‘आरोपियों’ को मौत सहित कई तरह की सजाएं दी गईं. मैंने इस प्रथा का विरोध किया और गांव वालों को बोलने के लिए प्रोत्साहित किया, लेकिन भारी हथियारों से लैस नक्सलियों को देखकर वे ऐसा करने से डर रहे थे.”

सफेद कुर्ता पायजामा पहने सीपीआई (एमएल) नेता श्याम बिहारी कैमरे की तरफ देखते हुए (

उन्होंने बताया कि नक्सल कमांडर किसी व्यक्ति की बेगुनाही के स्पष्ट सबूत होने के बावजूद उन्हें अपनी मर्जी से सजा सुनाते थे. श्याम ने जोर देकर कहा कि नक्सलवाद को करारा झटका लगा है और अब धनगाई में यह कोई मुद्दा नहीं रहा. उनका दावा है कि नक्लसियों के फॉलोवर्स सीमित हैं, जो उनकी विचारधारा के बारे में बात करते हैं. हालांकि, ज़्यादातर लोग निजी दुश्मनी, प्रतिद्वंद्विता, अपने परिवार और घर से भाग जाने के बाद हथियार उठाते हैं.

उन्होंने वामपंथी उग्रवादी आंदोलन के टॉप नेताओं में से एक माने जाने वाले 64 साल के नक्सल विचारक विजय कुमार आर्य के प्रति भी अपनी प्रशंसा व्यक्त की. इकोनोमिक्स में पोस्ट ग्रेजुएट आर्य ने माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (MCCI) में शामिल होने से पहले कुछ समय के लिए सहायक प्रोफेसर के रूप में काम किया था.

अंडरग्राउंड होने से पहले आर्य कई नक्सली समूहों के एक प्रमुख संगठन सीपीआई (माओवादी) का हिस्सा बन गए. 2022 में रोहतास जिले के समाहुता गांव में अपनी गिरफ्तारी से पहले तक वह बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और अविभाजित आंध्र प्रदेश में सक्रिय रहे. आर्य वर्तमान में पटना के बेउर केंद्रीय कारागार में बंद हैं और उन पर बिहार में हिंसा और विध्वंसकारी गतिविधियों की विभिन्न घटनाओं से संबंधित लगभग 14 मामले दर्ज हैं. इसके अलावा उनके खिलाफ उत्तर प्रदेश, झारखंड और आंध्र प्रदेश में कुछ अन्य मामले भी दर्ज हैं.

धनगाई स्कूल के मैदान में खेलते युवा

जैसे-जैसे दिन ढलता गया और भी ग्रामीण इकट्ठा होते गए और श्याम सिंह नक्सलियों के सामूहिक आत्मसमर्पण की वकालत करते हुए अतीत की कहानी सुनाते रहे. उन्होंने कहा, “उनके लिए (नक्सली) हथियार डाल देना ही अच्छा होगा. वरना बेवजह लोग मरते रहेंगे और समाज नहीं बदलेगा.”

श्याम मौजूदा सरकार को लेकर कम आशावादी दिखे और उन्होंने कहा कि नए चेहरों को लाने के लिए हर कुछ सालों में सत्ता परिवर्तन होना चाहिए. उन्होंने कहा, “मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य में कुछ विकास किया है, लेकिन उनके आसपास भ्रष्ट, बाहुबली और गुंडे-बदमाश लोग हैं. मुझे नहीं लगता कि प्रशांत किशोर की नई पार्टी भी कुछ खास कर पाएगी, लेकिन बदलाव तो होना ही चाहिए.”

24 वर्षीय ग्रेजुएट अरविंद कुमार ने बताया, “करीब छह साल पहले तक हम स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस नहीं मना पाते थे. यहां तक कि स्कूल में भी कोई समारोह नहीं होता था, क्योंकि नक्सली वहां काला झंडा फहरा देते थे. अब हालात बदल गए हैं. पास में ही एक पुलिस थाना और एक सिक्योरिटी कैंप स्थापित किया गया है.”

सीपीआई माले नेता श्याम बिहारी और ग्रामीण (

ग्रामीणों को उम्मीद है कि आगामी चुनाव, 2024 में हुए लोकसभा चुनावों के बाद से उनके लिए दूसरा ‘सामान्य’ मतदान होगा. दशकों से बंदूक के साये में चुनाव कराना और मतदान करना इलाके के सभी लोगों के लिए एक कठिन परीक्षा रही है. पहले वामपंथी उग्रवादी चुनावों का बहिष्कार करने का आह्वान करते थे, सुरक्षा बल बाहरी लोगों को अंदर जाने से रोकते थे, मतदान केंद्रों को अति-संवेदनशील घोषित कर दिया जाता था और चुनाव कर्मियों को सुरक्षित रूप से क्षेत्र से बाहर निकलने का मौका देने के लिए दोपहर 3 बजे तक मतदान समाप्त कर दिया जाता था.

इस बार चुनाव आयोग ने फैसला किया है कि बाराचट्टी के 36 मतदान केंद्रों पर, जिनमें गांव का एक मतदान केंद्र भी शामिल है, सुबह 7 बजे से शाम 4 बजे तक मतदान होगा, जबकि अन्य जगहों पर इसका समय सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक होगा.

संयोग से नक्सलियों ने गांव के गवर्नमेंट हायर सेकेंड्री स्कूल के एक हिस्से को उड़ा दिया था, क्योंकि यह मतदान केंद्र था और चुनाव के दौरान सुरक्षा बल इसे आवास के रूप में भी इस्तेमाल करते थे. विस्फोट के बाद बिखरे ईंटों और कंक्रीट के ढेर नक्सली आतंक की याद दिलाते थे और स्थानीय लोगों में भय का माहौल पैदा करते थे.

इस बीच चुनाव के बाद विकास या बेहतर भविष्य पर चर्चा स्वाभाविक रूप से नक्सली खतरे और राजनेताओं द्वारा पूरे न किए गए वादों को अपने साथ जोड़ लेती है. हालांकि खतरे को कम करने के लिए बहुत कुछ किया गया है, फिर भी गांव उग्रवादियों का गढ़ बना हुआ है. यहां के लोग जानते हैं कि मुसीबत अभी भी आस-पास ही है.

एक बुज़ुर्ग निवासी तुलसी साओ ने बताया, “वे (नक्सली) अभी भी पहाड़ियों में हैं. हम नहीं जानते कि वे क्या सोच रहे हैं या क्या कर रहे हैं, लेकिन वे वहां हैं. हम उनसे कभी कुछ नहीं पूछते, न ही हमें उनकी गतिविधियों में कोई दिलचस्पी है.”

रसोई और खेत दोनों संभालने वाली लखमनी देवी याद करती हैं कि कैसे अक्सर नक्सलियों के झुंड गांव में आते थे और खाना मांगते थे. उन्होंने कहा, “हर घर में एक व्यक्ति (नक्सली) के लिए खाना बनता था. वे खाना खाते और चले जाते थे. कई बार वे पुलिस मुखबिर या किसी अन्य गलत काम के शक में लोगों को भी उठा ले जाते थे.”

हालांकि, तुलसी और लखमनी दोनों ही आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर उत्साहित नहीं थे. तुलसी ने कहा, “अगर हमें मौका मिला तो हम वोट देंगे, लेकिन हमारी इसमें कोई खास दिलचस्पी नहीं है. हमें इससे कुछ नहीं मिलता. हमारे विधायक पिछले पांच सालों में एक बार भी इस गांव में नहीं आए हैं.”

ईटीवी भारत द्वारा विकास कार्यों या उनके अभावों और आगामी चुनावों के बारे में पूछे जाने पर एक ग्रामीण ने मुस्कुराते हुए कहा, “पिछले चुनावों के बाद से कोई विधायक यहां नहीं आया है. उन्होंने वोट मांगा, हमने वोट दिया और बस.”

बाराचट्टी विधानसभा क्षेत्र में आने वाला यह गांव अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित है. हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) की ज्योति देवी बाराचट्टी से वर्तमान विधायक हैं. वह पार्टी के संस्थापक और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी की रिश्तेदार हैं और इस बार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रही हैं.

ग्रामीणों द्वारा लगाए गए इस आरोप के जवाब में कि वह कभी उनसे मिलने नहीं गईं ज्योति ने कहा, “मैं कई बार कार्यक्रमों में शामिल होने उस इलाके में गई हूं. मेरे ‘बड़े साहब’ (जीतन राम मांझी) भी वहां गए थे. उनके निमंत्रण पर मैं धनगाई में भी कुछ कार्यक्रमों में शामिल हुई हूं. सच्चाई यह है कि मेरे इलाके में किए गए तमाम अच्छे कामों के बावजूद कुछ लोग हमेशा मुझमें कमियां निकालते रहते हैं.”

नक्सलियों के बारे में बात करते हुए मौजूदा विधायक ने जोर देकर कहा कि उनके दिन अब लद गए हैं और उनका सफाया हो चुका है. ज्योति ने कहा कि अगर वह चुनाव जीतती हैं, तो वह अपने निर्वाचन क्षेत्र में सड़कों और छोटे पुलों सहित बुनियादी ढांचागत सुविधाओं को बेहतर बनाने पर ध्यान केंद्रित करेंगी.

आधिकारिक तौर पर गृह मंत्रालय द्वारा निर्धारित बिहार में कोई भी नक्सल प्रभावित जिला नहीं है. हालांकि, गया और अन्य नक्सल प्रभावित जिलों में विधानसभा चुनाव सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए पुलिस कोई कसर नहीं छोड़ रही है.

मगध रेंज के पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) क्षत्रनील सिंह के अधिकार क्षेत्र में गया, नवादा, औरंगाबाद, जहानाबाद और अरवल आता है. उनका कहना है तैयारियां मोटे तौर पर 2024 के लोकसभा चुनावों जैसी ही हैं.

क्षत्रनिल ने कहा, “इस बार अतिरिक्त मतदान केंद्र बनाए गए हैं और कई गांवों के मतदाताओं को वोट डालने के लिए दूर-दराज के इलाकों में नहीं जाना पड़ेगा. हाल ही में कोई नक्सली हिंसा नहीं हुई है, लेकिन हम कोई जोखिम नहीं उठा रहे हैं. बाराचट्टी समेत हर विधानसभा क्षेत्र में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) की दो कंपनियां तैनात की गई हैं. ये कंपनियां पहले से मौजूद बलों के अलावा हैं और आम लोगों में विश्वास जगाने के लिए फ्लैग मार्च कर रही हैं.”

धनगाई के लिए चुनावों से पहले का माहौल सुस्त है. लोगों को अतीत की यादें अभी भी सता रही हैं और विकास का कोई भी वादा दूर की कौड़ी लगता है. गांव वाले नक्सलियों के गढ़ होने का ठप्पा हटाने के लिए हर चीज करेंगे. वे वोट देंगे, अपने नेता चुनेंगे, उम्मीदें बांधेंगे और फिर दुआ करेंगे कि एक बार उनकी उम्मीदें हकीकत में बदल जाएं.

Exit mobile version