शशिकांत गुप्ते
सीतारामजी ने मुझ से पूछा राम भगवान किसके हैं?
मैने कहा यह कैसा सवाल है,यदि भगवान है तो वे सभी के हैं। सर्वत्र व्याप्त है। सन 1963 में एक फिल्म भी प्रदर्शित हुई है ने कण कण में भगवान
सीतारामजी ने कहा आप तो घूम फिर कर फ़िल्मों पर ही आ जाते हो।
मै ने कहा,पचास और साठ के दशक में धार्मिक फिल्में सिर्फ मार्ग दर्शक मंडल में प्रवेश करने की पात्रता के लिए निश्चित की गई, आयु वर्ग के लोगों के लिए और अबोध बालको को ही दिखाई जाती थी।
युवा और मध्यम आयु वर्ग लोग प्यार मोहब्बत की फिल्में देखने के लिए सुपात्र होते थे।
सीतारामजी ने मुझ से कहा विषयांतर हो रहा है। अपनी चर्चा का मुद्दा है,राम भगवान किसके हैं?
मैने कहा विषयांतर नहीं हो रहा है,मै यह कहने की कोशिश कर रहा हूं कि, समयानुसार राम भगवान का लोग अपने स्वार्थ के लिए चयन कर लेते हैं।
संत कबीर साहब ने अपने निम्न दोहे में राम नाम के चयन को बेबाक तरीके से स्पष्ट किया है।
राम राम सब कोई कहे, ठग ठाकुर और चोर
जिस राम से मीरा ध्रुव और प्रहलाद तरे,वह राम कोई और।।
राम तो भील समाज स्त्री के हैं।
शबरी स्वयं कहती है।
अधम ते अधम अधम अति नारी।
तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी॥
राम भगवान ने वन्य प्राणियों से मित्रता कर सेना बनाई।
राम भगवान की वचन बद्धता को तुलसीबाबा ने निम्न चौपाई में स्पष्ट रूप से कहा है।
रघुकुल रीत सदा चली आई
प्राण जाए पर वचन न जाई
मैने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, राम की मूर्ति,राम के चित्र की पूजा तो एक परंपरा है।
वास्तव में रामजी के चरित्र की पूजा होनी चाहिए। रामजी के चरित्र को आत्मसात करने का प्रयास करना चाहिए।
राम भगवान ने अपने वचन को निभाने के लिए, राजपाट को त्याग,राज महल को छोड़, कानन में पांच वृक्षों की कुटिया में निवास किया।
समाजवादी चिंतक,विचारक,
स्वतंत्रता सैनानी डॉ. राम मनोहर लोहियाजी राम, कृष्ण और शिव नामक लेख में लिखा है,राम जैसी मर्यादा ग्रहण करना,कृष्ण जैसा हृदय होना चाहिए, कृष्ण भगवान अपने भक्त अर्जुन के रथ के सारथी बने थे। यहां सारथी का मतलब संरक्षक बन थे।
भगवान शिव जैसा मस्तिष्क होना चाहिए,मतलब सहिष्णुता होनी चाहिए। शिव भगवान सर्वहारा लोगों के भगवान हैं।
सभी संतों ने विचारकों ने चिंतकों ने राम के चरित्र पर ध्यान केंद्रित किया है। इसीलिए भगवान उसके हैं, जो रामजी के व्यापक स्वरूप को जानने की कोशिश करता है।व्यापक स्वरूप को मतलब विशाल रूप को पहचानने की कोशिश करता है, जो राम भगवान को मूर्ति और चित्र की परिधि में नहीं जकड़ा कर रखता है।
राम भगवान उसके हैं,जिसकी कथनी,करनी में अंतर नहीं होता है।
सीतारामजी मुझे रोकते हुए कहा बस यहीं पर अपने व्याख्यान को विराम दीजिए। आपके उद्बोधन को जो भी सुनेगा,या पढ़ेगा उसे स्पष्ट रूप से समझ में आ जाएगा कि, वास्तव में राम भगवान किसके हैं। समझदार को संकेत ही पर्याप्त होता है। राम राम जी।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

