Site icon अग्नि आलोक

इनकी किताब में वफा का नाम नहीं

Share

शशिकांत गुप्ते

दौरान चुनाव के घोषणाओं के पिटारे से असंख्य वादें निकलतें हैं।
वादों के विज्ञापन का प्रस्तुति करण इतना उम्दा होता है, मानों सियासतदान वादें नहीं कर रहे हैं,बल्कि मतदाताओं को तोहफा देने वाले हैं।
इस वादे रूपी तोहफ़े का नतीजा शायर अली सरमद रचित निम्न शेर की तरह होता है।
कितना चालाक है वो यार-ए-सितमगर देखो
उस ने तोहफ़े में घड़ी दी है मगर वक़्त नहीं

वादों को मतदाताओं के समक्ष प्रस्तुत करने में सभी दलों में प्रतिस्पर्धा हो होती है।
सियासीवादे देख,सुन और पढ़कर,फिल्मी गाने की इन पंक्तियों का स्मरण होता है।
तू कहे तो आसमाँ से चाँद-तारे ले आऊँ
हसीं जवान और दिलकश नज़ारे ले आऊँ

चुनाव के नतीजों के बाद,सत्ता में विराजमान होते ही आमजन की स्थिति क्या होती है। यह यथार्थ शायर अमीर क़ज़लबाश के इस शेर में प्रकट होता है।
न जाने कैसा मसीहा था चाहता क्या था
तमाम शहर को बीमार देख कर ख़ुश था

आज यही सब तो हो रहा है। मूलभूत समस्याओं को तो हाशिए पर रख दिया गया है।
इसीलिए इनदिनों चुनाव में समस्याओं पर दुर्लक्ष कर राजनैतिक दल एक दूसरे की छीछालेदारी करने में देश का कीमती समय और ऊर्जा जाया कर रहें हैं।
देश के संविधान ने देश की जनता को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हक दिया है। लेकिन वर्तमान में देश की जनता का जो बेहाल है।
इस बेहाल पर शायर अमीर क़ज़लबाश का यह शेर मौजू है।
उसी का शहर वही मुद्दई वही मुंसिफ़
हमें यक़ीं था हमारा क़ुसूर निकलेगा

इस शेर का अर्थ सिर्फ एक वाक्य में समझना हाेतो इस कहावत को दोहरा दो।
उल्टा चोर कोतवाल को डांटे
उपर्युक्त कथन के बावजूद यह ध्यान में रखना अनिवार्य है,जो शायर परवेज अख़्तर इस शेर में फरमाते हैं।
सारे पत्थर नहीं होते हैं मलामत का निशाँ
(मलामत=निंदा या भर्त्सना)
वो भी पत्थर है जो मंज़िल का निशाँ देता है

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Exit mobile version