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भक्ति में है शक्ति

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शशिकांत गुप्ते

अपने देश में भक्तों की भरमार है। देशवासी विभिन्न तरह की भक्ति में लीन है। कोई मूर्तिपूजक है। कोई निराकार को पूजता है। कोई आराधना करता है। कोई इबादद करता है।
गुज़रूँ मैं इधर से कभी, गुज़रूँ मैं उधर से
मिलता है हर इक रासता, जा कर तेरे दर से

यह तो हुई दार्शनिक बातें हैं।
भक्ति शब्द का उच्चारण करने के पूर्व भक्ति किसे कहतें हैं, समझना जरूरी है। राष्ट्र और परिवार को भी गहराई से समझने की आवश्यकता है।
आध्यत्मिक संतों ने कहा है कि, पारिवारिक जिम्मेदारी को दायित्व समझकर निभाना ही मानवीय गुण है। पारिवारिक उत्तरदायित्व को छोड़ कर भक्ति की बात करना मतलब भक्ति करने का स्वांग रचने जैसा है।
इतिहास साक्षी है। संतों की लंबी फेरहिस्त मिलेगी जिन्होंने अपने परिवार के प्रति अपने कर्तव्य को अपना दायित्व समझकर पूरा किया है।
परिवार को व्यापक स्वरूप में समझना चाहिए। जब हम वसुधैवकुटुम्बकम की धारणा को मूर्तरूप देने की संकल्पना को साकार करने का प्रयास करतें हैं,तब हमें अपने देश को ही एक वृहद परिवार समझना चाहिए।
भक्ति को गहराई से समझने वाला कभी भी अपने परिवारों पर संकट आने नहीं देगा। आज एक ओर राष्ट्रभक्ति की बातें की जा रही हैं, और दूसरी ओर राष्ट्र में अपने परिवार के दायित्व को स्वीकारने के लिए जो युवा रोजगार प्राप्त करने के लिए प्रतीक्षा कर रहें वे रोजगार के बदले प्रताड़ना झेल रहें हैं।
राष्ट्र में अस्सी करोड़ लोग मुफ्त राशन प्राप्त व्यवस्था पर अवलंबित हैं। यह राष्ट्र के लिए बड़ी चुनौती है? राष्ट्र के नागरिकों को स्वावलंबी बनाने की जिम्मेदारी का निर्वाह सिर्फ विज्ञापनों के माध्यम से हो रहा है।
यथार्थ में झांकने की चेष्ठा करना जोख़िम का कार्य हो गया है।
महंगाई पर प्रश्न करना मतलब काटने वाली मधुमखियों के छत्ते पर कंकर मारने जैसा हो गया है।
महंगाई भी तो राष्ट्र के परिवारों के आर्थिक संकट में इज़ाफ़ा ही कर रही है। कागजो पर राष्ट्र के आमजन की आय को बढ़ता हुआ दर्शाया जा रहा है?
राष्ट्र भक्ति की दुहाई देने वाले विरोधियों पर परिवारवाद का आरोप लगाते हैं। लगाना लाजमी भी है। एक उंगली दूसरें पर उठती है तो तीन स्वयं पर स्वाभाविक रूप से उठती है।
अपन भी अपने सपूतों को सियासत में अपनी विरासत का वारिस बना रहें हैं।
यदि सपूत योग्य है,तो यह आलोचना का विषय कदापि नहीं है?
उपर्युक्त भक्ति की बातें तो व्यवहारिक तौर पर हुई है।
एक संत हुए हैं दादू दयाल। यह पिंजरे थे। इनके उपदेशक दोहे प्रसिद्ध हैं।
उक्त मुद्दे के संदर्भ में एक दोहा प्रासंगिक होगा।
भक्ति भक्ति सब कोई कहे
भक्ति न जाने कोई
दादू भक्ति भगवंत की
देह निरंतर होई

जो भक्ति अंतर्मन से निरंतर होती है,वह भक्ति कहलाती है।
अंतर्मन से तात्पर्य शुद्ध अंतःकरण से की जाने वाली भक्ति।
एक व्यवहारिक सवाल उपस्थित होता है? शुद्ध अंतःकरण का मापदंड कैसा हो सकता है?
हाल ही में एक खबर चर्चा का विषय बनी हुई है,कुपोषण की जाँच के लिए व्यवस्था के पास जो वजन तौलने की मशीन होती है वही नदारद है?
गुजरात के प्रख्यात संत नरसिंह मेहता का भजन है। यह भजन गांधीजी का प्रिय भजन है।
वैष्णव जन तो तेने कहिये,
जे पीड परायी जाणे रे ।
पर दुःखे उपकार करे तो ये,
मन अभिमान न आणे रे ॥

भजन की उक्त पंक्तियों का भावार्थ अपने देश के धन कुबेर, दानवीर बखूबी प्रकट कर रहें हैं।
दान को गुप्त तरीके से मंदिरों की दान पेटियों में भेंट स्वरूप प्रदान कर रहें हैं। यह भी भक्ति का ही तो एक तरीका है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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