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*हमारे जेब में नेपाल की आग थी* 

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चंचल भू

     नेपाल जेल से छूट कर जब दिल्ली वापसी के लिए प्लेन में सवार हुआ तब ख़याल आया कि हमारी जेब में एक नेपाली आंदोलनकर्मी युवा ने कुछ डाल दिया था , इस हिदायत के साथ कि भारत के अख़बारों में इसे दे देना । जेब में हाथ डाला तो दो फ़ोटो रील निकली । उसे लेकर कर हम दिल्ली पहुँचे । रील धुलवायें कहाँ , और उसमें है क्या ? यह सवाल दिन भर घेरे रहा । रील धुलवाने और प्रिंट निकलवाने के लिए हमारे खीसे में दमड़ी तक नहीं थी । हम वेस्टर्न कोर्ट के  लान में बैठे बैठे जुगत का जुगाड़ सोच ही रहे  थे कि इतने हमारे एक पुराने युवजनसभाई मित्र ललित गौतम दिखाई पड़ गए । वे अपनी फ़ीयट कार सड़क किनारे लगा रहे  थे । ललित जी से हम दिल्ली विश्वविद्यालय के क्रांतिकारी समाजवादी साथ प्रो राजकुमार जैन के साथ मिल चुका था । 

    हम उठ कर ललित जी के पास गए । हमे देखते ही वे चहक उठे , और नेपाल से कब कैसे छूटे वगैरह से बात शुरू हुई । फिर बोले – चलो  मोहन सिंह में बैठ कर काफ़ी पीते हैं । काफ़ी पीने के दौरान  हमने उन्हें रील के बाबत बात  बतायी । ललित जी हमे लेकर पहाड़ गंज अपने एक परिचित सरदार जी स्टूडियो वाले के पास ले गए । सरदार जी बहुत मस्त मौला  लगे । जैसा कि सरदार होते हैं । 

    – लो जी ! चाय पियो ! जब तक चाय पिओगे रील धूल जायेगी । और वही हुआ । रील ही नहीं धुली उसका कांटैक्ट प्रिंट भी निकलवा दिया । डार्क रुम से निकलते ही सरदार जी लगभग चीखते हुए बोले – अजी ! ये कित्थे खींचा ? बहुत खरनाक प्रिंट है । हम तीनों ने एक एक प्रिंट देखा । नेपाल की बर्बर पुलिस किस तरह गोली चला रही है , किस  तरह लाशों को  बोरे में ठूँस रही है वगैरह वगैरह । ललित जी मजाक किया – किस बोरे में तुम हो चंचल ! फिर सरदार जी से हमारा परिचय कराया । – अभी यह नेपाल से  छूट कर आए हैं । यह उसी नेपाल की फ़ोटो है । 

    वहाँ से हम वेस्टर्न कोर्ट आए । उन दिनों समाजवादी नेता लाड़ली मोहन निगम वेस्टर्न कोर्ट में रहते थे , रात हमे वहीं  गुजारनी थी । हमारे दिमाग़ में वह रील घूमती रही । किस अख़बार को दिया   जाय ? उस समय तक लिखते – पढ़ते हम कई नामी संपादकों के प्रिय बन चुके थे । धर्मयुग के डॉ धर्मवीर भारती जी , साप्ताहिक हिन्दुस्तान के संपादक मनोहर श्याम जोशी जी , दिनमान के संपादक रघुवीर सहाय जी , सारिका के कन्हैया लाल नंदन / अवधनारायण मुद्गल जी ।  इसी सोच में उलझा रहा । फिर लगा कि नेपाल में सबसे लोकप्रिय पत्रिका “ दिनमान “ मानी जाती थी और उसका सर्कुलेशन नेपाल में खूब था । पैसा कम मिलता था लेकिन क्रेडिट बहुत थी । धुरंधर पत्रकार भी दिनमान में छपने को आतुर रहते थे । हमने सबसे पहले रघुवीर सहाय जी फ़ोन किया और पूरा हाल तफ़सील से बताया । सहाय जी ने कहा किसी और से उसका जिक्र मत करना सीधे हमारे घर आ जाओ । उन दिनों सहाय जी साकेत में रहते थे । खोजते खाजते हम साकेत पहुँचे । सहाय जी बरामदे में ही बैठे मिल गए । पहले उन्होंने प्रिंट देखा , फिर फ़िल्म की निगेटिव मागें , बोले आज शाम तक स्टोरी लिख दो लेकिन किसी को मालूम न हो दिनमान के छपने तक । 

    उन दिनों छपास की प्यास ज़्यादा थी , दोपहर तक हमने स्टोरी तैयार कर दिया और भागा भागा 10 दरियागंज ( दिनमान का दफ्तर वहीं था ) पहुँचा । सहाय जी को स्टोरी दे दी । अगले ही अंक में नेपाल की लीड स्टोरी बना । लिखे का कम लेकिन फ़ोटो का हिसाब अच्छा मिला । 

अब हमारी जेब में नकद था लेकिन इतना भी नहीं कि हम इस पैसे से बनारस वापस पहुँच  सकें । 

      जहाज के टिकट का जुगाड़ भी एक कथा है । लेकिन इससे बड़ी कथा बनारस में “ आज “अख़बार के दफ़्तर में सुलग रही थी , जहाँ से “ अवकाश “ पत्रिका निकली शुरू हुई थी और हम अवकाश में मुलाजिम थे । इसी अवकाश ने हमे नेपाल आने जाने का खर्च दिया था । था सब अगली बार । 

जारी

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