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ये प्रेमिकाएँ…!

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 आरती शर्मा 

प्रेमिकाएँ तकलीफ़देह थीं। जब-जब उन्हें मजबूरन छोड़कर जाना पड़ा, तब-तब वे सिर्फ़ मजबूर लगीं।   

      जब-जब उन्होंने आँखों के सामने ही दूसरा पुरुष चुन लिया, तब-तब वे सिर्फ़ नीच लगीं।

    जब-जब हमेशा के लिए साथ रह गईं तो सिर्फ़ प्रेमिका नहीं रह गईं। पीड़ा और रिक्तता हर हाल में मिली।

     इस ‘सिर्फ़’ सोच के चलते किसी प्रेमिका को मज़बूत मानकर मुनादी पीटना क़ायदे से मुश्किल है। 

लड़कियाँ जो दोस्त थीं, उनसे कभी कुछ मिलता नहीं था। वे लंबी ताक के बावजूद तैयार नहीं मिलीं। जो तैयार हो भी गईं; वे भी आँसू, बेचारगी और पलायन के दुविधा-लेप से लेपित थीं। कुछ तो आगे दोस्ती ही नहीं रख पाईं। 

       कुछ लड़कियाँ ऐसी भी थीं जिन्होंने व्यवस्था की सख़्त गुंजाइशों में अपनी नरम देह और शापित बुद्धि को सामाग्रियों की तरह व्यवस्थित किया।

     वे व्यवस्था के उपकरणों की तरह ही हिंसक मिलीं। ऐसे उपकरणों से हमेशा वितृष्णा हुई। 

पत्नियाँ अपने होने की छाया भर थीं। उनको हर वक़्त ओझाई की ज़रूरत थी। वे या तो अभुआती थीं या तो अगरबत्ती की तरह जल जाती थीं। वे सुविधापूर्ण तरीक़े से स्तुत्य और हीन दोनों थीं। 

     माँएँ पोषक थीं। वे हमेशा पोषक लगीं। वे कमज़ोर हैं या मज़बूत, यह समझ के परे था; क्योंकि उनके पास पोषित करने के लिए हमेशा कुछ था। माँओं ने बच्चों को बेहतर बनाने की कोशिश की।

      वे सूखी लकड़ी की तरह जलीं। कुछ माँएँ पूर्ण शिकस्त थीं। उन्होंने बच्चों को शिकारी की चाल सिखाई। 

बहनें जो छोटी थीं, हमेशा छोटी रहीं और जो बड़ी थीं, वे बड़ी रहीं हमेशा। बहनों के बराबर होने के लिए कुछ समय तक झुकना पड़ता। झुकना असह्य था। 

    सब बराबर होने की राह में रीढ़ की कई पीढ़ी के अकड़न का रोग खड़ा था। 

     अंततः नायिकाएँ मिलीं। देश-काल की अगम्य दूरी के चलते वे नायिकाएँ मानी गईं। वे प्रतिमानों में स्थापित हुईं। उनके सिक्के चले। उनके क़िस्से मिले। 

     जो शब्दकार थे, उन्होंने मुक्त कंठ से उनकी स्तुतियाँ पढ़ीं। जो चित्रकार थे, उन्होंने प्रतिबद्ध होकर उनके चित्र बनाए। (चेतना विकास मिशन).

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