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ये आतताई स्त्रियां और बेचारे पुरुष 

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सुधा सिंह

एक स्त्री ऐसी भी है-
जो भाग जाती है..
पचास साल की उम्र में,
अपने किसी
अज्ञात-प्रेमी के साथ..;

पति ढूँढ़ता रहता है,
उसका ठिकाना-
शहर-दर-शहर..;
इस स्टेशन..उस स्टेशन..;
भटकते हुए..लाचार होकर..!

बीस-बीस..
पच्चीस-पच्चीस साल के
हो गए,बेटे…
अब
उसका परिचय देते हुए
पी लेते हैं-
ख़ून के घूँट..;
किसी के कुछ पूछने पर..!

चुप हो जाते हैं ..;
या
फिर कह देते हैं-
“चली गयी..;
अच्छा ही हुआ..!
घर नरक हो गया था..!”

क्या कहें-
“हाँ..!
मेरी माँ(?) ही थीं?”

एक स्त्री ऐसी भी है-
जो
ब्याह के
आठ-नौ साल बाद
ग़ायब होकर…
आकर बैठ गयी है
सामने के ही घर में..,
कुछ दिन बाद..;
पूरी निर्लज्जता..
पूरे स्वाभिमान के साथ..!

उस
क्रूर-हृदया को देखकर
छोटे-छोटे..अबोध बच्चे..
आज भी कहते हैं,आपस में..;
रोते हुए-
“अम्मा
अभी दिखीं थीं-छत पर;
फिर चलीं गयीं..!”

बाप
नाक पोंछता है..!
टट्टी-पेशाब करवाता है..!
कपड़े धुलता है..!
जानवरों को खिलाता है..!

फिर
बैठा ले जाता है,सबको-
साइकिल के कैरियर पर..!
तपती-धूप में
भट्ठे पर ईंट पाथने..!

एक स्त्री ऐसी भी है-
जो पति से
तनिक
कोई बात होने पर
देने लगती है,धमकी..;
पूरे घर को-
“ऐसा सबक़ सिखाऊँगी;
ज़िन्दगी-भर
याद रखोगे,सब लोग..!”

एक स्त्री ऐसी भी है-
जो गाली देती है,फ़ोन पर..!

मन का कुछ न होने पर
मारती है,थप्पड़..;
अपने पति-परमेश्वर को..!

एक स्त्री ऐसी भी है-
जो ससुर के साथ
मायके से
ससुराल लौटते समय
उतर जाती है..;
पानी लेने के लिये
ट्रेन से..स्टेशन पर..!

दस साल बाद
पता चलता है-
वह चली गयी थी..;
गाँव के ही
एक आदमी के साथ..;
जो बाहर रहकर कमाता है..!

एक स्त्री ऐसी भी होती है-
जो ब्याह कर घर आते ही
भाई-भाई को तोड़ने…

आँगन में
दीवार खड़ी करने में देती है,
अपना पूरा योगदान..;
हरसम्भव..;
सबसे पहले..!

एक स्त्री ऐसी भी होती है..;
सास-बहू के रूप में-
जिनके
दो पाटों के बीच पिसकर
धूल हो जाता है…
अपने मन को पत्थर करके
सब कुछ सहता
मूक-बधिर पुरुष-

“हमारे एक भी शब्द
बीच में बोल देने से
कुछ भी हो सकता है..!”

एक स्त्री ऐसी भी होती है-
जिसके
दहेज़ के झूठे
मुकदमे के कारण
हो जाता है-
पुरुष के जीवन में…
गहरा अँधेरा..,
सलाख़ों के पीछे..;
नारकीय-यन्त्रणा में
अभिशप्त होकर…!

एक स्त्री ऐसी भी है-
जो
पुरुषों की नक़ल में
उड़ाती है..,
चौराहे पर खड़ी होकर..;
सिगरेट के धुएँ के छल्ले..!

लटकी रहती है…
अपनी बारी के इंतज़ार में..;
बियर-शॉप के काउण्टर पर..!

एक स्त्री ऐसी भी है-
जो लेती है..
अपने
दुधमुँहे-शिशु के साथ-सेल्फ़ी..;
फिर दबा देती है-गला..;
पूरी नृशंसता से..!

हाँ..! सच है..!

और पुरुष?

पुरुष हैं..;
जन्म लेते ही
लग जाता है..
उन पर..;
बलात्कारी होने का ठप्पा..!

पुरुष हैं..;
अहंकार केवल
पुरुषत्व का ही हो सकता है..!

पुरुष हैं..;
प्रेम में छलने…
विश्वासघात करने वाले..
केवल वे ही हैं..!

पुरुष हैं..;
प्रेम नहीं कर सकते..!
उन में
भावना नहीं होती..!
दर्द नहीं होता..!
वे
रो नहीं सकते..!

पुरुष हैं..;
उन्हें
अपनी बात
कहने तक का भी
अधिकार नहीं है..!

स्त्रियों को
फ़ुर्सत नहीं है..;
अपनी ही वेदना गाने से..!

पुरुष भी गाते हैं-
स्त्री का ही दर्द..!

पुरुष
अपनी पीड़ा लेकर
कहाँ जाएँ…?

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