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वे आ रहे हैं दूध पिलाने,सावधान रहें!

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                             -सुसंस्कृति परिहार

 हरिशंकर परसाई जी ने लिखा है -‘साल-भर सांप दिखे तो उसे भगाते हैं। मारते हैं। मगर नागपंचमी को सांप की तलाश होती है, दूध पिलाने और पूजा करने के लिए। सांप की तरह ही शिक्षक दिवस पर रिटायर्ड शिक्षक की तलाश होती है, सम्मान करने के लिए।’

 बहरहाल यह बात आज की राजनीति पर बिल्कुल फिट बैठती है पिछले दिनों साहिब जी ने भाजपा कार्यकर्ताओं से बड़े जोश खरोश के साथ कहा कि वे रक्षा-बंधन के पावन पर्व पर मुस्लिम बहनों को रक्षा सूत्र बांधें यानि उनकी रक्षा का वचन दें। उन्हें इस अवसर पर चढ़ावा बतौर कुछ देना तो ज़रूरी होता है वह दिए बिना रक्षा-बंधन अधूरा होगा।मामाजी ने तो बकायदा घोषणा ही कर दी है कि इस पावन पर्व पर उन्हें गिफ्ट दिया जाएगा ।वह कुछ भी हो सकता नकद राशि या कोई उपहार।वे साहिब से एक कदम हमेशा आगे रखते हैं उनके कदम भले  साहिब के अंगरक्षक पीछे कर दें किंतु घोषणाओं में वे आगे ही रहते हैं। उन्होंने तो तमाम लाड़ली बहनों को उपहार की बात की है और पूरी भी होगी क्योंकि चुनाव करीब हैं।बहाना बहनों के आगे नहीं चलेगा वे रुठ गई तो बंटाधार कर देंगी। वैसे भी बहुत सी, मामा की लाड़ली बहना इन दिनों हजार वाली स्कीम में नहीं आ पाई है।कुछ तो करना ही होगा।

भारत भी विचित्र है चार साल भर सताओ और चुनाव काल में शक्कर दूध पिलाओ।मतलब आप समझ ही गए होंगे।हाल ही साहिब जी म०प्र० सागर के करीब एक गांव पहुंचे बड़तूमा वहां उन्होंने संत रविदास का सौ करोड़ का मंदिर बनाने हेतु कुदाली उठाकर शिलान्यास की नींव रखी। यहां बड़ा मजमा लगा। बताया गया कि लोग प्रदेश की 350नदियों का पानी और और 53000गांवों की मिट्टी लाएंगे आज के तकनीकी युग में इस तरह मिट्टी और जल एकत्रित करना अजीब लगता है यह मंदिर तकरीबन डेढ़ साल में जब यह बन जाएगा तब उद्घाटन करने भी साहिब जी आएंगे।ये उन्होंने वादा भी किया।

आप जानते हैं इस इवेंट को भाजपा ने प्रदेश की 74 विधानसभा सीटों को ध्यान में रखकर यह डिजाइन बनाया है इनमें 35 सिम अनुसूचित जाति के लिए हैं बाकी 19 सिम सामान्य है लेकिन इस पर दलित वाटर निर्णायक भूमिका में है और जिस गांव बड़तूमा को चुना  वह इन अनुसूचित जातियों के रहवास के बीच में, लगभग पड़ता है।

 आइए जानते हैं संत रविदास कौन थे ,कहते हैं कि वे स्वामी रामानंदाचार्य वैष्णव भक्तिधारा के  महान संत हैंऔर संत रविदास उनके शिष्य थे। संत रविदास तो संत कबीर के समकालीन व गुरूभाई माने जाते हैं। स्वयं कबीरदास जी ने ‘संतन में रविदास’ कहकर इन्हें मान्यता दी है। राजस्थान की कृष्णभक्त कवयित्री मीराबाई उनकी शिष्या थीं। यह भी कहा जाता है कि चित्तौड़ के राणा सांगा की पत्नी झाली रानी भी उनकी शिष्या बनीं थीं। वहीं चित्तौड़ में संत रविदास की छतरी बनी हुई है।बनारस में उनके नाम एक मंदिर और मठ भी है काशी में जन्में और वहीं अपनी देह समाप्त की।

अपने दोहों और पदों के माध्यम से समाज में जातिगत भेदभाव को दूर कर सामाजिक एकता पर उन्होंने बल दिया और मानवतावादी मूल्यों की नींव रखी मूर्ति पूजा तीर्थयात्रा जैसे दिखाओ में उनका बिल्कुल विश्वास नहीं था वह व्यक्ति की आंतरिक भावनाओं और आपसी भाईचारे को ही सच्चा धर्म मानते थे उनका हाथ में निवेदन निभाओ और सहज भक्ति पाठक के हृदय को उद्वेलित करते हैं कबीर की तरह रैदास के बहुत से पद सिखों के पवित्र ग्रंथ ‘गुरु ग्रंथ साहिब ‘में मौजूद हैं विशेष बात ये कि संत रविदास देशभर में जाने जाते हैं पंजाब में उन्हें रविदास, उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश राजस्थान में रैदास। गुजरात ,महाराष्ट्र में रोहिदास। बंगाल में रूईदास के नाम से जाना जाता है।विशेष बात ये कि कुछ क्षेत्रों में उनकी चमार जाति को रैदास नाम से भी जानते हैं। उन्होंने लिखा है –

पराधीनता पाप है, जान लेहु रे मीत। 
रैदास दास पराधीन सौं, कौन करैहै प्रीत॥ 

तुलसीदास भी यही बात दूसरे अंदाज़ में कहते हैं पराधीन सपनेहुं  सुख नहीं।अफसोस नाक यह कि कि 15वीं शताब्दी कहीं गई इन शिक्षाओं का खासा कोई असर देखने नहीं। भीमराव अम्बेडकर ने शिक्षा को मंदिर से ज्यादा अहमियत दी। हालात आज तक नहीं बदले।संत रविदास के मंदिर बनाने के पीछे इन्हें भक्ति पथ दिखाकर संतुष्ट करने का जो उपक्रम है ।उसे समझना ज़रुरी है।यह दूध पिलाने से कमतर नहीं है।

इसी कड़ी में साहिब जी ने लाखा बंजारा का नाम लिया जिन्होंने सागर में विशाल तालाब का निर्माण किया।वे आज याद आए जब वह तालाब एक छोटे ताल में बदल गया।जो कभी सागर हुआ करता था जिसके कारण शहर का नाम सागर हुआ।यह भी एक विशेष जनजाति को उपकृत करने के इरादे से।

देश ही नहीं प्रदेश में अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जनजाति आज सरकार की कितनी अधिक उपेक्षा झेल रही है वह छिपा नहीं।सीधी का पेशाब कांड माथे पर कलंक है।दलित दूल्हा आज भी घोड़ी नहीं चढ़ सकता।इन सभी अत्याचार मामले में प्रदेश अव्वल है।महिला उत्पीड़न भी कम नहीं। इसलिए तरह तरह के लोक-लुभावन कार्यक्रम लेकर वे आ रहे हैं सावधान रहें।चार साल जिसके साथ अनुचित और अमानवीय व्यवहार हो उसकी इस तरह खुशामद करना ठीक वैसा ही है जैसा हरिशंकर परसाई ने बताने की कोशिश की है।यकीन है आदिवासी व्यक्ति की पूजा हो,रैदास की पूजा हो या रक्षा-बंधन के पावन पर्व पर मुस्लिम बहनों को राखी बांधना ,लाड़ली बहनों को गिफ्ट देना छलावा है  इसे समझें और समझदारी से काम लें।

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