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सोचिएगा ज़रूर !देश की आत्मा मर चुकी है

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सुब्रतो चटर्जी 

अगर आदिवासी, हरिजन, अकलियतों और दलितों के मुँह पर पेशाब करने से भूराबाल, ओ बी सी और पेशाब पीते तबकों का अधिकांश वोट भाजपा को मिल जाते हैं, तो वे ऐसा क्यों न करें? 

जिस देश की आत्मा मर चुकी है, उसी देश में दुनिया के जघन्यतम अपराधियों की सरकार बार बार बनती है । 

जब मैं बहुसंख्यक वाद को चुनावी बहुमत की आड़ में बढ़ावा देने की बात करता हूँ तो ज़्यादातर लोगों को समझ ही नहीं आता है कि यह कैसे होता है । 

सांप्रदायिकता एक बहुआयामी अवधारणा है। यह सिर्फ़ विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच फैली हुई घृणा तक नहीं सीमित है । 

दरअसल, हम ऐसा इसलिए सोचते हैं कि हमें संप्रदाय शब्द का पूरा अर्थ नहीं मालूम है । 

एक उदाहरण से समझाने की कोशिश करता हूँ । हिंदू और मुस्लिम दो अलग-अलग धार्मिक संप्रदाय हैं । ठीक उसी तरह से शिया और सुन्नी मुसलमानों के अंदर दो अलग-अलग समुदाय हैं । ठीक उसी तरह से गोरखनाथ या नाथ और वैष्णव हिंदुओं के बीच अलग-अलग संप्रदाय हैं । ईसाई प्रोटेस्टेंट और रोमन कैथोलिक में बंटे हुए हैं । ये सब अलग-अलग संप्रदाय हैं और सारे एक दूसरे पर अविश्वास करते हैं और घृणा करते हैं । 

अमूमन, अगर आप इन धर्मों के अंदर के सांप्रदायिक विभाजन के इतिहास पर ग़ौर करेंगे तो आपको इनके पीछे राजनीतिक, आर्थिक वर्चस्व की लड़ाई का इतिहास मिलेगा और कुछ नहीं मिलेगा । रानी एलिज़ाबेथ प्रथम ने चर्च ऑफ़ इंग्लैंड की स्थापना इसी कारण से पोप के विरुध्द जाकर की थी और शिया और सुन्नियों का विभाजन भी मूलतः राज पाट के विभाजन की ही लड़ाई थी । 

ऐतिहासिक क्रम में, राजतंत्र के अवसान के बाद, तथाकथित पूँजीवादी, अर्ध सामंती लोकतंत्र में भी वर्ग संघर्ष का यह स्वरूप जारी रहा है । 

दरअसल कोई भाजपाई किसी आदिवासी पर नहीं मूत रहा है, एक आर्थिक और सामाजिक रूप से समर्थ व्यक्ति एक ग़रीब और अशक्त व्यक्ति पर मूत रहा है । 

जब आप सच्चाई को इस नज़रिए से देखेंगे तो आपको मालूम चलेगा कि हम सब जाने अनजाने यही करते हैं, सिर्फ़ इस सोच को एक शारीरिक अभिव्यक्ति मिली है जो हमें नागवार गुजरती है । 

ग़रीबों, दलितों, आदिवासियों की बस्ती में भूले से भी नहीं जाकर , या हरेक कामगार या मज़दूर को नीचा दिखाकर या उसका शोषण कर हम ता ज़िंदगी यही नहीं करते आए हैं? 

सोचिएगा ज़रूर ! अगर आदिवासी, हरिजन, अकलियतों और दलितों के मुँह पर पेशाब करने से भूराबाल, ओ बी सी और पेशाब पीते तबकों का अधिकांश वोट भाजपा को मिल जाते हैं, तो वे ऐसा क्यों न करें? 

जिस देश की आत्मा मर चुकी है, उसी देश में दुनिया के जघन्यतम अपराधियों की सरकार बार बार बनती है । 

जब मैं बहुसंख्यक वाद को चुनावी बहुमत की आड़ में बढ़ावा देने की बात करता हूँ तो ज़्यादातर लोगों को समझ ही नहीं आता है कि यह कैसे होता है । 

सांप्रदायिकता एक बहुआयामी अवधारणा है। यह सिर्फ़ विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच फैली हुई घृणा तक नहीं सीमित है । 

दरअसल, हम ऐसा इसलिए सोचते हैं कि हमें संप्रदाय शब्द का पूरा अर्थ नहीं मालूम है । 

एक उदाहरण से समझाने की कोशिश करता हूँ । हिंदू और मुस्लिम दो अलग-अलग धार्मिक संप्रदाय हैं । ठीक उसी तरह से शिया और सुन्नी मुसलमानों के अंदर दो अलग-अलग समुदाय हैं । ठीक उसी तरह से गोरखनाथ या नाथ और वैष्णव हिंदुओं के बीच अलग-अलग संप्रदाय हैं । ईसाई प्रोटेस्टेंट और रोमन कैथोलिक में बंटे हुए हैं । ये सब अलग-अलग संप्रदाय हैं और सारे एक दूसरे पर अविश्वास करते हैं और घृणा करते हैं । 

अमूमन, अगर आप इन धर्मों के अंदर के सांप्रदायिक विभाजन के इतिहास पर ग़ौर करेंगे तो आपको इनके पीछे राजनीतिक, आर्थिक वर्चस्व की लड़ाई का इतिहास मिलेगा और कुछ नहीं मिलेगा । रानी एलिज़ाबेथ प्रथम ने चर्च ऑफ़ इंग्लैंड की स्थापना इसी कारण से पोप के विरुध्द जाकर की थी और शिया और सुन्नियों का विभाजन भी मूलतः राज पाट के विभाजन की ही लड़ाई थी । 

ऐतिहासिक क्रम में, राजतंत्र के अवसान के बाद, तथाकथित पूँजीवादी, अर्ध सामंती लोकतंत्र में भी वर्ग संघर्ष का यह स्वरूप जारी रहा है । 

दरअसल कोई भाजपाई किसी आदिवासी पर नहीं मूत रहा है, एक आर्थिक और सामाजिक रूप से समर्थ व्यक्ति एक ग़रीब और अशक्त व्यक्ति पर मूत रहा है । 

जब आप सच्चाई को इस नज़रिए से देखेंगे तो आपको मालूम चलेगा कि हम सब जाने अनजाने यही करते हैं, सिर्फ़ इस सोच को एक शारीरिक अभिव्यक्ति मिली है जो हमें नागवार गुजरती है । 

ग़रीबों, दलितों, आदिवासियों की बस्ती में भूले से भी नहीं जाकर , या हरेक कामगार या मज़दूर को नीचा दिखाकर या उसका शोषण कर हम ता ज़िंदगी यही नहीं करते आए हैं? 

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