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सोचिये सोचिये, सोचने से समाधान निकलेगा !

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~ डॉ. सलमान अरशद

ज़िन्दगी जीने के लिए कुछ बेहद बुनियादी सहूलतों की ज़रूरत सभी को होती है। लोग इन ज़रूरतों को पैसे से पूरा करते हैं। पैसा जैसे जैसे बढ़ता है ज़रूरतें बढ़ती चली जाती हैं, पैसा जैसे जैसे कम होता है ज़रूरतें कम की जाने लगती हैं। पैसे के बढ़ते रहने पर ज़रूरत और लालच के बीच का फ़र्क़ मिटता चला जाता है। लालच कब ज़रूरत बन जाती है, इसका पता तक नहीं चलता। लालच के ज़रूरत बनते रहने की कोई सीमा नहीं है बस दौलत बढ़ती रहे तो लालच भी ज़रूरत बनती रहती है। लालच के ज़रूरतों के दायरे में घुसपैठ ने बड़ी मुश्किलें खड़ी की हैं। सारी दुनिया ही इससे परेशान है। 
जिन लोगों ने अपनी लालच को ज़रूरत बनाने के सिलसिले को बेलगाम कर रखा है, उनके लिए दूसरी दिक्क़तें हैं। ज़रूरतें, जो सच में आपके जीने की बुनियाद हैं वो बेहद कम हैं, इन्हें पूरा करने के लिए आपको जीव जगत का कोई खास नुकसान नहीं करना पड़ता और जीव व जगत के बीच सामंजस्य बना रहता है। इसके विपरीत जब लालच ज़रूरतों के दायरे में इंट्री करने लगे तब असंतुलन बढ़ता है। जीव और जगत के बीच असंतुलन, जीव और जीव के बीच असंतुलन, मानव और मानव के बीच असंतुलन। 
असंतुलन से अन्याय और अन्याय से अशांति पैदा होती है। बिना असंतुलन मिटाए अन्याय को नहीं मिटाया जा सकता। हमारी दुनिया लगातार असंतुलन को मिटाए बिना, लालच की एंट्री ज़रूरत में रोके बिना न्याय क़ायम करना चाहती है। अब ये तो संभव नहीं है तो दुनिया के प्रभुओं ने दुनिया को दो हिस्से में बांट दिया। एक में वो वर्ग रहता है जिसने ज़रूरतों की दुनिया को बहुत पीछे छोड़ दिया है और लालच को ज़रूरत बना लिया है। इनकी तादात बहुत कम है लेकिन इन्होंने दुनिया भर की संपदा पर कब्ज़ा जमा रखा है। इनकी दुनिया में धर्म, रंग, नस्ल और जेंडर को लेकर कोई कुंठा नहीं है, इन्हें बस एक ही फ़िक़्र है कि दुनिया की संपदा पर इनकी पकड़ मजबूत बनी रहे। 
असंतुलन हमेशा अन्याय की बुनियाद पर ही टिका रह सकता है, हज़ार कोशिशें हों, मगर असंतुलन को मिटाए बिना न्याय क़ायम नहीं हो सकता। मुट्ठी भर अमीरों ने इसका नायाब हल निकाल लिया। उन्होंने अपनी दुनिया अलग कर ली, दुनिया के बहुसंख्यक जो अपनी ज़रूरत भी ठीक से पूरी नहीं कर पाते, अमीरों ने उन्हें अपनी दुनिया से अलग किया हुआ है। अभाव, अन्याय और अशांति से बग़ावत न पैदा हो, ये हो ही नहीं सकता। ये बग़ावत अगर सैलाब बन कर अमीरों की दुनिया का रुख़ कर ले तो उनकी दुनिया चंद लम्हों में बह जाएगी, उनका निशान तक बाकी नहीं रहेगा। 
अमीरों ने ज़रूरत के इर्द गिर्द गर्दिश कर रहे लोगों को धर्म, नस्ल, रंग, जेंडर आदि पर ग़ुरूर करना सिखाया। इसके लिए उन्होंने पुरोहितों को एजेंट बनाया, इन मज़दूरों और दूसरे मेहनतकशों के बीच से कुछ और दलाल चुने। ये पुरोहित इन्हें धर्म के नाम पर लड़वाते हैं। ये सबसे ताकतवर टूल है जो अमीरों के हित में काम करता है। ये टूल प्रोफेसर और सड़क के टपोरी दोनों  समान रूप से काम करता है। अमीरों ने अपनी दुनिया जब अलग करनी शुरू की उसी वक़्त उन्होंने इस प्रोजेक्ट को शुरू कर दिया था। 
ज़रा पड़ताल कीजिये, स्पेन, यूगोस्लाविया, ततारिस्तान, चीन, अरब, अफ्रीका और एशिया के कुछ दूसरे मुल्क़ों में धर्म के नाम पर कितनी हत्याएं हुई हैं। इस वक़्त भी पाकिस्तान के सुन्नी मुसलमान अहमदियों को मार रहे हैं। यूगोस्लाविया के पेट से पैदा हुए मुल्क़ों में यही हो रहा है और भारत तो पांच सदी पीछे जाने की दौड़ में सरपट भाग रहा है। धर्म मेहनतकशों की दुनिया के अन्याय से ध्यान हटाये रखने का सबसे बेहतर टूल साबित हुआ है इसलिए पुरोहित वर्ग को अमीरों की दुनिया से भरपूर फंड मिलता है, अमीर कभी कभी किसी पुरोहित के चरणों में जाकर बैठ जाते हैं, ये दरअसल पुरोहित वर्ग का विज्ञापन है, इससे उनकी मांग मेहनकश वर्ग में बनी रहती है। वरना जिस धर्म नामक टूल से करोड़ो  लोगों की हत्या की जा चुकी हो हो, अरबों की दौलत नष्ट की जा चुकी हो और लाखों घर बर्बाद हुए हों, ऐसे धर्म नामक टूल को मेहनकश अपने गले में क्यों  टाँग कर घूमेगा ! 
मेहनकश और दूसरों की मेहनत पर जीने वाली अमीरों की दुनिया पर काबिल लोगों ने बहुत कुछ कहा है, समस्या अन्याय पर आधारित इस दुनिया के खात्मे की है। अन्याय की आधारशिला यानि कि बुनियाद असंतुलन है। इस असंतुलन को मिटा दिया जाए तो एक बेहतर दुनिया क़ायम हो सकती है। 
अब ये होगा कैसे, अमीरों की दुनिया जो आपकी हथेली से भी छोटी है उसे मिटाना होगा। मिटाना होगा, सुन कर लगता है कि बड़ी मार काट करनी पड़ेगी। जबकि मामला एक दम उल्टा है। अमीरों का निजाम मेहनकश ही संभालता है, बस मेहनकश अमीरों की दुनिया की हिफाज़त बन्द कर दे। 
अमीरों की दुनिया बचाने के लिए सेना है, सेना के सैनिक मेहनतकशों के बेटे हैं, अमीरों के लिए पुलिस है, पुलिस भी मेहनकशों के बेटे बेटी हैं, अमीरों के अपने कानून हैं जो हमारी एक फूँक से मिट जाएंगे। अमीरों की फैक्टरियां हैं, जो दरअसल मेहनतकशों की हैं, अमीरों के दलाल हैं जिन्हें आप हुकूमत करने के लिए चुनते हैं, ये आपकी एक हुंकार से पाजामा गीला कर देंगे। बात सिर्फ इतनी है कि मेहनकश अपनी ताकत समझे और दुनिया के स्तर पर एक हो जाये। 
फिर जो दुनिया हम बनाएंगे, उसमें असंतुलन के लिए जगह नहीं होगी। मसलन ऐसे सोचिये, आवास, भोजन, शिक्षा, सुरक्षा, मनोरंजन जैसी ज़रूरतें पूरी हो जाएं तो हम किसके लिए दौलत जमा करेंगे !
भोजन तकनीक की मदद से बनने लगे तो करोड़ो महिलाओं को चूल्हा फूँकने की कहाँ ज़रूरत है ! युवा होने से पहले आपका रोज़गार तय हो तो फ्रस्ट्रेशन में ट्रेन क्यों फूंकियेगा ! 
सोचिये सोचिये, सोचने से समाधान निकलेगा !
~ डॉ. सलमान अरशद

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