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यह पुराना इतिहास है सूचना आयोग का

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परदा जो उठ गया था!……….

कनक तिवारी 

1. 3 जून 2013 को केन्द्रीय सूचना आयोग की तीन सदस्यीय पीठ ने अंतिम एक प्रश्न निर्णीत किया था। उससे पंजीकृत राजनीतिक पार्टियों में खलबली मच गई। फैसला पीठ पर कोड़ा मारता दिखा, लेकिन राजनीतिक दलों ने पेट पर लात मारने की शकल में बताकर अपनी जगहंसाई कराई। आयोग के सामने सवाल था कि क्या राजनीतिक दलों के इन्कम टैक्स रिटर्न और पैन कार्ड संबंधी जानकारी सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8 (1) (घ) (ड.) (च) (छ) (ज) और (ञ) के प्रतिबंधों के कारण नागरिकों को मुहैया नहीं कराई जा सकती? आयोग ने फैसला किया कि देश के हर नागरिक को राजनीतिक दलों को चंदे के रूप में मिलने वाली राशियों और संबंधित राजनीतिक व्यय वाले इन्कम टैक्स के ब्यौरों को जानने का पूरा अधिकार है। फैसला इतना क्रांतिकारी भी नहीं था जिससे राजनीतिक पार्टियों को आशंकित या उत्तेजित होने और अभियुक्त-मुद्रा में घबराने की ज़रूरत होती। अपनी प्रतिक्रिया में लगभग सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि गैरज़रूरी रूप में बौखलाए हुए नज़र आए। उन्होंने फैसले को रबर की तरह खींचकर यहां तक कह दिया कि उसका अनुपालन करने में उन्हें यह तक बताना होगा कि अमुक क्षेत्र के चुनाव के लिए पार्टी में कितने उम्मीदवारों ने आवेदन किया है। उन्हें किन रणनीतिक तथा गोपनीय आधारों पर उम्मीदवार बनाया गया है। यह भी कि पार्टियों को अपनी राजनीतिक बैठकों का पूरा ब्यौरा या कम से कम सार संक्षेप सूचना के अधिकार के तहत सार्वजनिक करना होगा। 

         कांग्रेस प्रवक्ता वरिष्ठ एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने तो चुनौती के स्वर में कहा कि उनकी पार्टी न केवल निर्णय को न्यायालय में चुनौती देगी बल्कि खारिज भी कराएगी। पूर्व केन्द्रीय सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह ने निर्णय का समर्थन तो किया लेकिन उत्साह में यह भी कह दिया कि राजनीतिक पार्टियों को लोक प्राधिकारी समझा जाना चाहिए। यह भी कि उनकी राजनीतिक बैठकों का यदि कोई ब्यौरा लिपिबद्ध किया जाता है, तो उसे नागरिकों को सूचना के अधिकार के तहत बताया जाना मुनासिब होगा। भाजपा प्रतिनिधि सुधांशु मित्तल लंबी जिरह करते रहे। बीच बीच में कहते रहे कि वह उनकी निजी राय है। हालांकि पार्टी के प्रवक्ता के रूप में बहस कर रहे थे। सभी राजनीतिक पार्टियां अपनी पवित्रता का कोरस गाती रहीं। लेकिन सूचना आयोग पर हमला करने के बहाने भारत के नागरिकों के सार्वभौम अधिकार को ही चुनौती देती रहीं। 

2. किस्सा क्या था? एसोसिएशन फाॅर डेमोक्रेटिक रिफाॅम्स (ए डी आर) की ओर से उसकी प्रतिनिधि सुश्री अनुमेहा ने 28-02-2007 को अधिनियम की धारा 6 (1) के अंतर्गत केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के सूचना अधिकारी को यह आवेदन दिया कि उन्हें वर्ष 2002-2003, 2003-2004, 2004-2005, 2005-2006 तथा 2006-2007 के लिए देश की राजनीतिक पार्टियों द्वारा जमा किए गए इन्कम टैक्स रिटर्न तथा उन पर किए गए आदेशों की प्रतिलिपियां तथा इन पार्टियों के पर्सनल एकाउन्ट नंबर (पैन नंबर) भी चाहिए। 

3. राजनीतिक दलों की आपत्तियांः 

(i) कम्युनिस्ट पार्टियां (सी. पी. आई. तथा सी. पी. एम.) ने यह व्यक्त किया कि उन्हें वांछित सूचना दिए जाने में कोई आपत्ति नहीं है। 

(ii) बहुजन समाज पार्टी ने अधिनियम की धारा 8 (1) (घ) के अतिरिक्त इस आधार पर भी आपत्ति की कि उसकी गोपनीय जानकारियां उसके विरोधियों को मिल जाएंगी।

(iii) नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एन. सी. पी.) ने आवेदन का कड़ा विरोध किया और इन्कार के लिए कई आधार जुटाए। उसका कहना था वह अधिनियम की धारा 2 (ज) के अनुसार वह लोक प्राधिकारी नहीं है। इसलिए उत्तर देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। राजनीतिक दलों के आय व्यय विवरण सरकार को विश्वास के आधार पर मुहैया कराए जाते हैं, उन्हें सार्वजनिक करने के लिए नहीं। इन्कम टैक्स रिटर्न लोक दस्तावेज नहीं हैं। वांछित जानकारी राजनीतिक दुर्भावना के तहत मांगी जा रही है। 

(iv) समाजवादी पार्टी ने भी आवेदिका पर राजनीतिक दुर्भावना का आरोप लगाते हुए आयकर अधिनियम की धारा 138 (2) का सहारा लिया। 

(v) भारतीय जनता पार्टी ने भी मोटे तौर पर अधिनियम की धारा 8 (1) (ञ) के आधार पर जानकारियां जाहिर किए जाने को लेकर आपत्ति व्यक्त की। 

(vi) द्रविड़ मुनेत्र कषगम ने भी आयकर अधिनियम की धारा 138 और अधिनियम की धारा 8 (1) (ञ) का सहारा लिया। 

(vii) कांग्रेस ने आवेदिका अपीलार्थी को दुर्भावनाग्रस्त व्यक्ति बता दिया, जिसने बिना किसी वैध कारण के आवेदन प्रस्तुत किया है। अधिनियम की धारा 8 में वर्णित प्रतिबंधों का उल्लेख करते जानकारी देने में आपत्ति व्यक्त की तथा पैन कार्ड संबंधी जानकारियों को पूरी तौर पर गोपनीय बताया। 

4. आयोग का निर्णयः केन्द्रीय सूचना आयोग ने प्रकरण की गंभीरता, व्यापकता, उपादेयता और भविष्यमूलकता को देखकर दूरगामी तथा अर्थमूलक निर्णय देने की कोशिश की। आयोग ने कहा राजनीतिक पार्टियों की अनोखी संवैधानिक स्थिति है। ऊपरी तौर पर तथा सांगठनिक दृष्टि से वे एक तरह का नागरिक समाज हैं। इसके बावजूद प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव के जरिए सरकारों का नियंत्रण करती हैं। पारदर्शिता और जवाबदेही का जुड़वा चरित्र हैं। 

 सुप्रीम कोर्ट के अधिकांश फैसले सूचना अधिनियम बनने के पहले के हैं। तब जनता को सूचित होने का कोई माध्यम उपलब्ध नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने सूचना अधिनियम के विधायन को लोकतंत्र के हक में क्रांतिकारी कदम करार दिया है। अधिनियम अन्ततः राजनीतिक पार्टियों से बनी संसद की ही रचना है। विरोधाभास है कि एक ओर सुप्रीम कोर्ट की लगातार केन्द्रीय चिंताओं से रूबरू और संपृक्त होने के बाद संसद ने सूचना का अधिकार अधिनियम बनाया। अब उसी संसद के अवयव राजनीतिक पार्टियों के रूप में एक जनोन्मुखी निर्णय का विरोध कर रहे हैं। राजनीतिक पार्टियों ने स्वयं के संसदीय आचरण के विरुद्ध अब चाय की प्याली में यह तूफान खड़ा किया है कि यदि आयकर अधिकारी उनके द्वारा जमा किए गए रिटर्न की प्रविष्टियों को लोकहित में उजागर करना चाहते हैं तो जनता को इतने से ही संतुष्ट हो जाना चाहिए। आयोग के निर्णय में राजनीतिक पार्टियों को लोक प्राधिकारी की संज्ञा या विशेषण देना प्रतीत नहीं होता। फिर भी दूरदर्शन के चैनलों पर राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधियों ने खुद को लोक प्राधिकारी बताए जाने पर हायतौबा मचाई। 

5. समाजवादी पार्टी जद (एकी) के शरद यादव और सी.पी.एम. के प्रकाश कराट, कम्युनिस्ट पार्टी के ए.बी. बर्द्धन आदि की प्रतिक्रियाएं पवित्रता का कोरस तो गाते गाते आयोग पर हमला करने के बहाने नागरिकों के सार्वभौम अधिकारों को ही अप्रत्यक्ष चुनौती देती लगीं। सुभाषचन्द्र अग्रवाल और अनिल बेरवाल नामक सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपनी अपनी याचिकाओं के जरिए देश की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों से उनके चुनाव घोषणा पत्रों के वायदों पर किये गये अमल, आय-व्यय के विस्तृत विवरणों तथा सदस्यों एवं अन्य स्त्रोतों द्वारा मिलने वाली आर्थिक सहायताओं की जानकारियां मांगी थीं। कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव ए. बी. बर्धन ने संशोधित पत्र द्वारा अपनी पार्टी को लोक प्राधिकारी कहलाना स्वीकार किया।

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